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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished810 pages

४२- धन्वन्तरिके दर्प-भङ्गकी कथा, उनके द्वारा मनसादेवीका स्तवन

Page 626Permalink
६१६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सब देवता भगवान् चन्द्रशेखरको प्रणाम करके बिदा हुए। भगवान् नारायण और ब्रह्माको शंकरजीने स्वयं ही प्रणाम किया। वे दोनों उन्हें हृदयसे लगाकर आशीर्वाद दे अपने-अपने स्थानको चले गये।

इसके बाद हिमवान् और मेनाने मैनाकको बुलाया और कहा— 'बेटा ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम शिव और पार्वतीको शीघ्र यहाँ बुला लाओ।' उनकी बात सुनकर मैनाक शीघ्र ही शिवधाममें गया और पार्वती एवं परमेश्वरको लिवाकर आ गया। पार्वतीका आगमन सुनकर बालक-बालिका, वृद्धा तथा युवती स्त्रियाँ भी उन्हें देखनेके लिये दौड़ी आयीं। पर्वतगण भी सानन्द भागे आये। मेना अपने पुत्रों और बहूके साथ मुस्कराती हुई दौड़ीं। हिमालय भी प्रसन्नतापूर्वक पुत्रीकी अगवानीके लिये दौड़े आये। देवी पार्वतीने रथसे उतरकर बड़े हर्षके साथ माता-पिता तथा गुरुजनोंको प्रणाम किया। उस समय वे आनन्दके समुद्रमें गोते लगा रही थीं। हर्ष-विह्वल मेना और मोदमग्न हिमालयने पार्वतीको हृदयसे लगा लिया। उन्हें ऐसा लगा, मानो गये हुए प्राण वापस आ गये हों। पुत्रीको घरमें रखकर गिरिराजने उसके लिये रत्नसिंहासन दिया और शूलपाणि शिव तथा उनके पार्षदगणोंको मधुपर्क आदि दे सहर्ष उनका सत्कार किया। पार्षदोंसहित भगवान् चन्द्रशेखर अपने ससुरालके घरमें रहने लगे। वहाँ प्रतिदिन पत्नीसहित उनकी सोलह उपचारोंसे पूजा होने लगी। राधे ! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् शंकरके मङ्गल-परिणयकी कथा कह सुनायी, जो हर्ष बढ़ानेवाली तथा शोकका नाश करनेवाली है। अब और क्या सुनना चाहती हो ?

(अध्याय ४५-४६)


इन्द्रके अभिमान-भङ्गका प्रसङ्ग—प्रकृति और गुरुकी अवहेलनासे इन्द्रको शाप, गौतममुनिके शापसे इन्द्रके शरीरमें सहस्र योनियोंका प्राकट्य, अहल्याका उद्धार, विश्वरूप और वृत्रके वधसे इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण, इन्द्रका मानसरोवरमें छिपना, बृहस्पतिका उनके पास जाना, इन्द्रद्वारा गुरुकी स्तुति, ब्रह्महत्याका भस्म होना, इन्द्रका विश्वकर्माद्वारा नगरका निर्माण कराना, द्विज-बालकरूपधारी श्रीहरि तथा लोमशमुनिके द्वारा इन्द्रका मान-भंजन, राज्य छोड़नेको उद्यत हुए विरक्त इन्द्रका बृहस्पतिजीके समझानेसे पुनः राज्यपर ही प्रतिष्ठित रहना

श्रीराधिकाने पूछा— जगद्गुरो ! मैंने शूलपाणि शिवके यश तथा दैववश उनके दर्प-भङ्गकी बात सुनी। पार्वतीके गर्वभंजनका और शिव-पार्वतीके विवाहका भी वर्णन सुना। अब इन्द्रके तथा अन्य लोगोंके भी अभिमानके चूर्ण होनेके प्रसङ्गोंको क्रमशः सुनना चाहती हूँ; कृपया विस्तारपूर्वक कहें।

श्रीकृष्ण बोले— सुन्दरि ! इन्द्रके दर्प-भङ्गकी बात तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वह प्रसङ्ग सुन्दर, अनुपम तथा कानोंके लिये अमृतके समान मधुर है। प्राचीन कालकी बात है। इन्द्र सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके समस्त देवताओंके स्वामी तथा महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो गये। तपस्याके फलसे प्रतिदिन उनके ऐश्वर्यकी वृद्धि होने लगी। बृहस्पतिजीने उन्हें सिद्ध-मन्त्रकी दीक्षा दी। उन्होंने पुष्करमें सौ वर्षोंतक उस महामन्त्रका जप किया। जपसे वह मन्त्र सिद्ध हो गया और इनका मनोरथ पूरा हुआ। मनुष्य सम्पत्तिसे मोहित हुआ ब्रह्मस्वरूपा प्रकृतिका आदर नहीं करता; अतः