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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 538 of 639

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Page 538

५२० चरकसंहिता [ अ० ४
तीन प्रकार के ज्ञान-समुदाय से प्रथम रोग की परीक्षा करके सब प्रकार से
ओर सारा देखकर पीछे से पूर्ण निश्चय करके चिकित्सा करना निर्दोष होता है ।
ज्ञान के एक अवयव को जान लेने से ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य वस्तु का सम्पूर्ण
ज्ञान नहीं हो सकता । इसलिये वैद्य को चाहिये कि तीनों प्रमाणों से रोग को
एक अंश में ही नहीं, प्रत्युत सम्पूर्ण रूप में जाने ॥७॥
त्रिविधे त्वस्मिन् ज्ञानसमुदाये पूर्वमाप्तोपदेशाज्ज्ञानम् । ततः प्रत्य-
क्षानुमानाभ्यां परीक्षोपपद्यते । किं ह्यनुपदिष्टे पूर्वं प्रत्यक्षानुमानाभ्यां
परीक्षमाणो विद्यात् ? तस्मात् द्विविधा परीक्षा ज्ञानवतां प्रत्यक्षमनु-
मानं चेति, त्रिविधा वा सहोपदेशेन ॥ ८ ॥
इस तीन प्रकार के ज्ञान समुदाय में सब से प्रथम 'आप्तोपदेश' से ज्ञान
होता है। इसके पीछे प्रत्यक्ष और अनुमान द्वारा परीक्षा होती है। यदि पूर्व
आप्तोपदेश न हो तो परीक्षा करता हुआ वैद्य प्रत्यक्ष और अनुमान से क्या
जानेगा ? कुछ भी नहीं । इसलिये आप्तोपदेश से प्राप्त ज्ञान वालों के लिये
परीक्षा दो प्रकार की है प्रत्यक्ष और अनुमान । अथवा आप्तोपदेश को मिला
कर तीन प्रकार की है—प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्तोपदेश ॥८॥
तत्रेद्दमुपदिशन्ति बुद्धिमन्तः—रोगमेकैकमेवं प्रकोपणमेवंयोनिमेव-
मात्मानमेवमधिष्ठानमेवंवेदनमेवं संस्थानमेवं वृद्धिस्थानक्षयसमन्वितमे-
वमुदर्कमेवंनामानमेवंयोगं विद्यात् । तस्मिन्नियं प्रतीकारार्था प्रवृत्तिरथवा
निवृत्तिरित्युपदेशाज्ज्ञायते ॥ ९ ॥
आप्तोपदेश से एक एक रोग में ऐसे प्रकोप, ऐसी योनि (प्रकृति वातादि
की विषमता ), ऐसी उत्पत्ति, ऐसा स्वरूप, ऐसा अधिष्ठान (मन और शरीर),
ऐसी वेदना (पीड़ा), ऐसा संस्थान (लक्षण), ऐसे २ शब्द, स्पर्श, रूप, रस,
गन्ध, ऐसा उपद्रव (रोग के पीछे दूसरा होने वाला रोग), ऐसी दोषों की वृद्धि,
स्थान और क्षय, उदर्क (उत्तर फल-साध्य-असाध्य), इस प्रकार का नाम,
ऐसा योग ये सब बातें बुद्धिमान् लोग उपदेश करते हैं, उनके उपदेश से
जानना चाहिये । इस प्रकार की व्याधि में इस प्रकार का प्रतिकार वा चिकित्सा
है, अथवा इस रोग में असाध्य होने से निवृत्ति (चिकित्सा न करना), ये दोनों
प्रकार की प्रवृत्ति और निवृत्ति भी उपदेश से ही जानी जाती हैं ॥६॥
प्रत्यक्षतस्तु खलु रोगतत्त्वं बुभुत्सुः सर्वैरिन्द्रियैः सर्वानिन्द्रियार्था-
नातुर-शरीर-गतानपरीक्षेतान्यत्र रसज्ञानात्; तद्यथा,—अन्त्रकूजनं संधि-
स्फोटनमङ्गुलीपर्वणां च स्वरविशेषा ये चान्येऽपि केचिच्छरीरोपगताः