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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 534 of 639

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Page 534

५१६ चरकसंहिता [ अ० ३

वैद्य लोग गरम पानी देते हैं। ज्वर की उत्पत्ति आमाशय से होती है।
आमाशय से उत्पन्न होने वाले रोगों के लिये पाचन, वमन, अपतर्पण संशमन
आदि उपचार प्रायः होते हैं। इसलिये ज्वर के रोगी को पाचन कराने के लिये
वैद्य लोग गरम पानी अधिकतर देते हैं। यह पीया हुआ गरम पानी वायु का
अनुलोमन करता है, जाठराग्नि को बढ़ाता है, शीघ्र पच जाता है, जीर्ण हो
जाता है, कफ को सुखाता है और थोड़ा भी पिया हुआ गरम पानी प्यास को
शान्त करने के लिये पर्याप्त होता है। यह गरम पानी इतना लाभप्रद होने
पर भी जिस ज्वर में पित्त बहुत बढ़ा हो उस में और दाह, भ्रम, प्रलाप
अथवा अतिसार की अवस्था में भी नहीं देना चाहिये। गरमी से दाह, भ्रम,
प्रलाप और अतिसार और अधिक बढ़ते हैं। ये रोग शीत उपचार से शान्त
होते हैं ॥ ४५ ॥
भवति चात्र—शीतेनोष्णकृतान् रोगान् शमयन्ति भिषग्वििदः ।
ये तु शीतकृता रोगास्तेषां चोष्णं भिषग्जितम् ॥ ४६ ॥
चिकित्सक ज्ञानी लोग गरमी (उष्णता) से उत्पन्न हुए रोगों को शीत
चिकित्सा से शमन करते हैं और शीत कारण से उत्पन्न रोगों को उष्ण चिकि-
त्सा से शान्त करते हैं अर्थात् निदान से विपरीत चिकित्सा करते हैं ॥ ४६ ॥
एवमितरेषामपि व्याधीनां निदानविपरीतमौषधं भवति कार्यम् ।
यथा—अपतर्पणनिमित्तानामपि व्याधीनां नान्तरेण पूरणमस्ति शान्ति-
स्तथा पूरणनिमित्तानां नान्तरेणापतर्पणमिति ॥ ४७ ॥
इस प्रकार से अन्य रोगों में भी कारण के विपरीत चिकित्सा करनी होती
है। जिस प्रकार कि अपतर्पण क्रिया से उत्पन्न रोगों की शान्ति संतर्पण क्रिया
के बिना नहीं होती, उसी प्रकार संतर्पणजन्य रोगों की शान्ति अपतर्पण क्रिया के
बिना नहीं होती ॥ ४७ ॥
अपतर्पणमपि च त्रिविधं लङ्घनं, लङ्घनपाचनं, दोषावसेचनं
चेति ॥ ४८ ॥
अपतर्पण भी तीन प्रकार का है। (१) लंघन, (२) लंघन-पाचन और
(३) दोषावसेचन (दोषों का बाहर निकालना) ॥ ४८ ॥
तत्र लङ्घनमल्पबलदोषाणां, लङ्घनेन ह्यग्निमारुतवृद्ध्या वाता-
तपपरीतमिवल्पमुदकमल्पदोषः प्रतोषमापद्यते ॥ ४९ ॥
इन में जब दोषों का बल अल्प हो, तब लंघन करना चाहिये। लंघन