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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished810 pages

७६- द्वारकापुरीका निर्माण, उसे देखनेके लिये देवताओं और मुनियोंका आना और उग्रसेनका राज्याभिषेक

Page 742Permalink

७३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

समय उद्धव शोकसे दग्ध होनेके कारण दुःखी हो रो रहे थे, उनके नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे। उद्धवको आया देखकर श्रीकृष्णका मन प्रफुल्लित हो गया। तब वे उद्धवसे मुस्कराते हुए बोले।

श्रीभगवान्ने पूछा— उद्धव! आओ। कल्याण तो है न? राधा जीवित है न? विरह-तापसे संतप्त हुई कल्याणमयी गोपियोंका जीवन चल रहा है न? ग्वालबालों तथा गोवत्सोंका मङ्गल है न? पुत्र-विरहसे दुःखी हुई मेरी माता यशोदाका क्या हाल है? बन्धो! यह ठीक-ठीक बतलाओ कि तुम्हें देखकर मेरी माताने क्या कहा? तुमने उसे क्या उत्तर दिया तथा उसने मेरे लिये क्या कहा है? क्या तुमने वह यमुना-तट, वृन्दावन नामक पुण्यवन, जनशून्य एवं शीतल-मन्द-सुगन्ध पवनसे व्याप्त परम रमणीय रासमण्डल, कुञ्ज-कुटीरोंसे घिरा हुआ रमणीय क्रीड़ासरोवर और जिनपर भँवरे मँडरा रहे थे, उन खिले हुए फूलोंसे परिपूर्ण पुष्पवाटिका देखी? क्या भाण्डीरवनमें अत्यन्त सघन छायावाला एवं बालकोंसे संयुक्त वटवृक्ष तुम्हें दृष्टिगोचर हुआ? क्या गौओंके गोष्ठ, गोकुल और गो-समुदाय देखनेको मिला? यदि राधा जीवित है तो तुम्हारे द्वारा देखे जानेपर उसने मेरे लिये क्या संदेशा दिया है? बन्धो! वह सारा समाचार मुझे बताओ; क्योंकि मेरा मन स्थिर नहीं है। सभी गोपिकाओंने क्या कहा है? ग्वालबालोंने कौन-सी बात कही है? मेरे पिताकी-सी अवस्थावाले वृद्ध गोपोंने क्या संदेशा दिया है? तात! बलदेवकी माता सती रोहिणीने क्या कहा है तथा दूसरी प्रिय बन्धुओंकी पत्नियोंने कौन-सी बात कही है? तुम्हें भोजन क्या मिला था? माता यशोदा तथा राधाने कौन-सी अपूर्व वस्तु उपहारमें दी है? उन्होंने किस ढंगसे बातचीत की है और उनके वचन कैसे मधुर थे? उद्धव! गोपों, गोपियों, शिशुओं, राधा और मेरी माताका मेरे प्रति कैसा प्रेम है? क्या मेरी माता मुझे स्मरण करती है? क्या रोहिणी मुझे याद करती है? क्या मेरे प्रेमविरहसे व्याकुल हुई मेरी राधाको मेरा स्मरण रहता है? क्या गोपियों, गोपों और ग्वालबालोंको मेरी याद आती है? क्या मेरे न रहनेपर भी ग्वालबाल भाण्डीरवनमें वटवृक्षके नीचे क्रीड़ा करते हैं? जहाँ ब्राह्मणपत्नियों-द्वारा दिये गये अमृतोपम अन्नका मैंने नारियों और बालकोंके साथ भोग लगाया था, उस अभीष्ट स्थानको तुमने देखा है? इन्द्रयागस्थल, श्रेष्ठ गोवर्धन तथा जहाँ ब्रह्माने गौओंका अपहरण किया था, उस उत्तम स्थानको देखा है न? श्रीकृष्णके ये प्रश्न सुनकर उद्धव सनातन भगवान् श्रीकृष्णसे यह शोकयुक्त तथा मधुरताभरी वाणी बोले।

उद्धवने कहा— नाथ! आपने जिस-जिसका नाम लिया है, वह सब मैंने इच्छानुसार देख लिया और इस भारतवर्षमें अपने जीवन और जन्मको सफल बना लिया। मैंने उस पुण्यमय वृन्दावनको भी देख लिया, जो भारतवर्षका साररूप है। व्रजभूमिमें उस वृन्दावनका साररूप परम रमणीय रासमण्डल है। उसकी सारभूता गोलोकवासिनी श्रेष्ठ गोपिकाएँ हैं। उनकी सारभूता जो परात्परा