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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 542 of 639

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Page 542

५२४ चरकसंहिता [ अ० ५
मान द्वारा जानी जाती हैं इन सब बातों का उदार बुद्धि भगवान् आत्रेय ने
इस 'त्रिरोग विज्ञानीय' अध्याय में व्याख्यान कर दिया ॥ १६-१७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने त्रिविधरोग-
विशेषविज्ञानीयविमानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः।
अथातः स्रोतोविमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
जीवन के आधारभूत प्राणवह आदि स्रोतों के ज्ञान के लिये 'स्रोतोविमान' नाम
अध्याय की व्याख्या करते हैं। ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥१-२॥
यावन्तः पुरुषे मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्त एवास्मिन् स्रोतसां
प्रकारविशेषाः, सर्वभावा हि पुरुषे नान्तरेण स्रोतांस्यभिनिर्वर्तन्ते क्षयं
वाऽप्यधिगच्छन्ति । स्रोतांसि खलु परिणाममापद्यमानानां धातूनाम-
भिवाहीनि भवन्त्ययनार्थेन ॥ ३ ॥
इस पुरुष के शरीर में जितने प्रकार के मूर्तरूप ( स्थूल ) भाव विशेष
( पदार्थ विशेष ) हैं, उतने ही इस शरीर में स्रोतों के प्रकार ( विशेष भेद )
हैं। पुरुष में सब भाव स्रोतों के बिना नहीं बढ़ते और न स्रोतों के बिना क्षय
को प्राप्त होते हैं। ये स्रोत परिपाक हुए धातुओं को ( मल और प्रसाद रूप में )
ले जाने के लिये होते हैं ॥ ३ ॥
अपि चैके स्रोतसामेव समुदयं पुरुषमिच्छन्ति, सर्वगतत्वात्सर्व-
सरत्वाच्च दोषप्रकोपणप्रशमनानाम्, न त्वेतदेवम्। यस्य च हि स्रोतांसि
यच्च वहन्ति यच्चावहन्ति यत्र चावस्थितानि, सर्वं तदन्यत्तेभ्यः ॥ ४ ॥
कुछ आचार्य स्रोतों के समुदाय को ही 'पुरुष' नाम देते हैं। क्योंकि स्रोत
सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हैं। दोषों के जो प्रकोपक ( अपथ्य ) हैं और जो शमन
( पथ्य ) हैं, वे सब स्रोतों द्वारा ही सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होते हैं। परन्तु ऐसा
मानना ठीक नहीं है। क्योंकि जिसके स्रोत जिस वस्तु का वहन करते हैं, जिस
प्रकार से अवहन करते हैं, शरीर के जिस प्रदेश में ये स्रोत स्थित हैं, यह सब
इन स्रोतों से पृथक् हैं, वे स्रोत नहीं हैं। इस लिये पुरुष स्रोतों का समुदाय
रूप नहीं है ॥ ४ ॥