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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

दोष-मेदः-स्थानत्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्चेति ॥ २५ ॥

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४४२ चरकसंहिता [ अ० ४
पित्तगुणैः पूर्ववत्ससम्बन्धा भवन्ति । सर्वे एव च ते याप्याः, संसृष्ट-
दोष-मेदः-स्थानत्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्चेति ॥ २५ ॥
पित्तप्रमेह के कारण और सम्प्राप्ति—उष्ण, अम्ल, लवण, क्षार, वा कटु
पदार्थों के अति सेवन करने से, अजीर्णावस्था में भोजन करने से, तीव्र
धूप, अग्नि, सन्ताप, श्रम, क्रोध वा विषम भोजन के सेवन से, पित्त प्रकृतिवाले
पुरुष में पित्त शीघ्रता से प्रकुपित हो जाता है ।
यह प्रकुपित पित्त, पूर्व वर्णित प्रकार से ही छः प्रकार के प्रमेह उत्पन्न
करता है ।
पित्तजन्य प्रमेह—छः प्रकार के प्रमेह भी, कफप्रमेह के समान ही पित्त के
गुण के अनुसार भिन्न २ नाम वाले होते हैं । जैसे—( १ ) क्षारमेह, ( २ )
कालमेह, ( ३ ) नीलमेह, ( ४ ) लोहितमेह, ( ५ ) मञ्जिष्ठामेह और ( ६ )
हारिद्रमेह । ये छः प्रकार के प्रमेह पूर्ववत् क्षार, लवण, कटु, अम्ल, विस्र
(दुर्गन्ध) और उष्ण इन पित्त के गुणों से युक्त होते हैं। ये पित्तजन्य प्रमेह
सब के सब याप्य हैं। क्योंकि पित्त और मेद इनका स्थान समीप, एवं धर्म
परस्पर विरुद्ध हैं, एवं चिकित्सा भी परस्पर विरोधी हैं *॥२३-२५॥
तत्र श्लोकाः पित्तप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति—
पित्त प्रमेह को बताने के लिये ये निम्न लिखित श्लोक कहे हैं—
गन्धवर्णरसस्पर्शैर्यथा क्षारस्तथात्मकम् ।
पित्तकोपान्नरो मूत्रं क्षारमेही प्रमेहति ॥ २६ ॥
मसीवर्णमसक्तं यो मूत्रमुष्णं प्रमेहति ।
पित्तस्य परिकोपेन तं विद्यात्कालमेहिनम् ॥ २७ ॥
चाषपक्षनिभं मूत्रं मन्दं मेहति यो नरः ।
पित्तस्य परिकोपेन तं विद्यान्नीलमेहिनम् ॥ २८ ॥
विस्रं लवणमुष्णं च रक्तं मेहति यो नरः ।
पित्तस्य परिकोपेन तं विद्याद्रक्तमेहिनम् ॥ २९ ॥
मञ्जिष्ठारूपि योऽजस्रं भृशं विस्रं प्रमेहति ।
पित्तस्य परिकोपात्तं विद्यान्माञ्जिष्ठमेहिनम् ॥ ३० ॥

  • पित्त का स्थान आमाशय, और मेद का वसाबहुल स्थान आमाशय
    का एक प्रदेश है । इसलिये दोष एवं दूष्य के नित्यप्रति पास में रहने से याप्य
    है । पित्त को शान्त करने वाले जो मधुर, शीत आदि पदार्थ हैं, वे मेद
    लिये अपथ्य हैं और जो मेद के लिये कटु रस आदि वस्तु पथ्य हैं, वे पित्त
    लिये अपथ्य हैं । इसलिये चिकित्सा परस्पर विरोधी पड़ जाती है ।