Skip to content
SarvaKosh
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 531 of 639

Read in context
Page 531

अ० ३ ] ३३ विमानस्थानम् ५१३
न चानभ्यस्ताकाल-मरण-भय-निवारकाणामकाउमरणभयमागच्छे-
त्प्राणिनां, व्यर्थाश्चाऽऽरम्भकथाप्रयोगबुद्धयः स्युर्महर्षीणां रसायनाधिकारे,
नापीन्द्रो नियतायुषं शत्रुं वज्रेणाभिहन्यात्, नाश्विनावातं भेषजेनोप-
पादयेतां, न महर्षयो यथेष्टमायुस्तपसा प्राप्नुयुः, नच विदितवेदितव्या
महर्षयः ससुरेशा रसायनादीनि सम्यक् पश्येयुरुपदिशेयुराचरेयुर्वा ।
अकाल मरण के भय का निवारण करने वाले अनभ्यासी प्राणियों को
अकाल मृत्यु के कारणों से भय भी न हो। महर्षियों के रसायनाधिकार में कहे
हुए उपदेश, प्रयोग और ज्ञान ये सब व्यर्थ हो जायें । नियत आयुशाले शत्रु
को इन्द्र भी वज्र से नहीं मार सके। अश्विनीकुमार भी रोगी पुरुष की औष-
धियों से चिकित्सा न कर सकें। और महर्षिगण तप द्वारा वांछित वर्षों तक की
आयु भी प्राप्त न कर सके। सर्वज्ञ महर्षिगण इन्द्र के साथ आयुवर्धक समाय-
नादि को न देखें, न उपदेश करें और न स्वयं व्यवहार करें । क्योकि आयु
का काल और परिमाण तो निश्चित है ।
अपि च सर्वचक्षुषामेतत्परं यदैन्द्रं चक्षुः, इदं चास्माकं प्रत्यक्षं,
यथा पुरुषसहस्राणामुत्थायात्थायाऽऽहवं कुर्वतामकुर्वतां चातुल्यायुष्ट्वं,
तथा जातमात्राणामप्रतीकारात् प्रतीकाराच्चाविषविषप्राशिनां चाप्य-
तुल्यायुष्ट्वं, न च तुल्यो योगः क्षेम उदपानघटानां चित्रघटानां चोत्सी-
दतां, तस्माद्धितोपचारमूलं जीवितमतो विपर्ययान्मृत्युः ।
सब आंखों से श्रेष्ठ प्रमाण यह इन्द्र ( आत्मा ) की आंख है—हम प्रत्यक्ष
देखते हैं कि हजारों मनुष्य प्रतिदिन उठ उठ कर शत्रों से लड़ाई करते हैं,
नहीं भी करते हैं, उन सब की आयु तुल्य नहीं होती अर्थात् लड़ने वाले मरते
और न लड़ने वाले नहीं मरते हैं। इसी प्रकार उत्पन्न हुए संन्यास रोहिणी
आदि रोगों की जो तत्काल चिकित्सा कर लेते हैं वे बच जाते हैं और जो
चिकित्सा नहीं करते वे मरते हैं। इसी प्रकार विष खाने वाले मरते हैं और विष
नहीं खाने वाले नहीं मरते । पानी रखने या लाने के लिये जो पक्के घड़े बनाये
जाते हैं उन का तथा चित्र घटों (कच्चे घड़ों) का योग-क्षेम समान नहीं हो
सकता । वे समान काल तक स्थिर नहीं रह सकते । किन्तु रक्षण करने से कच्चे
घड़े भी देर तक रह सकते हैं और न पालने से पके घड़े भी शीघ्र टूट जाते
हैं। इसलिये हितकारी वस्तुओं वा कार्यों का सेवन करना ही जीवन का निमित्त
है। इस के विपरीत अहिताचरण करना मृत्यु का कारण है ।
अपि च देशकालात्मगुणविपरीतानां कर्मणामाहारविहाराणां च