चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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राधाभिरुध्यन्ते । स मृत्युरकाले । तथा ज्वरादीनप्यात्वङ्गानन्मिथ्योपच-
रितानकालमृत्यून् पश्याम इति ॥४३॥
और यदि इसी अक्ष पर बहुत अधिक भार रखा जाय, अथवा विषम
मार्ग से, कुमार्ग से, धुरे या पहिये के टूटने से, बैल या वाहक ( सारथि ) के
दोष से, आणि, धुरी में लगी कील के निकल जाने से, स्नेह न पड़ने से, गिरने
से नियत समय से पूर्व ही टूट जाता है उसी प्रकार आयु भी साहसिक कार्यों
से, अग्नि के अनुसार भोजन न करने या विषम भोजन करने से, अतिमैथुन
से, उपस्थित वेगों को रोकने से, रोकने योग्य ( काम क्रोधादि ) वेगों को न
रोकने से, शरीर को विषम स्थिति में रखने से ( उत्कट आसन बैठने से ),
दुर्जनों का संसर्ग करने से, भूत, विष, वायु, अग्नि, ताप, चोट आदि से,
आहार विधि के छोड़ने से, बीच में ही आयु समाप्त हो जाती है, इस का नाम
'अकाल-मृत्यु' है। इसी प्रकार ज्वर आदि रोगों की ठीक प्रकार से चिकित्सा न
होने से इन से भी अकाल मृत्युएं होती देखते हैं ॥४३॥
अथाग्निवेशः पप्रच्छ—किं नु खलु भगवन् ! ज्वरितेभ्यः पानी-
यमुष्णं भूयिष्ठं प्रयच्छन्ति भिषजो न तथा शीतम् । अस्ति च शीत-
साध्यो धातुर्ज्वरकर इति ॥ ४४ ॥
इस के अनन्तर अग्निवेश ने पूछा—हे भगवन् ! वैद्य लोग ज्वर के रोगी
को गरम पानी अधिकतः किस लिये देते हैं ? शीतल पानी उतना नहीं देते।
शीत उपचार से भी ज्वरकारक धातु पित्त शान्त होता है ॥४४॥
तमुवाच भगवानात्रेयः,—ज्वरितस्य कायसमुत्थानदेशकाला-
नभिसमीक्ष्य पाचनार्थं पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजः । ज्वरो
ह्यामाशयसमुत्थः प्रायो भेषजानि चाऽऽमाशयसमुत्थानां विकाराणां
पाचनवमनापतर्पणसमर्थानि भवन्ति, पाचनार्थं च पानीयमुष्णं,
तस्मादेतज्ज्वरितेभ्यः प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठम् । तच्चैषां पीतं
वातमनुलोमयति, अग्निमुदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं जरां गच्छति, श्लेष्माणं
च परिशोषयति, स्वल्पमपि पीतं तृष्णाप्रशमनायोपपद्यते, तथायुक्त-
मपि चैतन्नात्यर्थोत्सन्नपित्ते ज्वरे सदाहभ्रमप्रलापातिसारे वा प्रदेयम्,
उष्णेन हि दाहभ्रमप्रलापातिसारा भूयोऽभिवर्धन्ते, शीतेनोपशाम्य-
न्तीति ॥ ४५ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—ज्वर-रोगी के शरीर, निदान
१ आमाशय से उत्पन्न विकारों में ) देश, काल को देखकर पाचन के लिये