चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
About this granth
The Charaka Samhita (चरक-संहिता) is the foundational text of Ayurvedic internal medicine. By tradition, the teachings of Punarvasu Atreya were set down by his disciple Agnivesha, revised by Charaka and later completed by Dridhabala of Kashmir. With eight sections and 120 chapters, it is counted with the Sushruta Samhita and Ashtanga Hridaya among the 'great three' of Ayurveda.
This volume covers the Sutra, Nidana and Vimana sections. It includes chapters such as Dirghanjivitiya, Apamarga-tanduliya, Matrashitiya and Mahachatushpada; the count of purgative formulations made from madana fruit and other drugs; the fifty great groups of herbs, beginning with the digestives; the classes of prepared foods and food sources; abscesses and boils; and the diagnosis of the five kinds of insanity.
As the title page states, this is the first part of the Charaka Samhita with a Hindi translation by Kaviraj Atridev Gupta, Vidyalankar, Bhishagratna, of Gurukul University, published by Bhargava Pustakalaya, Gaighat, Banaras. The preface mentions the Jalpakalpataru of Gangadhar Kaviraj and the Charakopaskara of Yogindranath Sen. This second edition has 639 pages.
५०८ चरकसंहिता [अ० ३]
तथा शस्त्रप्रभवस्यापि जनपदोद्ध्वंसस्याधर्म एव हेतुर्भवति ।
तेऽतिप्रवृद्ध-लोभ-रोष-मोह-मानास्ते दुर्बलानवमत्याऽऽत्मस्वजनपरोप-
घाताय शस्त्रेण परस्परमभिक्रामन्ति, परांश्वाऽतिक्रामन्ति, परैर्वाऽभि-
क्राम्यन्ते ॥ २५ ॥
रक्षोगणादिभिर्वा विविधैर्भूतसङ्घैस्तमधर्ममन्यद्वाऽप्यपचारान्तर-
मुपलभ्याभिहन्यन्ते ॥ २६ ॥
शस्त्र से होने वाले युद्ध आदि में भी जो जनपद का नाश होता है उस
का भी कारण अधर्म ही है। जिन पुरुषों में लोभ, क्रोध, मान बहुत बढ़ा होता
है, वे दुर्बल पुरुषों का तिरस्कार करके अपने और दूसरों के नाश के लिये
परस्पर शस्त्रों से आक्रमण करते हैं। इस अवस्था में राक्षस आदि नाना प्रकार
के भूत (प्राणि) समूह इस अधर्म या इसी प्रकार के अन्य अपचारों से इन
पर आघात करते हैं ॥२५-२६॥
तथाऽभिशापप्रभवस्याप्यधर्म एव हेतुर्भवति । ये लुप्तधर्माणो धर्मा-
दपेतास्ते गुरु-वृद्ध-सिद्धर्षि-पूज्यानवमत्याहितान्याचरन्ति, ततस्ताः प्रजा
गुर्वादिभिरभिशप्ता भस्मतामुपयान्ति प्रागेवानेकपुरुषकुलविनाशाय
नियतप्रत्ययोपलम्भाध्नियता अनियतप्रत्ययोपलम्भादनियताश्चापरे॥२७॥
इसी प्रकार अभिशाप से देश के नाश होने का भी मुख्य कारण अधर्म
ही है। जिन देशों में धर्म लुप्त हो जाता है और जो धर्म से च्युत हो जाते हैं;
वे गुरु, वृद्ध, सिद्ध, ऋषि, पूज्य पुरुषों का तिरस्कार करके अहित कार्यों का
सेवन करने लगते हैं। तब वे प्रजाएं गुरुजनों से शप्त होकर शीघ्र ही भस्म
हो जाती हैं। अनेक पुरुषों के कुल विनाश के लिए जहां विशेष पुरुषों के
अपराध होते हैं वहां वे ही नष्ट होते हैं और जहां निश्चित कारण नहीं होता
वहां अनियमित रूप से अनेक अन्य भी नष्ट हो जाते हैं ॥ २७ ॥
प्रागपि चाधर्मादृते नाशुभोत्पत्तिरन्यतोऽभूत् , आदिकाले ह्यदिति-
सुतसमौजसोऽतिबलविपुलप्रभावाः प्रत्यक्ष-देवर्षि-धर्म-यज्ञ-विधि-विधा-
नाः शैलेन्द्र-सार-संहत-स्थिर-शरीराः प्रसन्नवर्णन्द्रियाः पवन-सम-बल-
जब-पराक्रमाश्चारुरुचिरोऽभिरूपप्रमाणाकृतिप्रसादोपचयवन्तः सत्या-
र्जवानृशंस्य-दान-दम-नियम-तपउपवास-ब्रह्मचर्य-व्रतपरा व्यपगत-
भय-राग-द्वेष-मोह-लोभ-क्रोध-शोक-मान-रोग-निद्रा-तन्द्रा- श्रम -क्लमा-
लस्य-परिग्रहाश्च पुरुषा बभूवुरमितायुषः । तेषामुदारसत्त्वगुणकर्मणाम-
चिन्त्य-रस-वीर्य-विपाक-प्रभाव-गुण-समुदितानि प्रादुर्बभूवुः सस्यानि
सर्वगुणसमुदितत्वात्पृथिव्यादीनां कृतयुगस्याऽऽदौ ।
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०९
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०९
रोग आदि की उत्पत्ति का मूल कारण—पहले भी अधर्म के बिना किसी
अन्य कारण से रोग आदि अशुभों की उत्पत्ति नहीं हुई । कृतयुग में देवों के
समान तेज-पराक्रम वाले, अति बलवान्, विशाल प्रभाव वाले, देव, देवर्षि,
धर्म, यज्ञ विधि आदि सत्कर्मों को प्रत्यक्ष देखने वाले, पर्वत के समान दृढ,
संगठित, स्थिर शरीर वाले, निर्मल वर्ण ( कान्ति ), और इन्द्रियों से युक्त,
वायु के समान बल, वेग और पराक्रमवाले, सुन्दर नितम्बवाले, वायु के
अनुकूल अवयव परिमाण, आकृति और प्रसादवाले और गुणों और
पुष्टि से युक्त, सत्य, आर्जव ( ऋजुता, नम्रता ), अनृशंसता ( दया ), दम,
दान, नियम, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य और व्रतो में तत्पर, भय, राग, द्वेष, मोह,
लोभ, क्रोध, शोक, मान, रोग, निद्रा, तन्द्रा, श्रम, क्लम, आलस्य, परिग्रह इन
से रहित और अमित ( युगों के अनुसार दीर्घ ) आयु वाले पुरुष थे । सत्य
युग के प्रारम्भ मे इन पुरुषों के उदारचित्त और गुणों, धार्मिक कर्मों के
अचिन्त्य प्रभाव से पृथिवी आदि महाभूतो के सर्वगुणसम्पन्न होने से शस्य
( धान्य ) भी रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव और गुणों वाले उत्पन्न होते थे ।
भ्रश्यति तु कृतयुगे केषांचिदत्यादानात्सांप्रतिकानां शरीरगौरव-
मासीत् । शरीरगौरवात् श्रमः श्रमादालस्यं, आलस्यात् संचयः, संच-
यात् परिग्रहः, परिग्रहाल्लोभः प्रादुर्भूतः कृते ॥२८॥
कृतयुग के उतरते हुए अन्तिम भाग से कुछ सम्पन्न धनो लोंगों के अति-
भोजन से शरीर में भारीपन आ गया । शरीर में भारीपन आने से श्रम, श्रम
से आलस्य, आलस्य से संचय ( इकट्ठा करने की बुद्धि ), संचय से परिग्रह
( ममता ) और परिग्रह से लोभ उत्पन्न हुआ ॥ २८ ॥
ततस्त्रेतायां लोभादभिद्रोहः, अभिद्रोहादनृतवचनं, अनृतवचनात्काम-
क्रोध-मान-द्वेष-पारुष्याभिघात-भय-ताप-शोक-चित्तोद्वेगादयः प्रवृत्ताः ।
ततस्त्रेतायां धर्मपादोऽन्तर्धानमगमत्, तस्यान्तर्धानात् ( युगवर्षप्रमा-
णस्य पादह्रासः ) पृथिव्यादीनां गुणपादप्रणाशोऽभूत्, तत्प्रणाशकृतश्च
सस्यानां स्नेह-वैमल्य-रस-वीर्य-विपाक-प्रभाव-गुण-पाद-भ्रंशः । तत
स्तानि प्रजाशरीराणि हीयमानगुणपादैश्चाऽऽहारविहारैर्यथापूर्वमुपष्ट-
भ्यमानान्यग्निमारुतपरीवानि प्राग्यथाधिभिर्ज्वरादिभिराक्रान्तानि, अतः
प्राणिनो ह्रासमवापुरायुषः क्रमश इति ॥ २९ ॥
फिर त्रेता में लोभ से अभिद्रोह, अभिद्रोह से असत्य भाषण, असत्य भाषण
काम, क्रोध, मान, द्वेष, कठोर वचन, अभिघात ( परस्पर हिंसा ), भय,
५१० चरकसंहिता [ अ० ३
ताप, शोक, चिन्ता, उद्वेग आदि उत्पन्न हुए। इन के पीछे त्रेता में धर्म
का एक चरण लोप हो गया। इस धर्म के एक पांव के लोप होने से आहार-
विहार के गुणों का भी एक चतुर्थांश नष्ट हो गया। साथ में पृथिवी आदि
के गुणों में भी एक चौथाई कमी आ गई। इस कमी के कारण धान्यों के
स्नेह, निर्मलता, रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव में भी चतुर्थांश घटती हो गई।
इस से पुरुषों के शरीर के गुणों में चतुर्थांश की कमी होने से, आहार विहार
के गुणों में भी घटती होने से, पूर्व युग के समान वे अग्नि, वायु वाले नहीं
रहे। अग्नि, वायु के गुणों में भी कमी आ गई। इसलिये ज्वर आदि रोगों से
प्रथम प्रथम आक्रान्त हुए। अतः कृतयुग से प्राणियों की आयु में एक एक
चतुर्थांश की कमी हुई ॥ २९ ॥
भवतश्चात्र—युगे युगे धर्मपादः क्रमेणानेन हीयते ।
गुणापादश्च भूतानामेवं लोकः प्रलीयते ॥ ३० ॥
संवत्सरशते पूर्णे याति संवत्सरः क्षयम् ।
देहिनामायुषः काले यत्र यन्मानमिष्यते ॥ ३१ ॥
इति विकाराणां प्रागुत्पत्तिहेतुरुक्तो भवति ।
इस क्रम से प्रत्येक युग में धर्म का एक एक पाद (चतुर्थांश) क्षीण
होता जाता है। इसी क्रम से पृथिवी आदि भूतों के गुणों में भी एक एक
पाद की कमी होती जाती है। अर्थात् सत्य युग में चार पाद, त्रेता में तीन
पाद, द्वापर में दो और कलियुग में एक पाद शेष रह जाता है। इस प्रकार
से लोक प्रलय को प्राप्त होते हैं। जिस युग में मनुष्यों की आयु और युग का
जो जो परिमाण है, उस युगमान के सौ वर्ष पूर्ण होने पर आयु का एक एक
वर्ष कम हो जाता है। जैसे कलियुग में सौ वर्ष की आयु है। युगमान १००
वर्ष पूर्ण होने पर एक वर्ष कम होकर निन्यानवें (९९) वर्ष परमायु होती है।
यह रोगों के प्रथम उत्पत्ति का कारण कह दिया ॥ ३१ ॥
एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—किं नु खलु भगवन् !
नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं न वेति ॥ ३२ ॥
इस प्रकार कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने पूछा—भगवन् !
क्या आयु का समय और परिमाण सब निश्चित है या अनिश्चित ? ॥ ३२ ॥
भगवानुवाच—इहाग्निवेश ! भूतानामायुर्युक्तिमपेक्षते !॥ ३३ ॥
दैवे पुरुषकारे च स्थितं ह्यस्य बलाबलम् ।
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५११
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५११
भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश ! प्राणियों की आयु, दैव और
पुरुषकार इन दोनों का योग चाहती है। इसलिये आयु का बल और अबल
दैव और पुरुषार्थ पर स्थित है ॥ ३३ ॥
दैवमात्मकृतं विद्यात्कर्म यत्पौर्वदैहिकम् ॥ ३४ ॥
स्मृतः पुरुषकारस्तु क्रियते यदिहापरम् ।
बलाबलविशेषोऽस्ति तयोरपि च कर्मणोः ॥ ३५ ॥
अपने शरीर से जो कर्म पूर्व जन्म में किये हों उन को 'दैव' जाने। और
इस जन्म में जो कर्म किया जाता है उसे पुरुषकार कहा है। इन दोनों प्रकार
के कर्मों का विशेष बल और अबल होता है ॥ ३४-३५ ॥
दृष्टं हि त्रिविधं कर्म हीनं मध्यममुत्तमम् ।
यह कर्म भी तीन प्रकार का है। हीन, मध्यम और उत्तम ।
तयोरुदारयोर्युक्तिर्दीर्घस्य च सुखस्य च ॥ ३६ ॥
नियतस्याऽऽयुषो हेतुर्विपरीतस्य चेतरा ।
तीन प्रकार की आयु—दैव और पुरुषकार दोनों प्रकार के कर्म उत्तम
होने से आयु का परिमाण अर्थात् नियत काल दीर्घ होता है। सुखकारक एवं
हितकारक आयु मिलती है और यदि इन दोनों प्रकार के कर्मों में विपरीत
युक्ति हो तो आयु अनियत, छोटी, दुःखी एवं अहितकारक रहती है ॥ ३६ ॥
मध्यमा मध्यमस्येष्टा,कारणं शृणु चापरम् ॥ ३७ ॥
दैवं पुरुषकारेण दुर्बलं ह्यपहन्यते ।
दैवेन चेतरत्कर्म विशिष्टेनोपहन्यते ॥ ३८ ॥
इन कर्मों में मध्यम बल हो तो आयु भी मध्यम प्रकार की रहती है।
और भी कारण सुनो। जहां पर एक कर्म बलवान् हो, दूसरा निर्बल हो,
वहां पर बलवान् दुर्बल कारण को दबा लेता है। इसलिये यदि पुरुषकार-कर्म
बलवान् होगा तो निर्बल दैव को दबा लेगा और यदि दैव बलवान् होगा तो वह
दूसरे कर्म (पुरुषकार) को नष्ट कर देगा। निर्बल को बलवान् दबा लेता है ॥३८॥
दृष्ट्वा यदेके मन्यन्ते नियतं मानमायुषः ।
कर्म किंचित् क्वचित्काले विपाके नियतं महत् ।
किंचित्त्वकालनियतं प्रत्ययैः प्रतिबोध्यते ॥ ३६ ॥
इस बात को देख कर कुछ विद्वान् आयु का परिमाण निश्चित मानते हैं ।
किसी बलवान् कर्म का तो किसी विशेष निश्चित समय में ही परिपाक होता है
और किसी का विपाक काल अनिश्चित है, कभी भी उसका पाक हो सकता है ।
कौन कर्म कब पकेगा इस बात का निर्णय कारणों से किया जाता है। कभी
सहकारी अन्य कारण को पाकर कर्म का पाक होता है। किया कर्म अवश्य
भोगना पड़ता है। इस प्रकार कर्म के परिपाक काल के नियम और अनियत
होने से आयु भी नियत तथा अनियत है ॥ ३६ ॥
तस्मादुभयहृष्टत्वादेकान्तग्रहणमसाधु । निदर्शनमपि चात्रोदाहरि-
ष्यामः। यदि हि नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं स्यात्, तदायुष्कामानां न
मन्त्रौषधि-मणि-मङ्गल-बल्युपहार-होम-नियम-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्य-
यन-प्रणिपात-गमनाद्याः क्रिया इष्टयश्च प्रयुज्येरन्, नोद्भ्रान्त-चण्ड-चपल-
गो-गजोष्ट्र-खर-तुरग-महिषादयः पवनादयश्च दुष्टाः परिहार्याः स्युर्न प्रपात-
गिरि-विषम-दुर्गाम्बुवेगास्तथा न प्रमत्तोन्मत्तोद्भ्रान्त-चण्ड-चपल-मोह-
लोभाकुलमतयो नारयो न प्रवृद्धोऽग्निर्न च विविधविषाश्रयाः सरीसृपोर-
गादयः, न साहसं नादेशकालचर्या, न नरेन्द्रप्रकोप इत्येवमादयो हि
भावा नाभावकराः स्युः, आयुषः सर्वस्य नियतकालप्रमाणत्वात् ॥४०॥
इसलिये नियत और अनियत दोनों प्रकार की आयु के दीखने से कोई
एक पक्ष अर्थात् आयु का नियत वा अनियत काल मानना यह ठीक नहीं
है। इस के लिये उदाहरण भी देते हैं:-- यदि आयु का परिमाण नियत मान
लिया जाय तो दीर्घायु चाहने वाले मनुष्य आयु को बढ़ाने वाले मंत्र, ओषधि,
क्रिया, इष्टि, याग, मणि, मंगल, बलि, उपहार, नियम, प्रायश्चित, उपवास
स्वस्त्ययन, प्रणिपात, गमनादि क्रियाओं को न किया करें। इसी प्रकार इधर
उधर दौड़ते हुए भयानक, चपल, गौ, हाथी, ऊंट, गधे, घोड़े, भैंसे आदि तथा
दुष्ट वायु आदि से कोई भी अपने को न बचावे, न कोई उन को दूर करने का
यत्न करें। प्रपात (जल-प्रपात), पहाड़, कठिन दुर्ग, पानी के वेग से कोई
अपने को न बचावें। मस्त, उन्मत्त, भ्रान्त, चण्ड, चपल, मोह, लोभ से
व्याप्त बुद्धि वालों से अपने को न बचावें, शत्रु को भी निवारण न करें। तेज़
जलती अग्नि से कोई न डरे। विविध प्रकार के विषैले पदार्थों और सर्प आदि जन्तु-
ओं से कोई भय न माने। अनुचित बल के आरम्भ से न बचे। देश काल के
विपरीत आचरण से अपने को न बचावें। राजा का प्रकोप भी मृत्यु का कारण
न बन सकें। इन समस्त कारणों से भी आयु का नाश न हो। क्योंकि सब की
आयु का काल और परिमाण नियत है। आयु के नियत काल होने से यह
कारण भी मारक नहीं बनने चाहियें। मृत्यु के भय से ही लोग इस कारणों
बचते हैं ॥ ४० ॥
अ० ३ ] ३३ विमानस्थानम् ५१३
अ० ३ ] ३३ विमानस्थानम् ५१३
न चानभ्यस्ताकाल-मरण-भय-निवारकाणामकाउमरणभयमागच्छे-
त्प्राणिनां, व्यर्थाश्चाऽऽरम्भकथाप्रयोगबुद्धयः स्युर्महर्षीणां रसायनाधिकारे,
नापीन्द्रो नियतायुषं शत्रुं वज्रेणाभिहन्यात्, नाश्विनावातं भेषजेनोप-
पादयेतां, न महर्षयो यथेष्टमायुस्तपसा प्राप्नुयुः, नच विदितवेदितव्या
महर्षयः ससुरेशा रसायनादीनि सम्यक् पश्येयुरुपदिशेयुराचरेयुर्वा ।
अकाल मरण के भय का निवारण करने वाले अनभ्यासी प्राणियों को
अकाल मृत्यु के कारणों से भय भी न हो। महर्षियों के रसायनाधिकार में कहे
हुए उपदेश, प्रयोग और ज्ञान ये सब व्यर्थ हो जायें । नियत आयुशाले शत्रु
को इन्द्र भी वज्र से नहीं मार सके। अश्विनीकुमार भी रोगी पुरुष की औष-
धियों से चिकित्सा न कर सकें। और महर्षिगण तप द्वारा वांछित वर्षों तक की
आयु भी प्राप्त न कर सके। सर्वज्ञ महर्षिगण इन्द्र के साथ आयुवर्धक समाय-
नादि को न देखें, न उपदेश करें और न स्वयं व्यवहार करें । क्योकि आयु
का काल और परिमाण तो निश्चित है ।
अपि च सर्वचक्षुषामेतत्परं यदैन्द्रं चक्षुः, इदं चास्माकं प्रत्यक्षं,
यथा पुरुषसहस्राणामुत्थायात्थायाऽऽहवं कुर्वतामकुर्वतां चातुल्यायुष्ट्वं,
तथा जातमात्राणामप्रतीकारात् प्रतीकाराच्चाविषविषप्राशिनां चाप्य-
तुल्यायुष्ट्वं, न च तुल्यो योगः क्षेम उदपानघटानां चित्रघटानां चोत्सी-
दतां, तस्माद्धितोपचारमूलं जीवितमतो विपर्ययान्मृत्युः ।
सब आंखों से श्रेष्ठ प्रमाण यह इन्द्र ( आत्मा ) की आंख है—हम प्रत्यक्ष
देखते हैं कि हजारों मनुष्य प्रतिदिन उठ उठ कर शत्रों से लड़ाई करते हैं,
नहीं भी करते हैं, उन सब की आयु तुल्य नहीं होती अर्थात् लड़ने वाले मरते
और न लड़ने वाले नहीं मरते हैं। इसी प्रकार उत्पन्न हुए संन्यास रोहिणी
आदि रोगों की जो तत्काल चिकित्सा कर लेते हैं वे बच जाते हैं और जो
चिकित्सा नहीं करते वे मरते हैं। इसी प्रकार विष खाने वाले मरते हैं और विष
नहीं खाने वाले नहीं मरते । पानी रखने या लाने के लिये जो पक्के घड़े बनाये
जाते हैं उन का तथा चित्र घटों (कच्चे घड़ों) का योग-क्षेम समान नहीं हो
सकता । वे समान काल तक स्थिर नहीं रह सकते । किन्तु रक्षण करने से कच्चे
घड़े भी देर तक रह सकते हैं और न पालने से पके घड़े भी शीघ्र टूट जाते
हैं। इसलिये हितकारी वस्तुओं वा कार्यों का सेवन करना ही जीवन का निमित्त
है। इस के विपरीत अहिताचरण करना मृत्यु का कारण है ।
अपि च देशकालात्मगुणविपरीतानां कर्मणामाहारविहाराणां च
५१४ चरकसंहिता [अ० ३
क्रियोपयोगं सम्यक् सर्वतियोगसंधारणमसंधारणमुदीर्णानां च गति-
मतां साहसानां च वर्जनमारोग्यानुवृत्तौ हेतुमुपलभामहे उपदिशामः
सम्यक् पश्यामश्चेति ॥ ४१ ॥
और भी, देश, काल, आत्मा इन के गुणों के सात्म्य, कर्म तथा आहार
द्रव्यों को विधिपूर्वक उपयोग करना, काल, कर्म और इन्द्रियार्थों के अयोग,
मिथ्यायोग और अतियोग का त्याग, अनुपस्थित वेगों को रोकना ( बलात्कार से
बाहर न करना) और उपस्थित वेगों को न रोकना और सब प्रकार के साहसिक
कर्मों (अनुचित बल के कार्यों) का त्याग, ये सब बातें आरोग्य के संरक्षण में
कारण होती हैं। इस स्वस्थवृत्त का हम भली प्रकार उपदेश करते हैं और इसे
अच्छी प्रकार देखते भी हैं ॥४१॥
अतः परमग्निवेश उवाच—एवं सत्यनियतकालप्रमाणायुषां भग-
वन् ! कथं कालमृत्युरकालमृत्युर्वा भवतीति ॥४२॥
इस के अनन्तर अग्निवेश बोले ! इस प्रकार से यदि आयु का समय
अनिश्चित है, तब कालमृत्यु और अकालमृत्यु किस प्रकार होती है ? ॥४२॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—श्रूयतामग्निवेश ! यथा यानसमायुक्तोऽक्षः
प्रकृत्यैवाक्षगुणैरुपेतः ( स्यात्, संच ) सर्वगुणोपपन्नो वाह्यमानो यथा-
कालं स्वप्रमाणक्षयादेवावसानं गच्छेत्, तथाऽऽयुः शरीरोपगतं बल-
वत्प्रकृत्या यथावदुपचर्यमाणं स्वप्रमाणक्षयादेवावसानं गच्छति, स
मृत्युः काले।
भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश सुनो ! जिस प्रकार गाड़ी में लगा
अक्ष (धुरा), धुरे के समस्त गुणों से युक्त होने पर भी अधिक भार आदि के
न पड़ने से, ठीक समय में अपने परिमाण के क्षय होने पर घिसता २ टूट जाता
है, उसी प्रकार शरीर से सम्बद्ध आयु भी बलवान् प्रकृति, युक्ति तथा स्वस्थवृत्त-
विधि से पाली हुई, अपने समय में ही क्षय को प्राप्त होती है, इस मृत्यु को
'कालमृत्यु' कहते हैं।
यथा च स एवाक्षोऽतिभाराधिष्ठितत्वाद्विषमपथादपथादक्षचक्र-
भङ्गाद्द्वाह्यवाहकदोषादणिमोक्षात् पर्यसनादनुपाङ्गाच्चान्तरा व्यसनम्
धत्ते, तथाऽऽयुरप्ययथाबलमारम्भादयथाग्न्यभ्यवहरणाद्विषमाभ्यवहर-
णाद्विषमशरीरन्यासादमैथुनादसत्संश्रयादुदीर्णवेगविनिग्रहाद्विधार्य
वेगाविधारणाद् भूतविषवाय्वग्न्युपतापादभिघातादाहारप्रतीका-
र्जनाच्च यावदन्तरा व्यसनमापद्यते। तथा नियतायुष अन्तरा
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५१५
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५१५
राधाभिरुध्यन्ते । स मृत्युरकाले । तथा ज्वरादीनप्यात्वङ्गानन्मिथ्योपच-
रितानकालमृत्यून् पश्याम इति ॥४३॥
और यदि इसी अक्ष पर बहुत अधिक भार रखा जाय, अथवा विषम
मार्ग से, कुमार्ग से, धुरे या पहिये के टूटने से, बैल या वाहक ( सारथि ) के
दोष से, आणि, धुरी में लगी कील के निकल जाने से, स्नेह न पड़ने से, गिरने
से नियत समय से पूर्व ही टूट जाता है उसी प्रकार आयु भी साहसिक कार्यों
से, अग्नि के अनुसार भोजन न करने या विषम भोजन करने से, अतिमैथुन
से, उपस्थित वेगों को रोकने से, रोकने योग्य ( काम क्रोधादि ) वेगों को न
रोकने से, शरीर को विषम स्थिति में रखने से ( उत्कट आसन बैठने से ),
दुर्जनों का संसर्ग करने से, भूत, विष, वायु, अग्नि, ताप, चोट आदि से,
आहार विधि के छोड़ने से, बीच में ही आयु समाप्त हो जाती है, इस का नाम
'अकाल-मृत्यु' है। इसी प्रकार ज्वर आदि रोगों की ठीक प्रकार से चिकित्सा न
होने से इन से भी अकाल मृत्युएं होती देखते हैं ॥४३॥
अथाग्निवेशः पप्रच्छ—किं नु खलु भगवन् ! ज्वरितेभ्यः पानी-
यमुष्णं भूयिष्ठं प्रयच्छन्ति भिषजो न तथा शीतम् । अस्ति च शीत-
साध्यो धातुर्ज्वरकर इति ॥ ४४ ॥
इस के अनन्तर अग्निवेश ने पूछा—हे भगवन् ! वैद्य लोग ज्वर के रोगी
को गरम पानी अधिकतः किस लिये देते हैं ? शीतल पानी उतना नहीं देते।
शीत उपचार से भी ज्वरकारक धातु पित्त शान्त होता है ॥४४॥
तमुवाच भगवानात्रेयः,—ज्वरितस्य कायसमुत्थानदेशकाला-
नभिसमीक्ष्य पाचनार्थं पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजः । ज्वरो
ह्यामाशयसमुत्थः प्रायो भेषजानि चाऽऽमाशयसमुत्थानां विकाराणां
पाचनवमनापतर्पणसमर्थानि भवन्ति, पाचनार्थं च पानीयमुष्णं,
तस्मादेतज्ज्वरितेभ्यः प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठम् । तच्चैषां पीतं
वातमनुलोमयति, अग्निमुदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं जरां गच्छति, श्लेष्माणं
च परिशोषयति, स्वल्पमपि पीतं तृष्णाप्रशमनायोपपद्यते, तथायुक्त-
मपि चैतन्नात्यर्थोत्सन्नपित्ते ज्वरे सदाहभ्रमप्रलापातिसारे वा प्रदेयम्,
उष्णेन हि दाहभ्रमप्रलापातिसारा भूयोऽभिवर्धन्ते, शीतेनोपशाम्य-
न्तीति ॥ ४५ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—ज्वर-रोगी के शरीर, निदान
१ आमाशय से उत्पन्न विकारों में ) देश, काल को देखकर पाचन के लिये
५१६ चरकसंहिता [ अ० ३
वैद्य लोग गरम पानी देते हैं। ज्वर की उत्पत्ति आमाशय से होती है।
आमाशय से उत्पन्न होने वाले रोगों के लिये पाचन, वमन, अपतर्पण संशमन
आदि उपचार प्रायः होते हैं। इसलिये ज्वर के रोगी को पाचन कराने के लिये
वैद्य लोग गरम पानी अधिकतर देते हैं। यह पीया हुआ गरम पानी वायु का
अनुलोमन करता है, जाठराग्नि को बढ़ाता है, शीघ्र पच जाता है, जीर्ण हो
जाता है, कफ को सुखाता है और थोड़ा भी पिया हुआ गरम पानी प्यास को
शान्त करने के लिये पर्याप्त होता है। यह गरम पानी इतना लाभप्रद होने
पर भी जिस ज्वर में पित्त बहुत बढ़ा हो उस में और दाह, भ्रम, प्रलाप
अथवा अतिसार की अवस्था में भी नहीं देना चाहिये। गरमी से दाह, भ्रम,
प्रलाप और अतिसार और अधिक बढ़ते हैं। ये रोग शीत उपचार से शान्त
होते हैं ॥ ४५ ॥
भवति चात्र—शीतेनोष्णकृतान् रोगान् शमयन्ति भिषग्वििदः ।
ये तु शीतकृता रोगास्तेषां चोष्णं भिषग्जितम् ॥ ४६ ॥
चिकित्सक ज्ञानी लोग गरमी (उष्णता) से उत्पन्न हुए रोगों को शीत
चिकित्सा से शमन करते हैं और शीत कारण से उत्पन्न रोगों को उष्ण चिकि-
त्सा से शान्त करते हैं अर्थात् निदान से विपरीत चिकित्सा करते हैं ॥ ४६ ॥
एवमितरेषामपि व्याधीनां निदानविपरीतमौषधं भवति कार्यम् ।
यथा—अपतर्पणनिमित्तानामपि व्याधीनां नान्तरेण पूरणमस्ति शान्ति-
स्तथा पूरणनिमित्तानां नान्तरेणापतर्पणमिति ॥ ४७ ॥
इस प्रकार से अन्य रोगों में भी कारण के विपरीत चिकित्सा करनी होती
है। जिस प्रकार कि अपतर्पण क्रिया से उत्पन्न रोगों की शान्ति संतर्पण क्रिया
के बिना नहीं होती, उसी प्रकार संतर्पणजन्य रोगों की शान्ति अपतर्पण क्रिया के
बिना नहीं होती ॥ ४७ ॥
अपतर्पणमपि च त्रिविधं लङ्घनं, लङ्घनपाचनं, दोषावसेचनं
चेति ॥ ४८ ॥
अपतर्पण भी तीन प्रकार का है। (१) लंघन, (२) लंघन-पाचन और
(३) दोषावसेचन (दोषों का बाहर निकालना) ॥ ४८ ॥
तत्र लङ्घनमल्पबलदोषाणां, लङ्घनेन ह्यग्निमारुतवृद्ध्या वाता-
तपपरीतमिवल्पमुदकमल्पदोषः प्रतोषमापद्यते ॥ ४९ ॥
इन में जब दोषों का बल अल्प हो, तब लंघन करना चाहिये। लंघन
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५१७
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५१७
अग्नि और वायु की वृद्धि होती है । जिस प्रकार थोड़ा पानी वायु और धूप के
बढ़ने से शुष्क हो जाता है। उसी प्रकार इन की वृद्धि से अल्पबलवाला
दोष शुष्क हो जाता है ॥ ४६ ॥
लङ्घनपाचनाभ्यां हि मध्यबलो दोषः सूर्यसन्तापमारुताभ्यां
पांशुभस्मावकिरणैरिव चानतिबहूदकं प्रशाषमापद्यते ॥ ५० ॥
दोषों का मध्यम बल होने पर लंघन और पाचन कर्म करना चाहिये जिस
प्रकार सूर्य के संताप एवं वायु द्वारा धूल और भस्म के फेंकने से साधा-
रण मात्रा का पानी (बहुत अधिक राशि नहीं) सूख जाता है, उसी प्रकार
लंघन और पाचन से मध्यम बलवाले दोष शान्त हो जाते हैं। (धूल और
भस्म का फेंकना, पाचन क्रिया का उपलक्षक है और सूर्य का संताप और वायु
लंघन क्रिया का ।) ॥ ५० ॥
बहुदोषाणां पुनर्दोषावसेचनमेव कार्यं, न ह्यभिन्ने केदारसेतौ
पल्वलप्रसेकोऽस्ति, तद्वद्दोषावसेचनम् ॥ ५१ ॥
दोषों के प्रबल होने पर इन का अवसेचन (निष्कासन) ही करना
चाहिये । जैसे खेत को मेढ़ की तोड़े बिना खेत के पानी को सुखा देना अस-
म्भव है। मेढ़ को तोड़कर पानी निकाल देने से खेत शीघ्र सूख जाता है।
इसी प्रकार वमन, विरेचन आदि से अधिक बढ़े हुए दोषों को शरीर से बाहर
कर देने पर दोषों की शान्ति होती है ॥ ५१ ॥
दोषावसेचनं तु खल्वन्यद्वा भेषजं प्राप्तकालमप्यातुरस्य नैवंविध-
स्य कुर्यात्, तद्यथा—अनपवादप्रतीकारस्यापरिचारकस्य वैद्यमानिनश्च-
ण्डस्यासूयकस्य तीव्रधर्मारुचेरतिक्षीण-बल-मांस-शोणितस्यासाध्यरोगो-
पहतस्य मुमूर्षुलिङ्गन्विस्य चेति । एवंविधं ह्यातुरमुपचरन् भिषक् पापी-
यसाऽयशसा योगमृच्छतीति ॥ ५२ ॥
चिकित्सा में त्याज्य रोगी वा निम्न प्रकार के रोगी की दोषावसेचन (संशो-
धन रूप) अथवा संशमनरूप चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। यथा जिससे
अपवाद का प्रतिकार न हो सके, जो रोगी उपकरणों का संग्रह नहीं कर सके,
ऐसे निर्धन की, जिस के पास परिचारक न हो, अपने को वैद्य मानने वाले,
क्रोधी, निन्दा करने वाले, जिस का बल, मांस रक्त, बहुत क्षीण हो गया हो,
असाध्य रोग से आक्रान्त, जिस में मरणोन्मुख लक्षण स्पष्ट हों, इस प्रकार के
रोगी की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। यदि इस प्रकार के रोगी की चिकित्सा
वैद्य करता है तो पापमूलक-अपकीर्ति को प्राप्त होता है ॥ ५२ ॥
५१८ चरकसंहिता [ अ० ३
भवन्ति चात्र—अल्पोदकद्रुमो यस्तु प्रवातः प्रचुरातपः ।
ज्ञेयः स जाङ्गलो देशः स्वल्परोगतमोऽपि च ॥ ५३ ॥
प्रचुरोदकवृक्षो यो निवातो दुर्लभातपः ।
अनूपो बहुदोषश्च, समः साधारणो मतः १ ॥ ५४ ॥
जिस देश में पानी और वृक्ष कम हों, वायु और धूप बहुत प्रचण्ड हो वह
जांगल देश जानना चाहिये । उसमें बहुत कम रोग होते हैं। जिस देश में जल
और वृक्ष बहुत हों, वायु न चले और धूप भी न हो, वह अनूप देश कहाता है
जिसमें वात और धूप दोनों समान हो वह देश समदेश कहाता है ॥ ५३-५४ ॥
तदात्वे चानुबन्धे वा यस्य स्यादशुभं फलम् ।
कर्मणस्तन्न कर्त्तव्यमेतद् बुद्धिमतां मतम् ॥ ५५ ॥
तत्काल में अथवा उत्तर काल में जिस कर्म का फल अशुभ हो, वह कर्म
नहीं करना चाहिये, यह बुद्धिमानों का मत है ॥ ५५ ॥
तत्र श्लोकाः—
पूर्वरूपाणि सामान्या हेतवः स्वस्वलक्षणाः ।
देशोद्ध्वंसस्य भैषज्यं हेतूनां मूलमेव च ॥ ५६ ॥
प्राग्विकारसमुत्पत्तिरायुषश्च क्षयक्रमः ।
मरणं प्रतिभूतानां कालाकालविनिश्चयः ॥ ५७ ॥
यथा चाकालमरणं यथा युक्तं च भेषजम् ।
सिद्धिं यात्यौषधं येषां न कुर्याद्येन हेतुना ॥ ५८ ॥
तदात्रेयोऽग्निवेशाय निखिलं सर्वमुक्तवान् ।
देशोद्ध्वंसनिमित्तीये विमाने मुनिसत्तमः ॥ ५६ ॥
जनपदोद्ध्वंस के पूर्वरूप, सामान्य कारण, प्रत्येक के अपने अपने लक्षण,
चिकित्सा (पंच कर्म), कारणों का मूल कारण अधर्म, रोगों की प्रारम्भिक
उत्पत्ति, आयु और धर्म के ह्रास का क्रम, कालमृत्यु और अकालमृत्यु, निदान
और दोष, बलापेक्षित औषध, जिनकी चिकित्सा नहीं करनी, ये सब बातें इस
अध्याय में मुनिश्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने शिष्य अग्निवेश के लिये सम्पूर्ण रूप
से कह दीं ॥ ५६-५६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने जनपदोद्ध्वंसनीय-
विमानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
१. ये दो श्लोक भी कहीं २ देखने में आते हैं।
अ० ४ ] विमानस्थानम् ५१६
अ० ४ ] विमानस्थानम् ५१६
चतुर्थोऽध्यायः ।
अथातस्त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीयं विमानं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब 'त्रिविधरोग-विशेष-विज्ञानीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे,
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
त्रिविधं खलु रोगविशेषविज्ञानं भवति । तद्यथा-आप्तोपदेशः
प्रत्यक्षमनुमानं चेति ॥ ३ ॥
रोग-विशेष विज्ञान तीन प्रकार का है । जैसे-( १ ) आप्त-उपदेश,
( २ ) प्रत्यक्ष और ( ३ ) अनुमान ॥ ३ ॥
तत्राऽऽप्तोपदेशो नाम—आप्तवचनम्। आप्ता ह्यवितर्क-स्मृति-विभा-
गविदो निष्प्रीत्युपतापदर्शिनश्च । तेषामेवंगुणयोगाद्यद्वचनं तत्प्रमाणं,
अप्रमाणं पुनर्मत्तोन्मत्त-मूर्ख-वक्तृ-दृष्टादृष्ट-वचनमिति ॥ ४॥
( १ ) आप्तोपदेश—आप्तजनों के वचनों का नाम आप्त-उपदेश है ।
आप्त ही वितर्क से भिन्न अर्थात् सन्देह से रहित और स्मृति ज्ञान से युक्त
साक्षात् अनुभव और विभाग अर्थात् एक देश से भिन्न सम्पूर्ण तत्त्व के जानने
वाले । शास्त्र ज्ञान में संशय रहित एवं प्राणियों में प्रीति (राग) उपताप ( द्वेष )
के भावों से शून्य, रागद्वेषरहित होते हैं। इस प्रकार के गुण होने से इन आप्त
पुरुषों का वचन प्रमाण हो सकता है । मत्त, उन्मत्त ( पागल ), मूर्ख आदि
पुरुषों के दृष्ट¹ ( ऐहिक ) और अदृष्ट ( आमुष्मिक ) दोनों तरह के वचन
अप्रमाण होते हैं ॥४॥
प्रत्यक्षं तु खलु तत्—यत्स्वयमिन्द्रियैर्मनसा चोपलभ्यते ॥ ५ ॥
प्रत्यक्ष—जो अपनी इन्द्रियों और मन से ज्ञान होता है,वह प्रत्यक्ष है ॥५॥
अनुमानं खलु—तर्को युक्त्यपेक्षः ॥ ६ ॥
अनुमान—अनुमान तर्क है जो युक्ति की अपेक्षा करता है । ( कार्य
कारण सम्बन्ध या अव्यभिचरित व्याप्ति का नाम युक्ति है ) ॥६॥
त्रिविधेन खल्वनेन ज्ञानसमुदयेन पूर्वं परीक्ष्य रोगं सर्वथा सर्व-
मथोत्तरकालमध्यवसानमदोषं भवति । नहि ज्ञानाक्यवेन कृत्स्ने ज्ञेये
ज्ञानमुत्पद्यते ॥ ७ ॥
१. 'मूर्खरक्तदुष्टादुष्टवचनं' इति वा पाठः । मूर्ख पुरुष के दोषयुक्त और
निर्दोष वचन भी प्रमाण नहीं, अथवा मूर्ख, और ( रक्त ) दोषयुक्त, ।
५२० चरकसंहिता [ अ० ४
तीन प्रकार के ज्ञान-समुदाय से प्रथम रोग की परीक्षा करके सब प्रकार से
ओर सारा देखकर पीछे से पूर्ण निश्चय करके चिकित्सा करना निर्दोष होता है ।
ज्ञान के एक अवयव को जान लेने से ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य वस्तु का सम्पूर्ण
ज्ञान नहीं हो सकता । इसलिये वैद्य को चाहिये कि तीनों प्रमाणों से रोग को
एक अंश में ही नहीं, प्रत्युत सम्पूर्ण रूप में जाने ॥७॥
त्रिविधे त्वस्मिन् ज्ञानसमुदाये पूर्वमाप्तोपदेशाज्ज्ञानम् । ततः प्रत्य-
क्षानुमानाभ्यां परीक्षोपपद्यते । किं ह्यनुपदिष्टे पूर्वं प्रत्यक्षानुमानाभ्यां
परीक्षमाणो विद्यात् ? तस्मात् द्विविधा परीक्षा ज्ञानवतां प्रत्यक्षमनु-
मानं चेति, त्रिविधा वा सहोपदेशेन ॥ ८ ॥
इस तीन प्रकार के ज्ञान समुदाय में सब से प्रथम 'आप्तोपदेश' से ज्ञान
होता है। इसके पीछे प्रत्यक्ष और अनुमान द्वारा परीक्षा होती है। यदि पूर्व
आप्तोपदेश न हो तो परीक्षा करता हुआ वैद्य प्रत्यक्ष और अनुमान से क्या
जानेगा ? कुछ भी नहीं । इसलिये आप्तोपदेश से प्राप्त ज्ञान वालों के लिये
परीक्षा दो प्रकार की है प्रत्यक्ष और अनुमान । अथवा आप्तोपदेश को मिला
कर तीन प्रकार की है—प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्तोपदेश ॥८॥
तत्रेद्दमुपदिशन्ति बुद्धिमन्तः—रोगमेकैकमेवं प्रकोपणमेवंयोनिमेव-
मात्मानमेवमधिष्ठानमेवंवेदनमेवं संस्थानमेवं वृद्धिस्थानक्षयसमन्वितमे-
वमुदर्कमेवंनामानमेवंयोगं विद्यात् । तस्मिन्नियं प्रतीकारार्था प्रवृत्तिरथवा
निवृत्तिरित्युपदेशाज्ज्ञायते ॥ ९ ॥
आप्तोपदेश से एक एक रोग में ऐसे प्रकोप, ऐसी योनि (प्रकृति वातादि
की विषमता ), ऐसी उत्पत्ति, ऐसा स्वरूप, ऐसा अधिष्ठान (मन और शरीर),
ऐसी वेदना (पीड़ा), ऐसा संस्थान (लक्षण), ऐसे २ शब्द, स्पर्श, रूप, रस,
गन्ध, ऐसा उपद्रव (रोग के पीछे दूसरा होने वाला रोग), ऐसी दोषों की वृद्धि,
स्थान और क्षय, उदर्क (उत्तर फल-साध्य-असाध्य), इस प्रकार का नाम,
ऐसा योग ये सब बातें बुद्धिमान् लोग उपदेश करते हैं, उनके उपदेश से
जानना चाहिये । इस प्रकार की व्याधि में इस प्रकार का प्रतिकार वा चिकित्सा
है, अथवा इस रोग में असाध्य होने से निवृत्ति (चिकित्सा न करना), ये दोनों
प्रकार की प्रवृत्ति और निवृत्ति भी उपदेश से ही जानी जाती हैं ॥६॥
प्रत्यक्षतस्तु खलु रोगतत्त्वं बुभुत्सुः सर्वैरिन्द्रियैः सर्वानिन्द्रियार्था-
नातुर-शरीर-गतानपरीक्षेतान्यत्र रसज्ञानात्; तद्यथा,—अन्त्रकूजनं संधि-
स्फोटनमङ्गुलीपर्वणां च स्वरविशेषा ये चान्येऽपि केचिच्छरीरोपगताः
अ० ४ ] विमानस्थानम् ५२१
अ० ४ ] विमानस्थानम् ५२१
शब्दाः स्युस्तान् श्रोत्रेण परीक्षेत । वर्ण-संस्थान-प्रमाण-च्छायाः शरीरप्र-
कृतिविकारौ चक्षुर्वैषयिकाणि यानि चान्यानि तानि चक्षुषा परीक्षेत ।
प्रत्यक्ष द्वारा रोग जानने की इच्छा से वैद्य रोगी मनुष्य की इन्द्रियों के
द्वारा जानने योग्य सब बातों की वह अपनी इन्द्रियों से परीक्षा करे केवल रस
ज्ञान को छोड़कर । जैसे-आंतों के शब्द, अंगुली के पर्वों की सन्धियों का चट-
कन, रोगी शरीर के भिन्न भिन्न स्वरों को, इनके अतिरिक्त रोगी के जन्य जो
(हिचकी, श्वास आदि ) शब्द हों, उनकी श्रोत्र द्वारा परीक्षा करे । वर्ण, अंगों
की बनावट, शरीर और अवयवों का माप (छोटाई, बड़ाई, स्थूलता, कृशता ),
छाया (कान्ति ), शरीर के प्राकृतिक एवं वैकृतिक भावों (परिवर्तनों) को एवं
चक्षु इन्द्रिय के ग्राह्य और जो यहां पर न कही बातें हों (मल, मूत्र आदि ),
उनकी भी आंख से परीक्षा करनी चाहिये ।
रसं तु खल्वातुरशरीरगतमिन्द्रियवैषयिकमप्यनुमानादवगच्छेन्न, न
ह्यस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणमुपपद्यते, तस्मादातुरपरिप्रश्नेनैवाऽऽतुरमुखरसं
विद्यात्, यूकापसर्पणेन त्वस्य शरीरवैरस्यं, मक्षिकोपसर्पणेन शरीर-
माधुर्यं, लोहितपित्तसंदेहे तु किं धारिलोहितं लोहितपित्तं वेति श्वकाक-
भक्षणाद्धारिलोहितमभक्षणाल्लोहितपित्तमित्यनुमातव्यं, एवमन्यानप्या-
तुरशरीरगतान रसाननुमिमीत । गन्धांस्तु खलु सर्वशरीरगताना तुरस्य
प्रकृतिवैकारिकान् घ्राणेन परीक्षेत । स्पर्शं च पाणिना प्रकृतिविकृति-
युक्तम्-इति प्रत्यक्षतोऽनुमानैकदेशतश्च परीक्षणमुक्तम् ॥१०॥
रोगी के शरीर के रस को, इन्द्रिय का विषय होने पर भी, अनुमान द्वारा
ही जानना चाहिये । क्योंकि रोगी के शरीर के रस का प्रत्यक्ष द्वारा ग्रहण नहीं
हो सकता । बीमारी में मुख का स्वाद बदल जाता है, इसलिये रोगी से पूछकर
ही उसके मुख का रस जानना चाहिये । यथा-शरीर पर जूं आदि के चलने
से शरीर में विरसता, शरीर पर मक्खी आदि के पास भिनकने से शरीर में
मधुरता समझनी चाहिये । रक्तपित्त के सन्देह में यह रक्त शुद्ध (शरीर को
धारण करने वाला ) है या रक्तपित्त (पित्त से दूषित रक्त) का है तो यदि इस
रक्त को कुत्ते, कौवे खा लें तो शुद्ध रक्त समझना चाहिये और यदि न खायें तो
रक्तपित्त रोग से दूषित रक्त समझना चाहिये । इस प्रकार से रोगी के शरीर के
अन्य रसों को भी अनुमान से जानना चाहिये । रोगी के सम्पूर्ण शरीर की
प्राकृतिक एवं वैकृतिक गन्धों की परीक्षा घ्राणेन्द्रिय (नासिका) द्वारा करनी
चाहिये । स्पर्श, शीत, उष्ण, खर, चिकने आदि प्राकृतिक एवं वैकृतिक स्पर्शों
५२२ चरकसंहिता [ अ० ४
को हाथ के स्पर्श से जानना चाहिये। यहाँ पर प्रत्यक्ष तथा अनुमान से एक
भाग से परीक्षा कह दी ॥१०॥
इमे तु खल्वन्येऽप्येवमेव भूयोऽनुमानज्ञेया भवन्ति भावाः।
तद्यथा, अग्निं जरणशक्त्या परीक्षेत, बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रा-
दीन् शब्दादिग्रहणेन, मनोऽर्थाव्यभिचरणेन, विज्ञानं व्यवसायेन, रजः
सङ्गेन, मोहमविज्ञानेन, क्रोधमभिद्रोहेण, शोकं दैन्येन, हर्षमामोदेन,
प्रीतिं तोषेण, भयं विषादेन, धैर्यमविषादेन, वीर्यमुत्थानेन, अवस्थान-
मविभ्रमेण, श्रद्धामभिप्रायेण, मेधां ग्रहणेन, संज्ञां नामग्रहणेन, स्मृतिं
स्मरणेन, हियमपत्रापणेन, शीलमनुशीलनेन, द्वेषं प्रतिषेधेन, उपधिमनु-
बन्धेन,धृतिमलौल्येन,वश्यतां विधेयतया, वयो-भक्ति-सात्म्य-व्याधि-स-
मुत्थानानि काल-देशोपशय-वेदना-विशेषेण, गूढलिङ्गं व्याधिमुपशयानु-
पशयाभ्यां, दोषप्रमाणविशेषमपचारविशेषेण, आयुषः क्षयमरिष्टैः,
उपस्थितश्रेयस्त्वं कल्याणाभिनिवेशेन, अमलं सत्त्वमविकारेणेति। ग्रह-
ण्यास्तु मृदुदारुणत्वं स्वप्नदर्शनमभिप्रायं दृष्टेष्टसुखदुःखानि चाऽऽतुरप-
रिप्रश्नेनैव विद्याद्—इति ॥ ११॥
इसके अतिरिक्त ये निम्नलिखित बातें भी अनुमान द्वारा ही जानी जाती हैं।
जैसे—रोगी की परिपाक शक्ति को देखकर अग्नि ( जाठराग्नि ) को जाने।
व्यायाम शक्ति से रोगी का बल, शब्द आदि विषयों के ग्रहण से कान आदि
इन्द्रियों को, मन को अवधारण शक्ति से, विज्ञान को उद्योग से, संग
( आसक्ति ) से रज को, अज्ञान से मोह को, हिंसा प्रवृत्ति से क्रोध को,
रोदन आदि से शोक को, गीत, वादित्र आदि से आनन्दको मुख की
प्रसन्नता आदि लक्षणों से मन की प्रीति को, मुख की मलिनता आदि से
भय को, अविषाद से धैर्य ( विपत्ति में भी मन की स्थिरता ) को, उत्साह से
वीर्य ( कार्य करने की शक्ति ) को, अभ्रान्ति से स्थिरता को, अभिप्राय
( प्रार्थना ) से श्रद्धा को, श्लोक आदि को कण्ठ करने से मेधा को, नाम लेकर
चेतना को, स्मरण शक्ति से स्मृति को, लज्जा दिलाकर लज्जा को, निरन्तर शीलन
से स्वभाव को, वस्तु के प्रतिषेध से उस वस्तु में द्वेष को, आगे के परिणामसे
छल व्यवहार को, मन की अचपलता से संतोष को, वैद्य की आज्ञा मानने
से रोगी की वश्यता को, काल विशेष से आयु, देश से भक्ति
( इच्छा ) को, ( जैसे-यह पंजाब का रहने वाला है इसलिये इसे गेहूं में इच्छा
होगी, यह बंगाल का है इसकी चावलों में रुचि होगी इत्यादि ), उपशय अर्थात्
अनुकूलता से सात्म्य को, वेदना-विशेष से व्याधि के समुत्थान को, उपशय
(शान्ति) और अनुपशय (निदान) द्वारा गूढ़लिंग वाले रोग को, जिस रोगके
लक्षण छिपे हों (जैसे विद्रधि और गुल्म के भेद), उपचार विशेष (प्रकोपनके
न्यूनाधिक होने से) दोषों के प्रमाण विशेष (न्यूनाधिक) को अरिष्ट लक्षणोंसे,
आयु के क्षय को हितोपसेवन से, निकटवर्त्ती आरोग्यता के लक्षणों को अविकार
(काम, क्रोधादि से रहित मानसिक विकारों) से निर्मल चित्त को जाने ।
ग्रहणी (अग्नि का स्थान, जठर) के मृदु दारुण भेद को रोगी के हित-
अहित स्वप्न दर्शन से, भोजनादि में अभिप्राय (इच्छा) को, द्विष्ट, अप्रिय
और इष्ट, प्रिय इनमें सुख और दुःख को रोगी के प्रश्नों से ही जान ले ॥ ११ ॥
भवन्ति चात्र—आप्तोपदेशेन प्रत्यक्षकरणेन च ।
अनुमानेन च व्याधीन् सम्यग्विद्याद्विचक्षणः ॥ १२ ॥
सर्वथा सर्वमालोच्य यथासंभवमर्थवित् ।
अथाध्यवस्येत्तत्त्वे च कार्ये च तदनन्तरम् ॥ १३ ॥
कार्यतत्त्वविशेषज्ञः प्रतिपत्तौ न मुह्यति ।
अमूढः फलमाप्नोति यदमोहनिमित्तजम् ॥ १४ ॥
ज्ञानबुद्धिप्रदीपेन यो नाऽऽविशति तत्त्ववित् ।
आतुरस्यान्तरात्मानं न स रोगांश्चिकित्सति ॥ १५ ॥
चतुर व्यक्ति आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष और अनुमान द्वारा रोगों की परीक्षा करे।
अर्थवित् यथासम्भव सब रोगों की सब प्रकार से (तीनों प्रकार से) परीक्षा
कर के निश्चय करे, इसके पीछे चिकित्सा कार्य करे । कार्यतत्त्व को जाननेवाला
भिषक् रोग के चिकित्सा-कार्य में कभी भी मोह को प्राप्त नहीं होता ।
प्रमादरहित होकर ही मोह रहित होकर किये अनुष्ठान से उत्पन्न फल को प्राप्त
करता है। जो योगवित् (प्रयोगों को जानने वाला) भिषक् (वैद्य) ज्ञान,
बुद्धि रूपी प्रदीप की सहायता से रोगी के अन्दर तक नहीं पहुंचता (रोगी की
सम्पूर्ण बातों को नहीं जानता), वह रोगोंकी चिकित्सा नहीं कर सकता ॥१२-१५॥
तत्र श्लोकौ—सर्वरोगविशेषाणां त्रिविधं ज्ञानसंग्रहम् ।
यथा चोपविशन्त्याप्ताः प्रत्यक्षं गृह्यते यथा ॥ १६ ॥
ये यथा चानुमानेन ज्ञेयास्तांश्चाप्युदारधीः ।
भावांश्चिरोगविज्ञाने विमानं मुनिरुक्तवान् ॥ १७ ॥
उपसंहार—सब रोगों का तीन प्रमाणों में संक्षेप, आप्तोपदेश द्वारा जो जो
बातें जानी जाती हैं, प्रत्यक्ष द्वारा जो ग्रहण किया जाता है और जो बातें अनु-
५२४ चरकसंहिता [ अ० ५
मान द्वारा जानी जाती हैं इन सब बातों का उदार बुद्धि भगवान् आत्रेय ने
इस 'त्रिरोग विज्ञानीय' अध्याय में व्याख्यान कर दिया ॥ १६-१७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने त्रिविधरोग-
विशेषविज्ञानीयविमानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः।
अथातः स्रोतोविमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
जीवन के आधारभूत प्राणवह आदि स्रोतों के ज्ञान के लिये 'स्रोतोविमान' नाम
अध्याय की व्याख्या करते हैं। ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥१-२॥
यावन्तः पुरुषे मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्त एवास्मिन् स्रोतसां
प्रकारविशेषाः, सर्वभावा हि पुरुषे नान्तरेण स्रोतांस्यभिनिर्वर्तन्ते क्षयं
वाऽप्यधिगच्छन्ति । स्रोतांसि खलु परिणाममापद्यमानानां धातूनाम-
भिवाहीनि भवन्त्ययनार्थेन ॥ ३ ॥
इस पुरुष के शरीर में जितने प्रकार के मूर्तरूप ( स्थूल ) भाव विशेष
( पदार्थ विशेष ) हैं, उतने ही इस शरीर में स्रोतों के प्रकार ( विशेष भेद )
हैं। पुरुष में सब भाव स्रोतों के बिना नहीं बढ़ते और न स्रोतों के बिना क्षय
को प्राप्त होते हैं। ये स्रोत परिपाक हुए धातुओं को ( मल और प्रसाद रूप में )
ले जाने के लिये होते हैं ॥ ३ ॥
अपि चैके स्रोतसामेव समुदयं पुरुषमिच्छन्ति, सर्वगतत्वात्सर्व-
सरत्वाच्च दोषप्रकोपणप्रशमनानाम्, न त्वेतदेवम्। यस्य च हि स्रोतांसि
यच्च वहन्ति यच्चावहन्ति यत्र चावस्थितानि, सर्वं तदन्यत्तेभ्यः ॥ ४ ॥
कुछ आचार्य स्रोतों के समुदाय को ही 'पुरुष' नाम देते हैं। क्योंकि स्रोत
सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हैं। दोषों के जो प्रकोपक ( अपथ्य ) हैं और जो शमन
( पथ्य ) हैं, वे सब स्रोतों द्वारा ही सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होते हैं। परन्तु ऐसा
मानना ठीक नहीं है। क्योंकि जिसके स्रोत जिस वस्तु का वहन करते हैं, जिस
प्रकार से अवहन करते हैं, शरीर के जिस प्रदेश में ये स्रोत स्थित हैं, यह सब
इन स्रोतों से पृथक् हैं, वे स्रोत नहीं हैं। इस लिये पुरुष स्रोतों का समुदाय
रूप नहीं है ॥ ४ ॥
अ० ५ ] विमानस्थानम् ५२५
अ० ५ ] विमानस्थानम् ५२५
अतिबहुत्वात्तु खलु केचिदपरिसंख्येयान्यचक्षते स्रोतांसि, परि-
संख्येयानि पुनरन्ये ॥ ५ ॥
स्रोतों के बहुत अधिक होने से कुछ आचार्य इन स्रोतों को असंख्य मानते
हैं । दूसरे आचार्य इन को गणना के योग्य मानते हैं ॥ ५ ॥
तेषां तु खलु स्रोतसां यथास्थूलं कतिचित्प्रकारान्मूलतश्च प्रकोप-
विज्ञानतश्चानुव्याख्यास्यामः, भविष्यन्त्यलमनुक्तार्थज्ञानाय ज्ञानवतां
विज्ञानाय चाज्ञानवताम् । तद्यथा- प्राणोदकान्न-रस-रुधिर-मांस-मेदोऽस्थि-
मज्ज-शुक्र-मूत्र-पुरीष-स्वेदवहानि, वातपित्तश्लेष्मणां पुनः सर्वशरीरचराणां
सर्वस्रोतांस्ययनभूतानि, तद्वदतीन्द्रियाणां पुनः सत्त्वादीनां केवलं चेत-
नावच्छरीरमयनभूतमधिष्ठानभूतं च । तदतत्स्रोतसां प्रकृतिभूतत्वान्न
विकारैरुपसृज्यते शरीरम् ॥ ६ ॥
इन सांतों में जो स्थूल ( गणना के योग्य ) हैं, उन के कुछ भेदों की
मूल से, प्रकोप-विज्ञान ( और उपशमन ) से भी व्याख्या करेंगे सांतों की इतनी
व्याख्या बुद्धिमान् ज्ञानवान् वैद्यों के लिये अनुक्त, सूक्ष्म स्रोतों का ज्ञान कराने
और अज्ञानी, अनुमान और युक्ति से हीन पुरुषों के लिये सामान्य रूप में सांतों
का ज्ञान कराने के लिये पर्याप्त होगी ।
यथा- प्राणवह, जलवह, अन्नवह, रसवह, रुधिरवह, मांसवह, मेदवह,
अस्थिवह, मज्जावह, शुक्रवह, मूत्रवह, पुरीषवह और स्वेदवह ये तेरह प्रकार के
स्रोत हैं । वात, पित्त, कफ ये सम्पूर्ण शरीर में फैले हुए हैं, इस लिये इन को ले
जानेवाले सब स्रोत हैं । इसी प्रकार अतीन्द्रिय ( इन्द्रियों से अग्राह्य ) सत्त्व
आदि ( मन आदि ) पदार्थों का चेतना युक्त यह सम्पूर्ण शरीर मार्ग तथा
आश्रय है । स्रोत शरीर के धातुओं को ले जानेवाले हैं, इसलिये सांतों के
प्रकृति में स्थित रहने से यह शरीर विकारों अर्थात् रोगों से आक्रान्त नहीं होता
सांतों के विकृत होने पर शरीर भी रोगी हो जाता है ॥६॥
तत्र प्राणवहानां स्रोतसां हृदयं मूलं महास्रोतश्च, प्रदुष्टानां खल्वे-
षामिदं विशेषविज्ञानं भवति, अतिसृष्टमतिबद्धं कुपितमल्पाल्पमभी-
क्ष्णं वा सशब्दशूलमुच्छ्वसन्तं दृष्ट्वा प्राणवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टा-
नीति विद्यात् ॥ ७ ॥
इन से प्राणवह स्रोतों का मूल ( प्रभाव स्थान ) हृदय और महा सांत
(कोष्ठ भी) है। इन प्राणवह सांतों के दुष्ट होने पर ये लक्षण होते हैं। जैसे-प्राण
का अतिसर्पण ( प्रश्वास का दीर्घ होना ), अतिबद्ध ( रुक रुक कर श्वास का
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चलना), प्रकुपित (बहुत तेजी से चलना), थोड़ा थोड़ा चलना, अभीक्ष्ण (बार-
बार रुक रुक कर आना), शब्दशूल अर्थात् वेदनायुक्त शब्द के साथ, श्वास लेते
हुए रोगी को देखकर प्राणवह-स्रोत दुष्ट हुए हैं यह समझना चाहिये ॥७॥
उदकवहानां स्रोतसां तालुमूलं क्लोम च। प्रदुष्टानां खल्वेषामिदं
विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा—जिह्वा-ताल्वोष्ठ-कण्ठ-क्लोम-शोषं पिपासां
चातिप्रवृद्धां दृष्ट्वा भिषगुदकवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥८॥
उदकवह स्रोतों का मूल तालु और क्लोम (पित्ताशय) है। इन उदक-
वह स्रोतों के दुष्ट होने पर ये लक्षण होते हैं। यथा—जिह्वा, तालु, ओष्ठ, कण्ठ
क्लोम का सूख जाना, प्यास का बहुत अधिक लगना ये लक्षण देखकर उदक-
वह-स्रोत विकृत हुए हैं यह समझना चाहिये ॥८॥
अन्नवहानां स्रोतसामामाशयो मूलं वामं च पार्श्वम्। प्रदुष्टानां तु
खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा—अनन्नाभिलषणमरोचका-
विपाकौ छर्दि च दृष्ट्वाऽन्नवहानि स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ ६ ॥
अन्नवह स्रोतों का मूल आमाशय और वाम पार्श्व है। इन के दुष्ट होने पर
ये लक्षण होते हैं। यथा—अन्न की रुचि का न होना, अरुचि, अविपाक, वमन।
इन लक्षणों को देखकर अन्नवह स्रोत विकृत हुए यह समझना चाहिये ॥ ९ ॥
रसवहानां स्रोतसां हृदयं मूलं दश च धमन्यः। शोणितवहानां
स्रोतसां यकृन्मूलं प्लीहा च। मांसवहानां च स्रोतसां स्नायु मूलं त्वक्च
मेदोवहानां स्रोतसां वृक्कौ मूलं वपावहनं च। अस्थिवहानां स्रोतसां
मेदो मूलं जघनं च। मज्जावहानां स्रोतसामस्थीनि मूलं संधयश्च।
शुक्रवहानां स्रोतसां वृषणो मूलं शेफश्च। प्रदुष्टानां तु खल्वेषां रसा-
दिस्रोतसां विज्ञानान्युक्तानि विविधाशितपीतीयेऽध्याये। यान्येव हि
धातूनां प्रदोषविज्ञानानि तान्येव यथास्वं धातुस्रोतसाम् ॥ १० ॥
रसवह स्रोतों का मूल हृदय और हृदय से सम्बद्ध दस धमनियां
हैं। शोणित (रक्त) वह स्रोतों का मूल यकृत् और प्लीहा है।
मांसवह स्रोतों का मूल स्नायु और त्वचा है। मेदोवह स्रोतों का मूल दो
वृक्क (दो मांसपिण्ड एक दक्षिण पार्श्व में स्थित और दूसरा वाम पार्श्व में
१. क्लोम को सुश्रुत में 'पिपासा-स्थान' माना है। क्लोम का स्थान गले में
जरा नीचे की ओर दक्षिण पार्श्व में मना है। जिसको आज कल 'तिलक' या
(कण्ठकूप) कहते हैं। वैद्य श्री हरिप्रपन्न ने 'क्लोम याथातथ्यम्' नाम एक
पुस्तक लिखी है उस में पित्ताशय को यह नाम दिया है।
अ० ५ ] विमानस्थानम् ५२७
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वृक्क ) और वपावह है । अस्थिवह स्रोतों का मूल मेद और जघन है । मज्जा-
वह स्रोतों का मूल अस्थियां और सन्धियां हैं । शुक्रवह स्रोतों का मूल दोनों
अण्डकोश और लिङ्ग-इन्द्रिय हैं । विविधाशितपीतीय अध्याय में रसादि धातुओं
के दुष्ट होने से उत्पन्न होने वाले रोगों को कह दिया है । ये ही इन रसवह
आदि स्रोतों के दुष्ट होने के लक्षण हैं । जो दूषित हुए धातुओं के लक्षण हैं वे
ही दुष्ट हुए धातुवह स्रोतों के भी लक्षण होते हैं ॥१०॥
मूत्रवहानां स्रोतसां बस्तिर्मूलं वङ्क्षणौ च । खल्वेषामिदं विशेष-
विज्ञानं भवति । तद्यथा अतिसृष्टमतिबद्धं कुपितमल्पल्पमभीक्ष्णं वा
बहलं सशूलं मूत्रयन्तं दृष्ट्वा मूत्रवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति
विद्यात् ॥ ११ ॥
मूत्रवह स्रोतो का मूल बस्ति ( मूत्राशय ) और वंक्षण ( वृक्क ) हैं । इन
के दूषित होने पर ये लक्षण होते हैं । जैसे-मूत्र का अधिक आना, रुक २ कर
आना, बार बार आना, थोड़ा थोड़ा आना, मात्रा में अधिक ( गाढ़ा ), दर्द
के साथ आना । ये लक्षण देखकर मूत्रवह स्रोत दुष्ट हुए समझने चाहिये ॥११॥
पुरीषवहानां स्रोतसां पक्वाशयो मूलं स्थूलगुदञ्च । प्रदुष्टानां
खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति । तद्यथा-कृच्छ्रेणाल्पल्पं सशूल-
मतिद्रवं कुथितमतिग्रथितमतिबहु चोपविशन्तं दृष्ट्वा पुरीषवहान्यस्य
स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ १२ ॥
पुरीषवह स्रोतो का मूल पक्वाशय, स्थूलांत्र और गुदा है। इन के दूषित
होने पर ये लक्षण होते हैं । तथा-कठिनाई से थोड़ा थोड़ा, शब्द और वेदना
के साथ, बहुत पतला ( पानी जैसा ), बहुत कठिन, मात्रा में मल का बहुत
अधिक आना, इन लक्षणों को देखकर पुरीषवह-स्रोत दुष्ट हुए हैं यह समझना
चाहिये ॥ १२ ॥
स्वेदवहानां स्रोतसां मेदो मूलं रोमकूपाश्च । प्रदुष्टानां खल्वेषा-
मिदं विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा-अस्वेदनमतिस्वेदनं पारुष्यमति-
श्लक्ष्णतामङ्गस्य परिदाहं लोमहर्षं च दृष्ट्वा स्वेदवहान्यस्य स्रोतांसि
प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ १३ ॥
स्वेदवह स्रोतों का मूल मेद और लोमकूप हैं। इन के दूषित होने पर ये
लक्षण होते हैं। जैसे-पसीने का न आना या बहुत आना, त्वचा में कठोरता
या बहुत चिकनास, अङ्गों में दाह और शरीर में रोमांच होना । इन लक्षणों को
देखकर स्वेदवह-स्रोत दुष्ट हुए हैं यह समझना चाहिये ॥ १३ ॥