ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
by महर्षि वेदव्यास
६३- केदार-कन्याके वृत्तान्तका वर्णन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६९५
चाल चल रही थी। उस कामिनीने रासक्रीड़ाके अवसरपर प्रकट होकर मुझे आगेसे पकड़ लिया। इसी कारण पुरातत्त्ववेत्ताओंने उसका ‘राधा' नाम रखा और उसकी पूजा की। उसकी प्रकृति परम प्रसन्न थी; इसलिये वह ईश्वरी ‘प्रकृति' कहलायी। समस्त कार्योंमें समर्थ होनेके कारण वह ‘शक्ति' नामसे कही जाती है। वह सबकी आधारस्वरूपा, सर्वरूपा और सब तरहसे मङ्गलके योग्य है; सम्पूर्ण मङ्गलोंके दानमें दक्ष होनेके कारण वह ‘सर्वमङ्गला' है। वह वैकुण्ठमें ‘महालक्ष्मी' और मूर्तिभेदसे ‘सरस्वती' है। वेदोंको उत्पन्न करनेके कारण वह ‘वेदमाता' नामसे प्रसिद्ध है। वह ‘सावित्री' और तीनों लोकोंका धारण-पोषण करनेवाली ‘गायत्री' भी है। पूर्वकालमें उसने दुर्गका संहार किया था; इसी कारण वह ‘दुर्गा' नामसे विख्यात है। यह सती प्राचीनकालमें समस्त देवताओंके तेजसे आविर्भूत हुई थी, इसीसे यह ‘आद्याप्रकृति' कहलाती है। यह समस्त असुरोंका मर्दन करनेवाली, सम्पूर्ण आनन्दकी दाता, आनन्दस्वरूपा, दुःख और दरिद्रताका विनाश करनेवाली, शत्रुओंको भय प्रदान करनेवाली और भक्तोंके भयकी विनाशिका है। वही ‘सती' रूपसे दक्षकी कन्या हुई और पुनः हिमालयसे उत्पन्न होकर ‘पार्वती' कहलाती है। वह सबकी आधारस्वरूपा है। पृथ्वी उसकी एक कला है। तुलसी और गङ्गा उसीकी कलासे उत्पन्न हुई हैं। यहाँतक कि सम्पूर्ण स्त्रियोंका आविर्भाव उसकी कलासे ही हुआ है। तात! जिस शक्तिसे सम्पन्न होकर मैं बारंबार सृष्टि-रचना करता हूँ, उसे रासके मध्य स्थित देखकर मैंने उसके साथ क्रीड़ा की। उस समय रासमण्डलमें उन दोनोंके शरीरसे जो पसीनेकी बूँदें भूतलपर गिरीं, उनसे एक मनोहर सरोवर उत्पन्न हो गया, जो राधाके नामके सदृश था (अर्थात् उसका नाम राधासरोवर हुआ)। उस सरोवरसे जो पसीनेकी धारा वेगपूर्वक नीचे विश्व-गोलकमें गिरी, उससे सारा ब्रह्माण्डगोलक जलसे भर गया। ब्रजेश्वर! पहले-पहल सब कुछ जलमग्न था; उस समय सृष्टि नहीं हुई थी। तब शृङ्गारके समाप्त होनेपर मैंने राधामें वीर्यका आधान किया। तत्पश्चात् श्रीराधिकाने गर्भ धारण करके दीर्घकालके बाद एक परम अद्भुत डिम्ब प्रसव किया। उसे देखकर देवीको क्रोध आ गया; तब उन्होंने उसे पैरसे नीचे विश्व-गोलकमें ढकेल दिया। तात! वह जलमें गिर पड़ा और सबका आधारस्वरूप ‘महान् विराट्' हो गया। तब अपनी संतानको जलमें पड़ा हुआ देखकर मैंने राधाको शाप दे दिया। विभो! मेरे शापके कारण राधा संतानहीन हो गयी। ब्रजेश्वर! इसलिये जिस डिम्बसे कलाका आश्रय लेकर वह महान् विराट् पैदा हुआ था, उसीसे दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती तथा अन्यान्य जो देवियाँ और स्त्रियाँ हैं; वे सभी क्रमशः कला, कलांश और कलांशके अंशसे उत्पन्न हुई हैं।
ब्रजेश! उस महान् विराट्ने मेरे द्वारा दिये गये अंगुष्ठामृतका पान किया और फिर स्वकर्मानुसार स्थावर-रूप होकर वह जलमें शयन करने लगा। योगबलसे जल ही उसकी शय्या और उपाधान था तथा उसके रोमकूप सदा जलसे भरे रहते थे। पुनः उनमें ‘क्षुद्र विराट्' शयन करने लगा। उस क्षुद्र विराट्की नाभिसे सहस्रदल कमल उत्पन्न हुआ। उस कमलपर सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने जन्म लिया; इसी कारण वे कमलोद्भव कहे जाते हैं। वहाँ आविर्भूत होकर वे ब्रह्मा चिन्ताग्रस्त हो यों सोचने लगे—'यह देह किससे उत्पन्न हुई है तथा मेरे माता-पिता और भाई-बन्धु कहाँ हैं?' इसी चिन्तामें वे तीन लाख दिव्य वर्षोंतक उस कमलके भीतर चक्कर काटते रहे। तत्पश्चात् पाँच लाख दिव्य वर्षोंतक उन्होंने तपस्याद्वारा मेरा स्मरण किया, तब मैंने उन्हें मन्त्र प्रदान किया, जिसका वे पवित्रतापूर्वक इन्द्रियोंको काबूमें करके
६९६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
नियतरूपसे सात लाख दिव्य वर्षोंतक उस
कमलके अंदर जप करते रहे। इसके बाद मुझसे
वर पाकर उन सृष्टिकर्ताने सृष्टिकी रचना की।
मेरी मायाके बलसे ब्रह्माने प्रत्येक ब्रह्माण्डमें
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल, द्वादश आदित्य,
एकादश रुद्र, नौ ग्रह, आठ वसु, तीन करोड़
देवता, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यक्ष, गन्धर्व,
किन्नर, भूत-प्रेत आदि राक्षस एवं चराचर जगत्की
रचना की। उन्होंने प्रत्येक विश्वमें क्रमशः सात
स्वर्ग, सात सागरोंसे संयुक्त स्वर्णभूमिवाली
सप्तद्वीपवती पृथ्वी, अन्धकारमय स्थान, सात
पाताल तथा इनसे युक्त ब्रह्माण्डका निर्माण
किया। प्रत्येक विश्वमें चन्द्रमा, सूर्य, पुण्यक्षेत्र
भारत और इन गङ्गा आदि तीर्थोंकी सृष्टि की।
ब्रजेश्वर ! महाविष्णुके शरीरमें जितने रोमकूप हैं,
क्रमशः उतने ही असंख्य विश्व हैं। उन विश्वोंके
ऊर्ध्वभागमें वैकुण्ठ है, जो निराश्रय है तथा मेरी
इच्छासे जिसका निर्माण हुआ है। वेद भी उसका
वर्णन करके पार नहीं पा सकते। निश्चय ही
कुयोगियों तथा भक्तिहीनोंके लिये उसका दर्शन
दुर्लभ है। इससे ऊपर गोलोक है। वह परम
विचित्र आश्रयस्थान वायुके आधारपर टिका
हुआ है। मेरी इच्छासे उस अत्यन्त रमणीय
अविनाशी लोकका निर्माण हुआ है। वह शतशृङ्ग
पर्वत, पुण्यमय वृन्दावन, रमणीय रासमण्डल
तथा विरजा नदीसे युक्त है। विरजा अमूल्य
रत्नसमूहों, हीरा, माणिक्य तथा कौस्तुभ आदि
असंख्य मणियोंसे युक्त होनेके कारण बड़ी
मनोहर है। उस गोलोकमें प्रत्येक महल अमूल्य
रत्नोंके बने हुए हैं। उसमें ऐसा मनोहर परकोटा
है, जिसे विश्वकर्माने भी नहीं देखा है। वे महल
गोपियों, गोपगणों तथा कामधेनुओंसे परिवेष्टित
हैं। वहाँ रास-मण्डल असंख्यों कल्पवृक्षों, पारिजातके
तरुओं, सरोवरों तथा पुष्पोद्यानोंसे समावृत है।
वह गोपों, मन्दिरों, रत्नप्रदीपों, पुष्प-शय्याओं, कस्तूरी-
कुङ्कुमयुक्त सुगन्धित चन्दनके गन्धों, क्रीडोपयुक्त
भोगपदार्थों, सुवासित जल और पान-बीड़ाओं,
रमणीय सुगन्धियुक्त धूपों, पुष्पमालाओं और
रत्नजटित दर्पणोंसे भरा-पूरा है। अमूल्य रत्नाभरणों
तथा अग्नि-शुद्ध वस्त्रोंसे अलंकृत राधाकी दासियाँ
सदा उसकी रक्षा करती रहती हैं। नवयौवनसम्पन्न
तथा अनुपम सौन्दर्यशाली गजेन्द्रोंकी सेना क्रमशः
उसे घेरे हुए है। ब्रजराज ! वह रमणीय तथा
चन्द्रमण्डलके समान गोल है। उस विस्तृत
मण्डलकी रचना बहुमूल्य रत्नोंद्वारा हुई है। वह
कस्तूरी-कुङ्कुमयुक्त सुन्दर एवं सुगन्धित चन्दनसे
समर्चित है। वह फल-पल्लवयुक्त मङ्गल-कलशों,
दही और खीलों, पत्तों, कोमल दूर्वाङ्कुरों, फलों,
असंख्य केलेके मनोहर खम्भों तथा रेशमी सूत्रमें
बँधे हुए कोमल चन्दन-पल्लवोंकी वन्दनवारोंसे
आच्छादित है और चन्दनयुक्त पुष्पमालाओं एवं
आभूषणोंसे विभूषित है। वहाँ बहुमूल्य रत्नोंका
बना हुआ शतशृङ्ग पर्वत मनको खींचे लेता है।
वह अत्यन्त सुन्दर है। वेद भी उसका वर्णन नहीं
कर सकते। वह हीरेके हारसे युक्त होनेके कारण
रमणीय है तथा मनोहर परकोटेकी तरह उस
गोलोकको चारों ओरसे घेरे हुए है।
वहाँ चन्दनके वृक्षोंसे युक्त रमणीय वृन्दावन
है, जो कल्पवृक्षों, सुन्दर मन्दार-पुष्पों, कामधेनुओं,
शोभाशाली मनोहर पुष्पवाटिकाओं, रमणीय
क्रीड़ा-सरोवरों और परम सुन्दर क्रीड़ाभवनोंसे
सुशोभित है। उसके एकान्तमें रास-क्रीड़ाके
योग्य अत्यन्त सुन्दर स्थान है, जो चारों ओरसे
गोलाकार है। रक्षकरूपमें नियुक्त हुई असंख्यों
सुन्दरी गोपिकाएँ उसकी रक्षा करती हैं। वहाँ
कोकिल कूकते रहते हैं तथा भौंरोंका गुंजार होता
रहता है। उसीके एकान्त स्थलमें एक रमणीय
अक्षयवट है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई विशाल है।
सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला वह अक्षयवट
गोपियोंके लिये कल्पवृक्ष है। वहाँ राधाकी दासियाँ
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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क्रीड़ा करती रहती हैं। विरजाके तटप्रान्तके
जलका स्पर्श करके बहती हुई शीतल, मन्द,
सुगन्ध वायु उसे पवित्र करती रहती है। उस
अक्षयवटके नीचे वृन्दावनमें विनोद करनेवाली
मेरे प्राणोंकी अधिदेवता वह राधा असंख्यों
दासीगणोंके साथ क्रीड़ा करती है। वही राधा इस
समय वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई है। ब्रजेश !
ब्रह्मादि देवता, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र और सिद्धगण
गुण, बल, बुद्धि, ज्ञानयोग और विद्याद्वारा उसकी
पूजा करते हैं। तात ! यह मेरी प्रिया मेरे ही समान
है; अतः सब तरहसे वन्दनीया है। नन्दजी ! इस
प्रकार मैंने यथोचित एवं परिमित रूपसे ब्रह्माण्डोंका
वर्णन कर दिया। अब पुनः आपकी और क्या
सुननेकी इच्छा है ?
(अध्याय ८४)
चारों वर्णोंके भक्ष्याभक्ष्यका निरूपण तथा कर्मविपाकका वर्णन
नन्दजीने कहा - महाभाग ! अब चारों
वर्णोंके भक्ष्याभक्ष्यका तथा समस्त प्राणियोंके
कर्मविपाकका वर्णन कीजिये ।
श्रीभगवान् बोले- तात ! मैं चारों वर्णोंके
वेदोक्त भक्ष्याभक्ष्यका यथोचितरूपसे वर्णन करता
हूँ, उसे सावधान होकर श्रवण करो। मनुका
कथन है कि लोहेके बर्तनमें जलपान, उसमें
रखा हुआ गौका दूध-दही-घी, पकाया हुआ
अन्न भ्रष्ट्रादिक (भुना हुआ पदार्थ), मधु, गुड़,
नारियलका जल, फल, मूल आदि सभी पदार्थ
अभक्ष्य हो जाते हैं। जला हुआ अन्न तथा
गरमाया हुआ बदरीफल या खट्टी काँजीको भी
अभक्ष्य कहा गया है। काँसेके बर्तनमें नारियलका
जल और ताम्रपात्रमें स्थित मधु तथा घृतके
अतिरिक्त सभी गव्य पदार्थ (दूध-दही आदि)
मदिरा-तुल्य हो जाते हैं। ताम्रपात्रमें दूध पीना,
जूठा रखना, घीका भोजन करना और नमकसहित
दूध खाना तुरंत ही अभक्ष्यके समान पापकारक
हो जाता है। मधु मिला हुआ घी, तेल और गुड़
अभक्ष्य है तथा शास्त्रके मतानुसार गुड़मिश्रित
अदरक भी अभक्ष्य है। विद्वान् पुरुषको चाहिये
कि पीनेसे अवशिष्ट जल, माघमासमें मूली और
शय्यापर बैठकर जप आदिका सदा परित्याग कर
दे। उत्तम बुद्धिसम्पन्न पुरुषको दिनमें दो बार तथा
दोनों संध्याओंमें और रात्रिके पिछले पहरमें भोजन
नहीं करना चाहिये। पीनेका जल, खीर, चूर्ण,
घी, नमक, स्वस्तिकके आकारकी मिठाई, गुड़,
दूध, मट्ठा तथा मधु - ये एक हाथसे दूसरे हाथपर
ग्रहण करनेसे तत्काल ही अभक्ष्य हो जाते हैं।
श्रुतिकी सम्मतिसे चाँदीके पात्रमें रखा हुआ कपूर
अभक्ष्य हो जाता है। यदि परोसनेवाला व्यक्ति
भोजन करनेवालेको छू दे तो वह अन्न अभक्ष्य
हो जाता है - यह सभीको सम्मत है। ब्राह्मणोंको
भैंसका दूध, दही, घी, स्वस्तिक और माखन नहीं
खाना चाहिये। रविवारको अदरक सभीके लिये
अभक्ष्य है। ब्राह्मणोंके लिये बासी अन्न, जल
और दूध निषिद्ध है। असंस्कृत नमक और तेल
अभक्ष्य है; परंतु अग्निद्वारा संस्कृत पवित्र व्यञ्जन
सभीके खाने योग्य है। एक हाथसे धारण किया
हुआ, गँदला, कृमियुक्त और अपवित्र जल अपेय
होता है - यह सर्वसम्मत है। श्रीहरिको निवेदित
किये बिना कोई भी पदार्थ ब्राह्मणों, यतियों,
ब्रह्मचारियों, विशेष करके वैष्णवोंको नहीं खाना
चाहिये। तात ! जिस-किसी वस्तुमें अथवा मधु,
दूध, दही, घी और गुड़में यदि चींटियाँ पड़ गयी
हों तो उसे कभी नहीं खाना चाहिये। ऐसा श्रुतिमें
सुना गया है। पका हुआ शुद्ध फल, जिसे पक्षीने
काट दिया हो अथवा उसमें कीड़े पड़ गये हों तथा
कौवेद्वारा उच्छिष्ट किया हुआ पदार्थ सभीके लिये
अभक्ष्य होता है। घी अथवा तेलमें पकाया हुआ
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मिष्ठान्न तथा पीठक, यदि उसे शूद्रने बनाकर तैयार
किया हो तो वह शूद्रोंके ही खाने योग्य होता
है, ब्राह्मणोंके लिये नहीं। जो अपवित्र हैं, उन
सबके अन्न-जलका परित्याग कर देना चाहिये।
अशौचान्तके दूसरे दिन सब शुद्ध हो जाता है,
इसमें संशय नहीं है। ब्रजेश्वर ! इस प्रकार मैंने
अपनी जानकारीके अनुसार भक्ष्याभक्ष्यका वर्णन
कर दिया।
पिताजी ! श्रुतिके मतानुसार कर्मोंका विपाक
बड़ा दुष्कर होता है। इस विषयमें क्रमशः चारों
वेदोंमें चार प्रकारके मत बतलाये गये हैं; उनका
सारभूत रहस्य मैं कह रहा हूँ, सुनिये। चाहे
अरबों कल्प बीत जायें तो भी भोग किये बिना
कर्मका क्षय नहीं होता; अतः अपने द्वारा किया
हुआ शुभ-अशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ता
है*। तीर्थों और देवताओंके सहयोगसे मनुष्योंकी
भी कुछ सहायता हो जाती है; परंतु तात ! जो
मुझसे विमुख है, उसे निश्चय ही उसके द्वारा
किये गये प्रायश्चित्त उसी प्रकार पवित्र नहीं कर
सकते, जैसे नदियाँ मदिराके घड़ेको पावन नहीं
कर सकतीं। न तो उत्तम कर्मसे दुष्कर्मका नाश
होता है और न दुष्कर्म करनेसे सुकर्म ही नष्ट
होता है। यहाँतक कि यज्ञ, तप, व्रत, उपवास,
तीर्थस्नान, दान, जप, नियम, पृथ्वीकी परिक्रमा,
पुराण-श्रवण, पुण्योपदेश, गुरु और देवताकी
पूजा, स्वधर्माचरण, अतिथि-सत्कार, ब्राह्मणोंका
पूजन एवं विशेषतया उन्हें भोजन करानेसे भी
दुष्कर्मका विनाश नहीं होता। ब्राह्मणको जो दिया
जाता है, वह पूर्णरूपसे प्राप्त होता है; क्योंकि
ब्राह्मण क्षेत्ररूप है और वह दान बीजके समान
है। तात ! मनुष्य एक कर्मद्वारा स्वर्गको प्राप्त कर
लेता है; परंतु मोक्ष कर्मसे नहीं मिलता। वह तो
मेरी सेवासे सुलभ होता है। पुण्यकर्म करनेसे
स्वर्ग, दुष्कर्म करनेसे नरक तथा कुत्सित कर्म
करनेसे व्याधि और नीच योनिमें जन्म प्राप्त होता
है, तत्पश्चात् वह पवित्र होता है।
जो इच्छानुसार छोटे-बड़े पाप करनेवाला
तथा गोहत्यारा है, वह गौके शरीरमें जितने रोएँ
होते हैं उतने वर्षोंतक दन्दशूक नामक नरकमें
निवास करता है। वहाँ वह सर्पके डसनेके कारण
विषकी ज्वालासे तृषित एवं पीड़ित होता है तथा
आहार न मिलनेसे उसका पेट सट जाता है।
तत्पश्चात् उस कुण्डसे निकलकर गौके शरीरमें
जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक वह गौकी
योनिमें उत्पन्न होता है। तदनन्तर एक लाख
वर्षतक वह कोढ़ी और चाण्डाल होता है, इसके
बाद मनुष्य होता है। उस समय वह कर्मानुसार
कुष्ठरोगयुक्त ब्राह्मण होता है। तब एक लाख
ब्राह्मणोंको भोजन कराकर वह नीरोग तथा पवित्र
हो जाता है। गो-हत्या करनेवाला निश्चय ही उतने
वर्षोंतक गौ होता है, जितने उस गौके शरीरमें
रोएँ होते हैं। ब्रह्मघाती उनसे भी चौगुने वर्षोंतक
विष्ठाका कीड़ा होता है, तदनन्तर उससे चौगुने
वर्षोंतक म्लेच्छ होता है। तत्पश्चात् उनसे चौगुने
वर्षोंतक अंधा होकर ब्राह्मणके घरमें जन्म लेता
है। वहाँ चार लाख विप्रोंको भोजन करानेसे वह
उस महान् पातकसे मुक्त होकर पवित्र नेत्रयुक्त
और यशस्वी हो जाता है। चारों वर्णोंमें जो स्त्रीकी
हत्या करनेवाला है, उसे वेदमें महापातकी कहा
गया है। वह उस स्त्रीके शरीरमें जितने रोएँ
होते हैं उतने वर्षोंतक कालसूत्र नरकमें वास
करता है। वहाँ उसे कीड़े काटते रहते हैं, आहार
नहीं मिलता और नरक-यातना भोगनी पड़ती है।
तदनन्तर वह पापी उतने ही वर्षोंतक जगत्में
जन्म लेता है। वहाँ वह कर्मानुसार पापपरायण
तथा राजयक्ष्मासे ग्रस्त रहता है। फिर सौ वर्षोंतक
- नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥
(८५। ३६)