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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

वृद्धि-क्षय-कृतश्चान्यो विकल्प उपदेक्ष्यते ॥ ४३ ॥

Page 226Permalink

२०८ चरकसंहिता [ अ० १७
पृथक् त्रयः स्युस्तैर्वृद्धैर्व्याधयः पञ्चविंशतिः ॥ ४२ ॥
यथा वृद्धैस्तथा क्षीणैर्दोषैः स्युः पञ्चविंशतिः ।
वृद्धि-क्षय-कृतश्चान्यो विकल्प उपदेक्ष्यते ॥ ४३ ॥
वृद्धिरेकस्य समता चैकस्यैकस्य संक्षयः ।
द्वन्द्व-वृद्धिः क्षयश्चैकस्यैकवृद्धिर्द्वयोः क्षयः ॥ ४४ ॥
वात आदि दोषों के परस्पर संसर्ग से होने वाले विकारों के बासठ (६२)
भेद-बढ़े हुए वात, पित्त, कफ के परस्पर संसर्ग से सन्निपात जन्य तेरह (१३)
विकार होते हैं। दो दोषों की अधिकता और एक की न्यूनता से (वात-पित्त
बढ़े, कफ कम हो, पित्त-कफ बढ़े और वात कम हो, वात कफ बढ़े और पित्त
कम हो) तीन; एक दोष की वृद्धि और दो दोष की न्यूनता से (वात बढ़े,
पित्त-कफ न्यून, पित्त बढ़े वायु-कफ न्यून; कफ बढ़े और वायु-पित्त न्यून)
तीन; इस प्रकार छः सन्निपात हैं; हीन, मध्य और अधिक भेद से ये छः
सन्निपात हैं (जैसे—वृद्ध वात, वृद्धतर पित्त, वृद्धतम कफ; वृद्ध वात, वृद्धतर
कफ, वृद्धतम पित्त; वृद्ध पित्त, वृद्धतर कफ और वृद्धतम वात; वृद्ध कफ,
वृद्धतर वात और वृद्धतम पित्त) और वात-पित्त कफ तीनों दोषों के बढ़ने से
एक प्रकार का; इस प्रकार से तेरह प्रकार के सन्निपात हैं। अब दो दोषों के
भेद कहते हैं—बढ़े हुए वात, पित्त, कफ इनमें किन्हीं दो दोषों के परस्पर
मिलने से नौ भेद हो जाते हैं। यह संयोग एक-एक दोष की वृद्धि से छः प्रकार
का, और तीनों की समान वृद्धि से तीन प्रकार होता है। छः प्रकार का यथा-
वृद्ध वात अधिक, वृद्ध पित्त; वृद्ध पित्ताधिक, वृद्ध वात; वृद्ध वाताधिक, वृद्ध
कफ; वृद्ध कफाधिक, वृद्ध वात, वृद्ध पित्ताधिक वृद्धकफ, वृद्धकफाधिक
वृद्धपित्त—ये छः प्रकार का। तीन प्रकार का यथा—वृद्ध समवात पित्तज,
वृद्ध समवातकफज, वृद्ध समपित्तकफज। इस प्रकार से नौ प्रकार का हुआ।
पृथक् रूप में बढ़े हुए वात, पित्त, कफ से (अलग-अलग उत्पन्न हुए) रोग
तीन प्रकार से होते हैं। यथा-वृद्धवातज वृद्धपित्तज और वृद्धकफज। इस
प्रकार बढ़े हुए दोषों से २५ प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। जिस प्रकार दोषों
के बढ़ने से २५ भेद बनते हैं, उसी प्रकार दोषों के क्षीण होने से भी पचीस
भेद बन जाते हैं। वृद्धि और क्षय द्वारा उत्पन्न भेदों के अतिरिक्त दोषों के
अन्य भेद बतलाते हैं। यथा-एक दोष की वृद्धि, एक दोष की समता, और
एक दोष का क्षय। यथा-वृद्ध वात, समपित्त, क्षीण कफ; वृद्ध वात, सम कफ,
क्षीण पित्त; वृद्ध पित्त, सम वात, क्षीण कफ; वृद्ध पित्त, सम कफ, क्षीण पित्त;