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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 535 of 639

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Page 535

अ० ३ ] विमानस्थानम् ५१७
अग्नि और वायु की वृद्धि होती है । जिस प्रकार थोड़ा पानी वायु और धूप के
बढ़ने से शुष्क हो जाता है। उसी प्रकार इन की वृद्धि से अल्पबलवाला
दोष शुष्क हो जाता है ॥ ४६ ॥
लङ्घनपाचनाभ्यां हि मध्यबलो दोषः सूर्यसन्तापमारुताभ्यां
पांशुभस्मावकिरणैरिव चानतिबहूदकं प्रशाषमापद्यते ॥ ५० ॥
दोषों का मध्यम बल होने पर लंघन और पाचन कर्म करना चाहिये जिस
प्रकार सूर्य के संताप एवं वायु द्वारा धूल और भस्म के फेंकने से साधा-
रण मात्रा का पानी (बहुत अधिक राशि नहीं) सूख जाता है, उसी प्रकार
लंघन और पाचन से मध्यम बलवाले दोष शान्त हो जाते हैं। (धूल और
भस्म का फेंकना, पाचन क्रिया का उपलक्षक है और सूर्य का संताप और वायु
लंघन क्रिया का ।) ॥ ५० ॥
बहुदोषाणां पुनर्दोषावसेचनमेव कार्यं, न ह्यभिन्ने केदारसेतौ
पल्वलप्रसेकोऽस्ति, तद्वद्दोषावसेचनम् ॥ ५१ ॥
दोषों के प्रबल होने पर इन का अवसेचन (निष्कासन) ही करना
चाहिये । जैसे खेत को मेढ़ की तोड़े बिना खेत के पानी को सुखा देना अस-
म्भव है। मेढ़ को तोड़कर पानी निकाल देने से खेत शीघ्र सूख जाता है।
इसी प्रकार वमन, विरेचन आदि से अधिक बढ़े हुए दोषों को शरीर से बाहर
कर देने पर दोषों की शान्ति होती है ॥ ५१ ॥
दोषावसेचनं तु खल्वन्यद्वा भेषजं प्राप्तकालमप्यातुरस्य नैवंविध-
स्य कुर्यात्, तद्यथा—अनपवादप्रतीकारस्यापरिचारकस्य वैद्यमानिनश्च-
ण्डस्यासूयकस्य तीव्रधर्मारुचेरतिक्षीण-बल-मांस-शोणितस्यासाध्यरोगो-
पहतस्य मुमूर्षुलिङ्गन्विस्य चेति । एवंविधं ह्यातुरमुपचरन् भिषक् पापी-
यसाऽयशसा योगमृच्छतीति ॥ ५२ ॥
चिकित्सा में त्याज्य रोगी वा निम्न प्रकार के रोगी की दोषावसेचन (संशो-
धन रूप) अथवा संशमनरूप चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। यथा जिससे
अपवाद का प्रतिकार न हो सके, जो रोगी उपकरणों का संग्रह नहीं कर सके,
ऐसे निर्धन की, जिस के पास परिचारक न हो, अपने को वैद्य मानने वाले,
क्रोधी, निन्दा करने वाले, जिस का बल, मांस रक्त, बहुत क्षीण हो गया हो,
असाध्य रोग से आक्रान्त, जिस में मरणोन्मुख लक्षण स्पष्ट हों, इस प्रकार के
रोगी की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। यदि इस प्रकार के रोगी की चिकित्सा
वैद्य करता है तो पापमूलक-अपकीर्ति को प्राप्त होता है ॥ ५२ ॥