Skip to content
SarvaKosh
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 536 of 639

Read in context
Page 536

५१८ चरकसंहिता [ अ० ३
भवन्ति चात्र—अल्पोदकद्रुमो यस्तु प्रवातः प्रचुरातपः ।
ज्ञेयः स जाङ्गलो देशः स्वल्परोगतमोऽपि च ॥ ५३ ॥
प्रचुरोदकवृक्षो यो निवातो दुर्लभातपः ।
अनूपो बहुदोषश्च, समः साधारणो मतः १ ॥ ५४ ॥
जिस देश में पानी और वृक्ष कम हों, वायु और धूप बहुत प्रचण्ड हो वह
जांगल देश जानना चाहिये । उसमें बहुत कम रोग होते हैं। जिस देश में जल
और वृक्ष बहुत हों, वायु न चले और धूप भी न हो, वह अनूप देश कहाता है
जिसमें वात और धूप दोनों समान हो वह देश समदेश कहाता है ॥ ५३-५४ ॥
तदात्वे चानुबन्धे वा यस्य स्यादशुभं फलम् ।
कर्मणस्तन्न कर्त्तव्यमेतद् बुद्धिमतां मतम् ॥ ५५ ॥
तत्काल में अथवा उत्तर काल में जिस कर्म का फल अशुभ हो, वह कर्म
नहीं करना चाहिये, यह बुद्धिमानों का मत है ॥ ५५ ॥
तत्र श्लोकाः—
पूर्वरूपाणि सामान्या हेतवः स्वस्वलक्षणाः ।
देशोद्ध्वंसस्य भैषज्यं हेतूनां मूलमेव च ॥ ५६ ॥
प्राग्विकारसमुत्पत्तिरायुषश्च क्षयक्रमः ।
मरणं प्रतिभूतानां कालाकालविनिश्चयः ॥ ५७ ॥
यथा चाकालमरणं यथा युक्तं च भेषजम् ।
सिद्धिं यात्यौषधं येषां न कुर्याद्येन हेतुना ॥ ५८ ॥
तदात्रेयोऽग्निवेशाय निखिलं सर्वमुक्तवान् ।
देशोद्ध्वंसनिमित्तीये विमाने मुनिसत्तमः ॥ ५६ ॥
जनपदोद्ध्वंस के पूर्वरूप, सामान्य कारण, प्रत्येक के अपने अपने लक्षण,
चिकित्सा (पंच कर्म), कारणों का मूल कारण अधर्म, रोगों की प्रारम्भिक
उत्पत्ति, आयु और धर्म के ह्रास का क्रम, कालमृत्यु और अकालमृत्यु, निदान
और दोष, बलापेक्षित औषध, जिनकी चिकित्सा नहीं करनी, ये सब बातें इस
अध्याय में मुनिश्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने शिष्य अग्निवेश के लिये सम्पूर्ण रूप
से कह दीं ॥ ५६-५६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने जनपदोद्ध्वंसनीय-
विमानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
१. ये दो श्लोक भी कहीं २ देखने में आते हैं।