चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 388, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३७३
अदृश्यमाने रुधिरे दद्याद् गुल्मप्रभेदनम् ।
प्रवर्त्तमाने रुधिरे दद्यान्मांसरसौदनम् ॥ १७९ ॥
घृततैलेन चाभ्यङ्ग पानार्थं तरुणीं सुराम् ।
रुधिरेऽतिप्रवृत्ते तु रक्तपित्तहराः क्रियाः ॥ १८० ॥
कार्या वातरुगार्ता याः सर्वा वातहराः पुनः ।
घृततैलावसेकाश्च तित्तिरींश्चरणायुधान् ॥ १८१ ॥
सुरा समण्डा पूर्वा च पानमम्लस्य सर्पिषः ॥ १८२ ॥
प्रयोजयेदुत्तर वा जीवनीयेन सर्पिषा ।
अतिप्रवृत्ते रुधिरे सतिकेनानुवासनम् ॥ १८३ ॥
( ३ ) यदि इस प्रकार से गुल्म का भेदन न हो तो योनि-शोधन करावे ।
इसके लिये ( १ ) क्षार से युक्त तिल-कल्क या सेहुण्ड के दूध से युक्त तिल-
कल्क अथवा क्षार और सेहुण्ड के दूध से भावित कटु मछलियो ( शफरी
मछली ) को योनि मे रखे । [ यहा पर तिल-कल्क न लेकर मास ( छुछुन्दरी
या मूषक ) का प्रयोग करना अच्छा है । श्रीगगाधर की भी यही मान्यता है,
क्षार मे पलाशक्षार या यवक्षार बरते । ]
( २ ) पिचुओ ( फाया ), को सूअर या मछली के पित्तो से अच्छी प्रकार
भावना देकर अथवा मधु-युक्त विरेचन द्रव्यो या मधु-मिश्रित वमन-द्रव्या से
पिचुओ को भावित करके योनि मे रखे ।
( ३ ) योनि के शोधन के लिये किण्व ( सुरा-बीज ) को गुड और पलाश-
क्षार मे मिला कर योनि मे रखे । रक्तपित्तनाशक क्षार ( नीलोत्पल क्षार ) मधु
और घी के साथ चटावे ।
( ४ ) अन्नपान मे—लहसुन, तीक्ष्ण मदिरा, मछलिया देवे । दूध, गोमूत्र
और क्षार से युक्त दशमूल क्वाथ की उत्तर बस्ति देवे ।
( ५ ) यदि योनि से रक्त स्रावित न हो तो गुल्म को फाडने की
चिकित्सा करे । यदि रक्त योनि से बहता हो ता मास रस और चावल
दे, घी और तैल की मालिश करे, पीने के लिये सुरा दे । रक्त के अधिक
बहने पर रक्तपित्त नाशक क्रिया करे । वातव्याधि हा ता वातनाशक चिकित्सा
करे । घी और तैल का परिषेक, तीतर, मुर्गे के मास-रस का भोजन, सुरा, मण्ड-
युक्त सुरा, अम्ल रस द्रव्यो से युक्त घी का पान करावे । रक्त के अधिक बहने
पर जीवनीय गण से साधित घृत की उत्तर बस्ति देवे । तिक्त घृत से