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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 540 of 639

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Page 540

५२२ चरकसंहिता [ अ० ४

को हाथ के स्पर्श से जानना चाहिये। यहाँ पर प्रत्यक्ष तथा अनुमान से एक
भाग से परीक्षा कह दी ॥१०॥
इमे तु खल्वन्येऽप्येवमेव भूयोऽनुमानज्ञेया भवन्ति भावाः।
तद्यथा, अग्निं जरणशक्त्या परीक्षेत, बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रा-
दीन् शब्दादिग्रहणेन, मनोऽर्थाव्यभिचरणेन, विज्ञानं व्यवसायेन, रजः
सङ्गेन, मोहमविज्ञानेन, क्रोधमभिद्रोहेण, शोकं दैन्येन, हर्षमामोदेन,
प्रीतिं तोषेण, भयं विषादेन, धैर्यमविषादेन, वीर्यमुत्थानेन, अवस्थान-
मविभ्रमेण, श्रद्धामभिप्रायेण, मेधां ग्रहणेन, संज्ञां नामग्रहणेन, स्मृतिं
स्मरणेन, हियमपत्रापणेन, शीलमनुशीलनेन, द्वेषं प्रतिषेधेन, उपधिमनु-
बन्धेन,धृतिमलौल्येन,वश्यतां विधेयतया, वयो-भक्ति-सात्म्य-व्याधि-स-
मुत्थानानि काल-देशोपशय-वेदना-विशेषेण, गूढलिङ्गं व्याधिमुपशयानु-
पशयाभ्यां, दोषप्रमाणविशेषमपचारविशेषेण, आयुषः क्षयमरिष्टैः,
उपस्थितश्रेयस्त्वं कल्याणाभिनिवेशेन, अमलं सत्त्वमविकारेणेति। ग्रह-
ण्यास्तु मृदुदारुणत्वं स्वप्नदर्शनमभिप्रायं दृष्टेष्टसुखदुःखानि चाऽऽतुरप-
रिप्रश्नेनैव विद्याद्—इति ॥ ११॥
इसके अतिरिक्त ये निम्नलिखित बातें भी अनुमान द्वारा ही जानी जाती हैं।
जैसे—रोगी की परिपाक शक्ति को देखकर अग्नि ( जाठराग्नि ) को जाने।
व्यायाम शक्ति से रोगी का बल, शब्द आदि विषयों के ग्रहण से कान आदि
इन्द्रियों को, मन को अवधारण शक्ति से, विज्ञान को उद्योग से, संग
( आसक्ति ) से रज को, अज्ञान से मोह को, हिंसा प्रवृत्ति से क्रोध को,
रोदन आदि से शोक को, गीत, वादित्र आदि से आनन्दको मुख की
प्रसन्नता आदि लक्षणों से मन की प्रीति को, मुख की मलिनता आदि से
भय को, अविषाद से धैर्य ( विपत्ति में भी मन की स्थिरता ) को, उत्साह से
वीर्य ( कार्य करने की शक्ति ) को, अभ्रान्ति से स्थिरता को, अभिप्राय
( प्रार्थना ) से श्रद्धा को, श्लोक आदि को कण्ठ करने से मेधा को, नाम लेकर
चेतना को, स्मरण शक्ति से स्मृति को, लज्जा दिलाकर लज्जा को, निरन्तर शीलन
से स्वभाव को, वस्तु के प्रतिषेध से उस वस्तु में द्वेष को, आगे के परिणामसे
छल व्यवहार को, मन की अचपलता से संतोष को, वैद्य की आज्ञा मानने
से रोगी की वश्यता को, काल विशेष से आयु, देश से भक्ति
( इच्छा ) को, ( जैसे-यह पंजाब का रहने वाला है इसलिये इसे गेहूं में इच्छा
होगी, यह बंगाल का है इसकी चावलों में रुचि होगी इत्यादि ), उपशय अर्थात्