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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 616 में से

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पृष्ठ 550

५६६ चरकसंहिता [ अ० १४
करञ्जपल्लवान् दद्याद्वातवर्चोऽनुलोमनान् ॥ १०२ ॥
(२०) करञ्ज के कोमल पत्तों को जौ के सत्तु के साथ घी और तेल यमक
मे भून लेना चाहिये । इनके चूर्ण को भोजन से पूर्व देना चाहिये । इससे वायु
और मल का अनुलोमन होता है ॥ १०२ ॥
मदिरां वा सलवणा शीधुं सौवीरक तथा ।
गुडनागरसंयुक्त पिबेद्वा पौर्वभक्तिकम् ॥ १०३ ॥
(२१) भोजन से पूर्व प्रसन्ना को नमक से नमकीन बना कर पीये ।
अथवा सीधु को नमकीन करके या काजी को नमकीन करके पीये । अथवा गुड़
के साथ हरड़ को खाना चाहिये ॥ १०३ ॥
पिप्पलीनागरक्षारकारवीधान्यजीरकैः ।
फाणितेन च सयोज्य फलाम्ल सावयेद् घृतम् ॥ १०४ ॥
(२२) पिप्पली, मोठ, यवक्षार, कालीजीरी, धनिया, जीरा इन सबको
समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को फाणित (राब) और
घी मे मिला कर अनार के रस से खट्टा करके रोगी को देना चाहिये १ ।
[ जल्पकल्पतरु मे पिप्पल्यादि के कल्क से घृत सिद्ध करके देना चाहिये
ऐसा माना है ] ॥ १०४ ॥
पिप्पली पिप्पलीमूल चित्रको हस्तिपिप्पली ।
शृङ्गवेरं यवक्षारं तैः सिद्धं वा पिबेद् घृतम् ॥ १०५ ॥
(२३) पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चीता, सोठ, यवक्षार, मिलित २०
तोला, घृत १ सेर ओर जल ४ सेर लेकर पिप्पली आदि कल्क से घृत सिद्ध
करना चाहिये ॥ १०५ ॥
चव्यचित्रकसिद्धं वा गुडक्षारसमन्वितम् ।
पिप्पलीमूलसिद्धं वा सगुडक्षारनागरम् ॥ १०६ ॥
पिप्पलीपिप्पलीमूलदधिदाडिमधान्यकैः ।
सिद्धं सर्पिर्विधातव्य वातवर्चोविबन्धनुत् ॥ १०७ ॥
(२४) तीन घृत—(१) चव्य और चित्रक का कल्क २० ताला, पानी
४ सेर, घृत १ सेर लेकर घृत सिद्ध करन चाहिये । इसमे गुड़ और यवक्षार
१ यहा पर अपक्व ही घृत का प्रयोग है। जैसा कि वाग्भट में कहा है—
रूक्षकोष्ठश्चार्शसो नागरक्षारकृष्णाजाजीधान्यकारवीगर्भं फलाम्लं सफाणित सर्पिः
पिबेत् । अ० स० चि० १० ।