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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 539 of 639

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Page 539

अ० ४ ] विमानस्थानम् ५२१
शब्दाः स्युस्तान् श्रोत्रेण परीक्षेत । वर्ण-संस्थान-प्रमाण-च्छायाः शरीरप्र-
कृतिविकारौ चक्षुर्वैषयिकाणि यानि चान्यानि तानि चक्षुषा परीक्षेत ।
प्रत्यक्ष द्वारा रोग जानने की इच्छा से वैद्य रोगी मनुष्य की इन्द्रियों के
द्वारा जानने योग्य सब बातों की वह अपनी इन्द्रियों से परीक्षा करे केवल रस
ज्ञान को छोड़कर । जैसे-आंतों के शब्द, अंगुली के पर्वों की सन्धियों का चट-
कन, रोगी शरीर के भिन्न भिन्न स्वरों को, इनके अतिरिक्त रोगी के जन्य जो
(हिचकी, श्वास आदि ) शब्द हों, उनकी श्रोत्र द्वारा परीक्षा करे । वर्ण, अंगों
की बनावट, शरीर और अवयवों का माप (छोटाई, बड़ाई, स्थूलता, कृशता ),
छाया (कान्ति ), शरीर के प्राकृतिक एवं वैकृतिक भावों (परिवर्तनों) को एवं
चक्षु इन्द्रिय के ग्राह्य और जो यहां पर न कही बातें हों (मल, मूत्र आदि ),
उनकी भी आंख से परीक्षा करनी चाहिये ।
रसं तु खल्वातुरशरीरगतमिन्द्रियवैषयिकमप्यनुमानादवगच्छेन्न, न
ह्यस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणमुपपद्यते, तस्मादातुरपरिप्रश्नेनैवाऽऽतुरमुखरसं
विद्यात्, यूकापसर्पणेन त्वस्य शरीरवैरस्यं, मक्षिकोपसर्पणेन शरीर-
माधुर्यं, लोहितपित्तसंदेहे तु किं धारिलोहितं लोहितपित्तं वेति श्वकाक-
भक्षणाद्धारिलोहितमभक्षणाल्लोहितपित्तमित्यनुमातव्यं, एवमन्यानप्या-
तुरशरीरगतान रसाननुमिमीत । गन्धांस्तु खलु सर्वशरीरगताना तुरस्य
प्रकृतिवैकारिकान् घ्राणेन परीक्षेत । स्पर्शं च पाणिना प्रकृतिविकृति-
युक्तम्-इति प्रत्यक्षतोऽनुमानैकदेशतश्च परीक्षणमुक्तम् ॥१०॥
रोगी के शरीर के रस को, इन्द्रिय का विषय होने पर भी, अनुमान द्वारा
ही जानना चाहिये । क्योंकि रोगी के शरीर के रस का प्रत्यक्ष द्वारा ग्रहण नहीं
हो सकता । बीमारी में मुख का स्वाद बदल जाता है, इसलिये रोगी से पूछकर
ही उसके मुख का रस जानना चाहिये । यथा-शरीर पर जूं आदि के चलने
से शरीर में विरसता, शरीर पर मक्खी आदि के पास भिनकने से शरीर में
मधुरता समझनी चाहिये । रक्तपित्त के सन्देह में यह रक्त शुद्ध (शरीर को
धारण करने वाला ) है या रक्तपित्त (पित्त से दूषित रक्त) का है तो यदि इस
रक्त को कुत्ते, कौवे खा लें तो शुद्ध रक्त समझना चाहिये और यदि न खायें तो
रक्तपित्त रोग से दूषित रक्त समझना चाहिये । इस प्रकार से रोगी के शरीर के
अन्य रसों को भी अनुमान से जानना चाहिये । रोगी के सम्पूर्ण शरीर की
प्राकृतिक एवं वैकृतिक गन्धों की परीक्षा घ्राणेन्द्रिय (नासिका) द्वारा करनी
चाहिये । स्पर्श, शीत, उष्ण, खर, चिकने आदि प्राकृतिक एवं वैकृतिक स्पर्शों