चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
असाध्यता—जो गुल्म धीरे-धीरे बढ़ कर बड़े भारी स्थान को घेर
३७२ चरकसंहिता [ अ० ५
असाध्यता—जो गुल्म धीरे-धीरे बढ़ कर बड़े भारी स्थान को घेर
लेता है, जिसने जड़ पकड़ ली हो, सिराओ से व्याप्त, कछुुए के समान
ऊपर को उठा हुआ, दुर्बलता, अरुचि, जी मचलाना, कास, वमन, बेचैनी,
ज्वर, प्यास, तन्द्रा, प्रतिश्याय से युक्त होता है, वह गुल्म असाध्य हे ।
ज्वर, श्वास, वमन और अतीसार से पीड़ित गुल्म रोगी के हृदय, नाभि ओर
हाथ पाव मे शोथ हो जाय ता रोगी की मृत्यु हा जाती है। यह शोथ उसका
पीडित करता है ॥ १६६-१७१ ॥
रोधिरस्य तु गुल्मस्य गर्भकालव्यतिक्रमे ॥ १७२ ॥
स्निग्धस्विन्नशरीराय दद्यात्स्नेहविरेचनम् ।
रक्त-गुल्म की चिकित्सा—( १ ) गर्भकाल अथोत् दस मास व्यतीत हो
जाने पर गर्भवती के शरीर का स्नेहन और स्वेदन करके [ घृत आदि को ]
स्निग्ध विरेचन दे । जैसे—एरण्ड तैल ॥ १७२ ॥
पलाशक्षारपात्रे१ द्वे द्वे पात्रे तैलसर्पिषोः ॥ १७३ ॥
गुल्मशैथिल्यजननीं पक्त्वा मात्रां प्रयोजयेत् ।
( २ ) पलाश-क्षार यमक—तिल तैल २ पात्र ( २ आढक ), घी २ पात्र,
पलाश क्षारादक [ ढाक की भस्म को ६ गुने पानी मे २१ वार परिस्रुत करके
तय्यार किया क्षारादक ] चार आढक लेकर स्नेह पाक करे । जब झाग उठ
जाये और आकृति फटे दूध के समान हो जाये तब स्नेहपाक समझे । इस
यमक की मात्रा रागिणी का पिलावे इससे गुल्म शिथिल हो जाता है । [ मात्रा
३ मासा ] ॥ १७३- ॥
प्रभिद्येत न यद्येवं दद्याद्योनिविशोधनम् ॥ १७४ ॥
क्षारेण युक्तं पललं सुधाक्षीरेण वा पुनः ।
आभ्यां वा भावितन्दद्याद्योनौ कटुकमत्स्यकान् ॥ १७५ ॥
वराहमत्स्यपित्ताभ्यां लक्तकान् वा सुभावितान् ।
अधोहरैश्चोर्ध्वहरैर्भावितान् वा समाक्षिकैः२ ॥ १७६ ॥
किण्वं वा सगुडक्षारं दद्याद्योनिविशोधनम् ।
रक्तपित्तहरं क्षारं लेहयेन्मधुसर्पिषा ॥ १७७ ॥
लशुनं मदिरा तीक्ष्णा मत्स्यांश्चास्यै प्रदापयेत् ।
बस्ति सक्षीरगोमूत्रं सक्षारं दाशमूलिकम् ॥ १७८ ॥
१ 'पादे' इति च पाठ. । २ 'समाक्षिकान्' इत च पाठ ॥
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३७३
अदृश्यमाने रुधिरे दद्याद् गुल्मप्रभेदनम् ।
प्रवर्त्तमाने रुधिरे दद्यान्मांसरसौदनम् ॥ १७९ ॥
घृततैलेन चाभ्यङ्ग पानार्थं तरुणीं सुराम् ।
रुधिरेऽतिप्रवृत्ते तु रक्तपित्तहराः क्रियाः ॥ १८० ॥
कार्या वातरुगार्ता याः सर्वा वातहराः पुनः ।
घृततैलावसेकाश्च तित्तिरींश्चरणायुधान् ॥ १८१ ॥
सुरा समण्डा पूर्वा च पानमम्लस्य सर्पिषः ॥ १८२ ॥
प्रयोजयेदुत्तर वा जीवनीयेन सर्पिषा ।
अतिप्रवृत्ते रुधिरे सतिकेनानुवासनम् ॥ १८३ ॥
( ३ ) यदि इस प्रकार से गुल्म का भेदन न हो तो योनि-शोधन करावे ।
इसके लिये ( १ ) क्षार से युक्त तिल-कल्क या सेहुण्ड के दूध से युक्त तिल-
कल्क अथवा क्षार और सेहुण्ड के दूध से भावित कटु मछलियो ( शफरी
मछली ) को योनि मे रखे । [ यहा पर तिल-कल्क न लेकर मास ( छुछुन्दरी
या मूषक ) का प्रयोग करना अच्छा है । श्रीगगाधर की भी यही मान्यता है,
क्षार मे पलाशक्षार या यवक्षार बरते । ]
( २ ) पिचुओ ( फाया ), को सूअर या मछली के पित्तो से अच्छी प्रकार
भावना देकर अथवा मधु-युक्त विरेचन द्रव्यो या मधु-मिश्रित वमन-द्रव्या से
पिचुओ को भावित करके योनि मे रखे ।
( ३ ) योनि के शोधन के लिये किण्व ( सुरा-बीज ) को गुड और पलाश-
क्षार मे मिला कर योनि मे रखे । रक्तपित्तनाशक क्षार ( नीलोत्पल क्षार ) मधु
और घी के साथ चटावे ।
( ४ ) अन्नपान मे—लहसुन, तीक्ष्ण मदिरा, मछलिया देवे । दूध, गोमूत्र
और क्षार से युक्त दशमूल क्वाथ की उत्तर बस्ति देवे ।
( ५ ) यदि योनि से रक्त स्रावित न हो तो गुल्म को फाडने की
चिकित्सा करे । यदि रक्त योनि से बहता हो ता मास रस और चावल
दे, घी और तैल की मालिश करे, पीने के लिये सुरा दे । रक्त के अधिक
बहने पर रक्तपित्त नाशक क्रिया करे । वातव्याधि हा ता वातनाशक चिकित्सा
करे । घी और तैल का परिषेक, तीतर, मुर्गे के मास-रस का भोजन, सुरा, मण्ड-
युक्त सुरा, अम्ल रस द्रव्यो से युक्त घी का पान करावे । रक्त के अधिक बहने
पर जीवनीय गण से साधित घृत की उत्तर बस्ति देवे । तिक्त घृत से
३७४ चरकसंहिता [ अ० ५
अनुवासन दे, अथवा तिक्त द्रव्यों से युक्त जीवनीय घृत से अनुवासन
करावे ॥ १७४-१८३ ॥
तत्र श्लोकाः—स्नेहः स्वेदः सर्पिश्शूर्णानि बृंहणं गुडिकाः ।
वमनविरेकौ मोक्षः क्षतजस्य च वातगुल्मवताम् ॥ १८४ ॥
सर्पिः सतिक्तसिद्ध क्षीर प्रस्रंसनं निरूहाश्च ।
रक्तस्य चावसेचनमाश्वामनसमनयोगाः ॥ १८५ ॥
उपनाहनं सशस्त्र पक्वस्याभ्यन्तरप्रभिन्नस्य ।
संशोधनसंशमने पित्तप्रभवस्य गुल्मस्य ॥ १८३ ॥
स्नेहः स्वेदो भेदो लङ्घनमूल्लेखनं विरेकश्च ।
सर्पिर्बस्तिर्गुडिकाश्चूर्णमरिष्टाश्च सक्षाराः ॥ १८७ ॥
गुल्मस्यान्ते दाहः कफजस्याग्रेऽपनीतरक्तस्य ।
गुल्मस्य रौधिरस्य क्रियाक्रमः स्त्रीभवस्योक्तः ॥ १८८ ॥
पथ्यान्नपानसेवाहेतूनां वर्जनं यथास्वं च ।
नित्यं चाग्निसमाधिः स्निग्धस्य च सर्वकर्माणि ॥ १८९ ॥
हेतुर्लिङ्गं सिद्धिः क्रियाक्रमः साध्यतानुयोगाश्च ।
गुल्मचिकित्सितसंग्रह एतावानग्निवेशस्य ॥ १९० ॥
वात-गुल्म मे—स्नेह, स्वेद, घृत, चूर्ण, बृं हण गुटिकाये, वमन, विरेचन,
रक्त-मोक्षण करे । पित्त गुल्म मे—तिक्त द्रव्यो से सिद्ध घृत, दूध, विरेचन,
निरूह, रक्तमोक्षण, आश्वासन, सशमनीय योग, उपनाहन, पकने पर शस्त्र-क्रिया,
अन्तः गुल्म के प्रभिन्न होने पर सशोवन और समशन चिकित्सा करे । कफ-
गुल्म मे—स्नेहन, स्वेदन, भेदन, लघन, वमन, विरेचन, घृत, बस्तिया,
गुटिका, चूर्ण, अरिष्ट-पान, क्षार-प्रयोग, रक्तभाक्षण और अन्त मे दाह करना यह
चिकित्सा-क्रम है । स्त्रियो मे होने वाले रक्त-गुल्म का चिकित्सा-क्रम कह दिया
है । पथ्यकारी खान-पान, रोग के अपने कारण का परित्याग, नित्य अग्नि की
रक्षा, गुल्म-रागी को स्नेहन देकर पश्चात् सब कायो का करना, गुल्म का हेतु,
लक्षण, चिकित्साविधि, साध्यासाध्यता और योग इतना गुल्म की चिकित्सा का
सग्रह अग्निवेश ने बतलाया है ॥ १८४-१९० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने
गुल्मचिकित्सित नाम पञ्चमोऽध्याय समाप्तः ॥ ५ ॥
अ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७५
षष्ठोऽध्यायः
अथातः प्रमेहचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब प्रमेह की चिकित्सा का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने ऐसा
उपदेश किया है ॥१-२॥
निर्मोहमानानुशयो निराशः पुनर्वसुर्ज्ञानतपोविशालः ।
कालेऽग्निवेशाय सहेतुलिङ्गानुवाच मेहान् शमनं च तेषाम् ॥ ३ ॥
आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि ।
नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम् ॥ ४ ॥
निर्मोह, निरभिमानी, तृणारहित, आकाक्षारहित, महाज्ञानी, महातपस्वी
पुनर्वसु ने उचित समय पर अग्निवेश का प्रमेह, उसके कारण, लक्षण और
चिकित्सा का उपदेश दिया ।
कफ-प्रमेह का निदान—सुख का जीवन बिताना ( चलना फिरना
नही ), आराम तलबी मे लेटे रहना, दही, ग्राम्य, औदक ( जलचर )
जन्तु और आनूप ( जल-प्रधान ) देश के पशु-पक्षिया का मास-रस, दूध,
नूतन खान-पान ( नवीन अनाज ओर नूतन मद्य ), गुड से बने पदार्थों का
अति सेवन तथा अन्य कफकारक पदार्थ कफ-प्रमेह को उत्पन्न करते है ॥३-४॥
मेदश्च मांसं च शरीरजं च क्लेदं कफो बस्तिगतं प्रदूष्य ।
करोति मेहान्समुदीर्णमुष्णैस्तानेव पित्तं परिदूष्य चापि ॥ ५ ॥
क्षीणेपु दोषेष्ववकृष्य बस्तौ धातून्प्रमेहाननिलः करोति ।
दोषो हि बस्ति समुपत्य मूत्रं संदूष्य मेहाञ्जनयेद्यथास्वम् ॥ ६ ॥
सम्प्राप्ति—( १ ) दूषित कफ-मेद, मास और शारीरिक क्लेद को दूषित
करके वस्ति मे पहुच कर प्रमेहो को उत्पन्न करता है । ( २ ) उष्ण द्रव्यों से
प्रवृद्ध और कुपित पित्त मेद आदि को दूषित करके पैत्तिक प्रमेहो को उत्पन्न
करता है । ( ३ ) कफ-पित्त दोषो के क्षीण होने पर वायु, मज्जा, वसा, ओज
ओर लसीका को बस्ति मे लाकर प्रमेह को उत्पन्न करता है । ( ४ ) दूषित
दाष बस्ति मे पहुच कर मूत्र को दूषित बनाकर अपने अपने लक्षणो वाले प्रमेहों
को उत्पन्न करते है ॥ ५-६ ॥
३७६ चरकसंहिता [अ० ६
साध्याः कफोत्था दश, पित्तजाः षट् याप्या, न साध्याः पवनाच्चतुष्काः ।
समक्रियत्वाद्विषमक्रियत्वान्महात्ययत्वाच्च यथाक्रमं ते ॥ ७ ॥
कफः सपित्तः पवनश्च दोषा मेदोऽस्रशुक्राम्बुवसालसीकाः ।
मज्जारसौजः पिशितं च दूष्यं प्रमेहिणा विंशतिरेव मेहाः ॥ ८ ॥
(१) सम क्रिया होने से कफजन्य दस प्रमेह साध्य है, (२) विषम
क्रिया होने से पित्तजन्य छः प्रमेह याप्य है और (३) महात्यय अर्थात् बहुत
आपत्तिकारक होने से वातजन्य चार प्रमेह असाध्य है ।
(१) समक्रिय—जो ओषधिया दूष्य, मेद, मज्जा, लसीका आदि को शान्त
करते है, वे ही ओषधिया कफ को भी शान्त करती है, इसलिये इनकी क्रिया
समान है। (२) विषमक्रिय—जो ओषधिया कटु, तिक्त आदि मेद, मज्जा
को कम करती है, वे पित्त को बढाती है, और जो मधुर आदि रस पित्त को
शान्त करते है, वे इनको बढाते है, इसलिये विषम क्रिया है। (३)
महात्यय—मज्जा, ओज, लसीका आदि महान् धातुओ का इसमे क्षय होता है ।
स्निग्ध चिकित्सा जो वायु को शमन करती है, इनको बढाती है। रूक्ष चिकित्सा
वायु को बढाती है। इसलिये ये असाध्य है¹।
प्रमेह मे कफ, पित्त और वायु ये तीन दोष है, मेद, रक्त, शुक्र, आप्य
(जलीय भाग) वसा, लसीका, मज्जा, रस, ओज और मास ये दूष्य हे ।
प्रमेहियो के बीस प्रकार के ही प्रमेह होते है ॥ ७–८ ॥
जलोपमं चेक्षुरसोपमं वा घनं घनं चोपरि विप्रसन्नम् ।
शुक्लं सशुक्रं शिशिरं शनैर्वा लालेव वा बालुकया युतं वा ॥ ९ ॥
विद्यात्प्रमेहान्कफजान्दशैतान्
दस प्रकार के कफजन्य प्रमेह—(१) जिसमे मूत्र जल के समान हो
(उदक-मेह), २–गन्ने के रस के समान हो (इक्षुमेह), ३–मूत्र घना हो
(सान्द्रमेह), ४–जिसमे मूत्र नीचे घना और ऊपर स्वच्छ हो (सान्द्रप्रसाद
प्रमेह), ५–मूत्र श्वेत हो (शुक्लमेह), ६–शुक्रमिश्रित मूत्र हो (शुक्रमेह),
७–मूत्र शीतल हो (शीतमेह), ८–मूत्र का वेग धीमा हो (शनैर्मेह), ९–मूत्र
लार के समान हो (लालामेह), १०–मूत्र बालुका के कणों से युक्त हो
(सिकतामेह), इन दस प्रमेहो को कफ से उत्पन्न हुआ जाने ॥ ६-॥
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१ प्रमेह मे दोष ओर दूष्य की समानता का होना ही सुखसाध्यता का
लक्षण है। ज्वर मे ऋतु और दोष की समानता, प्रमेह मे दोष और दूष्य की
समता तथा रक्तगुल्म मे पुरातनता ये सुखसाध्यता के चिह्न कहे जाते है ।