ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
by महर्षि वेदव्यास
७८- भाण्डीरवटके नीचे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान श्रीकृष्णको अत्यन्त विस्मित होकर तथा हाथ जोड़कर ब्रह्माजीका प्रणाम करना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१७
ऐसा कहकर नागपत्नी श्रीहरिके सामने नत हुई खड़ी हो गयी। उसने शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित करनेवाले श्रीहरिके मुखचन्द्रका दर्शन किये। उस सतीने अपने दोनों नेत्रोंसे निमेषरहित होकर गोविन्दके मुखकी सौन्दर्यमाधुरीका पान किया। उसके सारे अङ्ग पुलकित हो उठे। वह आनन्दके आँसुओंमें डूब गयी। श्रीहरिको सुन्दर बालकके रूपमें देखकर वह उनके प्रति पुत्रोचित स्नेह करने लगी और भक्तिके उद्रेकसे आप्लावित हो पुनः इस प्रकार बोली—'गोविन्द! मैं रमणक-द्वीपमें नहीं जाऊँगी। वहाँ मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। यह सर्प वहाँ जाकर संसार चलावे, मुझे तो आप अपनी किङ्करी बना लीजिये! हे श्रीकृष्ण! मेरे मनमें सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तिके लिये भी इच्छा नहीं है; क्योंकि वह मुक्ति आपके चरणारविन्दोंकी सेवाकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। जो भारतवर्षमें दुर्लभ जन्म पाकर आपसे आपकी चरणसेवाके अतिरिक्त दूसरे वरकी इच्छा करता है, वह स्वयं ठगा गया*।'
नागपत्नीकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दपर मुस्कराहट फैल गयी। उनका मन प्रसन्न हो गया और उन श्रीमान् माधवने 'एवमस्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। इसी बीचमें उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित दिव्य विमान वहाँ तत्काल उतर आया। मुने! वह अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहा था। उसपर अनेक श्रेष्ठ पार्षद बैठे थे तथा उसे दिव्य वस्त्रों एवं मालाओंसे सजाया गया था। उसमें सौ पहिये लगे थे। वह वायुके समान वेगशाली तथा मनकी गतिसे चलनेवाला था। देखनेमें बड़ा ही मनोहर था। श्यामसुन्दरके श्याम कान्तिवाले सेवक तुरंत ही उस रथसे उतरे और श्रीकृष्णको प्रणाम करके सुरसाको साथ ले उत्तम गोलोकधामको चले गये।
तत्पश्चात् श्रीहरिने अपने तेजसे छायारूपिणी सुरसाकी सृष्टि करके उसे सर्पको दे दिया। कालियनाग यह सब कुछ न जान सका; क्योंकि वह वैष्णवी मायासे विमोहित था। सर्पके मस्तकसे उतरकर करुणानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक शीघ्र ही कालियके सिरपर अपना हाथ रखा। हाथ रखते ही उसके शरीरमें चेतना लौट आयी और उसने श्रीहरिको अपने सामने देखा तथा इस बातकी ओर भी लक्ष्य किया कि सती सुरसा दोनों हाथ जोड़े खड़ी है और उसके नेत्रोंसे आँसू बह रहे हैं। यह देख उसने भी गोविन्दको प्रणाम किया और तत्काल प्रेमसे विह्वल होकर वह रोने लगा। कृपानिधान भगवान्ने देखा नागराज रो रहा है और सुरसा भक्तिके उद्रेकसे पुलकित हो नेत्रोंसे आँसू बहा रही है; किंतु कुछ बोल नहीं रही है। तब वे दयानिधि स्वयं बोले; क्योंकि योग्य और अयोग्य प्राणीपर भी ईश्वरकी कृपा सदा समान रूपसे ही रहती है।
श्रीकृष्णने कहा—कालिय! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो। वत्स! तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हो। भय छोड़ो और सुखसे रहो। जो मेरा अत्यन्त भक्त हो और मेरे अंशसे उत्पन्न हुआ हो, उसपर मैं विशेष अनुग्रह करता हूँ। उसके अभिमानको मिटानेके लिये उसका किञ्चित् दमन करके मैं पुनः उसपर कृपा करता हूँ। जो लोग तुम्हारे वंशमें उत्पन्न हुए सर्पोंका विनाश करेंगे, उनको महान् पाप लगेगा और वे दुःखोंके भागी होंगे। परंतु जो लोग तुम्हारे कुलमें उत्पन्न हुए सर्पोंको देखकर उनके मस्तकपर उभरे हुए मेरे सुन्दर चरणचिह्नोंको भक्तिभावसे प्रणाम करेंगे, वे समस्त पातकोंसे मुक्त हो जायँगे। तुम शीघ्र रमणक द्वीपको जाओ
* विना त्वत्पादसेवां च यो वाञ्छति वरान्तरम् । भारते दुर्लभं जन्म लब्ध्वासौ वञ्चितः स्वयम् ॥
(१९। ५२)
| ५१८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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और गरुड़का भय छोड़ दो। तुम्हारे मस्तकपर मेरे चरणचिह्नको देखकर गरुड़ भक्तिभावसे तुम्हें नमस्कार करेंगे। तुमको और तुम्हारे वंशजोंको गरुड़से कभी भय नहीं होगा। आजसे मेरा वर पाकर अपनी जातिके सर्पोंमें तुम सर्वश्रेष्ठ हो जाओ। वत्स! तुमको और कौन-सा उत्तम वर अभीष्ट है? उसे इस समय माँगो। मैं तुम्हारा दुःख दूर करनेवाला हूँ; अतः भय छोड़कर मुझसे मनकी बात कहो।
श्रीकृष्णकी बात सुनकर कालियनाग, जो भयसे काँप रहा था, दोनों हाथ जोड़कर उनसे बोला।
**कालियने कहा—**वरदायक प्रभो! दूसरे किसी वरके लिये मेरी इच्छा नहीं है। प्रत्येक जन्ममें मेरी आपके चरणकमलोंमें भक्ति बनी रहे और मैं सदा आपके उन चरणारविन्दोंका चिन्तन करता रहूँ; यही वर मुझे दीजिये। जन्म ब्राह्मणके कुलमें हो या पशु-पक्षियोंकी योनियोंमें, सब समान है। वही जन्म सफल है, जिसमें आपके चरणकमलोंकी स्मृति बनी रहे। यदि आपके चरणोंका स्मरण न हो तो देवता होकर स्वर्गमें रहना भी निष्फल है। जो आपके चरणोंके चिन्तनमें तत्पर है, उसे जो भी स्थान प्राप्त हो, वही सबसे उत्तम है। उस पुरुषकी आयु एक क्षणकी हो या करोड़ों कल्पोंकी अथवा उसकी आयु तत्काल ही क्षीण होनेवाली क्यों न हो; यदि वह आपकी आराधनामें बीत रही है तो सफल है, अन्यथा उसका कोई फल नहीं है—वह व्यर्थ है। जो आपके चरणारविन्दोंके सेवक हैं, उनकी आयु व्यर्थ नहीं जाती, सार्थक होती है। उन्हें जन्म-मरण, रोग-शोक और पीड़ाका कुछ भी भय नहीं रहता—वे इनकी कुछ भी परवाह नहीं करते। भक्तोंके मनमें आपके चरणोंकी सेवाको छोड़कर इन्द्रपद, अमरत्व अथवा परम दुर्लभ ब्रह्मपदको भी पानेकी इच्छा नहीं होती। आपके भक्तजन सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तियोंको अत्यन्त फटे पुराने वस्त्रके चिथड़ेके समान तुच्छ देखते हैं*। ब्रह्मन्! मैंने भगवान् अनन्तके मुखसे ज्यों ही आपके मन्त्रका उपदेश प्राप्त किया, त्यों ही आपकी भावना करते-करते आपके अनुग्रहसे मैं आपके समान वर्णवाला हो गया। मैं अपक्व भक्त था अर्थात् मेरी भक्ति परिपक्व नहीं हुई थी। यह जानकर ही स्वयं सुदृढ़ भक्ति धारण करनेवाले गरुड़ने मुझे देशसे दूर कर दिया और धिक्कारा था। परंतु वरदेश्वर! अब आपने मुझे अविचल भक्ति दे दी है। गरुड़ भी भक्त हैं, मैं भी भक्त हो गया हूँ; अतः अब वे मेरा त्याग नहीं कर सकते हैं। आपके चरणारविन्दोंके चिह्नसे अलंकृत मेरे श्रीयुत मस्तकको देखकर गरुड़ मुझे सदोष होनेपर भी गुणवान् मानेंगे; अतः इस समय मेरा त्याग नहीं कर सकेंगे। अब तो वे यह मानकर कि नागेन्द्रगण हमारे आराध्य हैं, मुझे कष्ट नहीं देंगे। परमेश्वर! अब मैं उनका वध्य नहीं रहा। उन गुरुदेव अनन्तके सिवा मुझे कहीं किसीसे भी भय नहीं है। देवेन्द्रगण, देवता, मुनि, मनु और मानव—जिन्हें स्वप्नमें तथा ध्यानमें भी नहीं देख पाते हैं—वे ही परमात्मा इस समय मेरे
* तन्निष्फलः स्वर्गवासो नास्ति यस्य स्मृतिस्तव। त्वत्पदध्यानयुक्तस्य यत्तत् स्थानं च तत्परम्॥
क्षणं वा कोटिकल्पं वा पुरुषायुश्च यस्तथा। यदि त्वत्सेवया याति सफलो निष्फलोऽन्यथा॥
तेषां चायुः क्षयो नास्ति ये त्वत्पादाब्जसेवकाः। न सन्ति जन्ममरणरोगशोकार्तिभीतयः॥
इन्द्रत्वे चामरत्वे वा ब्रह्मत्वे चातिदुर्लभे। वाञ्छा नास्त्येव भक्तानां त्वत्पादसेवनं विना॥
सुजीर्णपटखण्डस्य समं तन्नूनमेव वा। पश्यन्ति भक्ताः किं चान्यत् सालोक्यादिचतुष्टयम्॥
(१९।७६–८०)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१९
नेत्रोंके विषय हो रहे हैं। प्रभो! आप तो भक्तोंके
अनुरोधसे साकार रूपमें प्रकट हुए हैं; अन्यथा
आपको शरीरकी प्राप्ति कैसे हो सकती है?
सगुण-साकार तथा निर्गुण-निराकार भी आप ही
हैं। आप स्वेच्छामय, सबके आवासस्थान तथा
समस्त चराचर जगत्के सनातन बीज हैं। सबके
ईश्वर, साक्षी, आत्मा और सर्वरूपधारी हैं। ब्रह्मा,
शिव, शेष, धर्म और इन्द्र आदि देवता तथा वेदों
और वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् भी जिन परमेश्वरकी
स्तुति करनेमें जडवत् हो जाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापी
प्रभुका स्तवन क्या एक सर्प कर सकेगा? हे
नाथ! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! आप मुझ
अधमको क्षमा कीजिये। श्रीकृष्ण! मैंने अपने
खल स्वभाव और अज्ञानके कारण आपको चबा
डालनेका प्रयत्न किया; परंतु आप तो आकाशकी
भाँति सर्वत्र व्यापक तथा अमूर्त हैं; अतः किसी
भी अस्त्रके लक्ष्य नहीं हैं। न तो आपका अन्त
देखा जा सकता है और न लाँघा ही जा सकता
है। न तो कोई आपका स्पर्श कर सकता है और
न आपपर आवरण ही डाल सकता है। आप
स्वयं प्रकाशरूप हैं।
ऐसा कहकर नागराज कालिय भगवान्के
चरणकमलोंमें गिर पड़ा। भगवान् उसपर संतुष्ट
हो गये। उन्होंने 'एवमस्तु' कहकर उसे सम्पूर्ण
अभीष्ट वर दे दिया। जो नागराजद्वारा किये गये
स्तोत्रका प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसे
तथा उसके वंशजोंको कभी नागोंसे भय नहीं
होता। वह भूतलपर नागोंकी शय्या बनाकर सदा
उसपर शयन कर सकता है। उसके भोजनमें विष
और अमृतका भेद नहीं रह जाता। जिसको नागने
ग्रस लिया हो, काट खाया हो अथवा विषैला
भोजन करनेसे जिसके प्राणान्तकी सम्भावना हो
गयी हो, वह मनुष्य भी इस स्तोत्रको सुननेमात्रसे
स्वस्थ हो जाता है। जो इस स्तोत्रको भोजपत्रपर
लिखकर भक्तिभावसे युक्त हो कण्ठमें या दाहिने
हाथमें धारण करता है, उसे भी नागोंसे भय नहीं
होता। जिस घरमें यह स्तोत्र पढ़ा जाता है, वहाँ
कोई नाग नहीं ठहरता। निश्चय ही उस घरमें
विष, अग्नि तथा वज्रका भय नहीं प्राप्त होता।
इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति और स्मृति उसे सदा
सुलभ होती है तथा अन्तमें अपने कुलको पवित्र
करके निश्चय ही वह श्रीकृष्णका दास्यभाव प्राप्त
कर लेता है।
भगवान् नारायण कहते हैं-नारद!
नागराजको अभीष्ट वर देकर जगदीश्वर श्रीहरिने
पुनः उससे मधुर वचन कहे, जो परिणाममें सुख
देनेवाले थे।
श्रीकृष्ण बोले-नागराज! तुम यमुना-
जलके मार्गसे ही परिवारसहित रमणकद्वीपमें
चले जाओ। वह स्थान इन्द्रनगरके समान श्रेष्ठ एवं
सुन्दर है।
श्रीहरिकी यह आज्ञा सुनकर नाग प्रेमविह्वल
होकर रोने लगा और बोला- 'नाथ ! मैं आपके
चरणकमलोंका कब दर्शन करूँगा?' वह महेश्वर
श्रीकृष्णको सैकड़ों बार प्रणाम करके स्त्री और
परिवारके साथ जलके ही मार्गसे चला गया।
जाते समय नागराज भगवद्-विरहसे व्याकुल हो
रहा था। उसके चले जानेके बाद यमुनाके उस
कुण्डका जल अमृतके समान हो गया। इससे
समस्त जन्तुओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। नारद!
रमणकमें पहुँचकर कालियने इन्द्रनगरके समान
सुन्दर भवन देखा। कृपासिन्धु श्रीकृष्णकी आज्ञासे
साक्षात् विश्वकर्माने उसका निर्माण किया था।
वहाँ नागराज कालिय अपनी पत्नी और पुत्रोंके
साथ श्रीहरिके चिन्तनमें तत्पर हो भय छोड़कर
बड़े हर्षके साथ रहने लगा। इस प्रकार श्रीहरिका
सारा अद्भुत, सुखदायक, मोक्षप्रद तथा सारभूत
चरित्र मैंने कह सुनाया। अब और क्या सुनना
चाहते हो?
सूतजी कहते हैं-महर्षि नारायणका उपर्युक्त