वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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श्रीवामनपुराण
[ अध्याय ६
ततो हरः शरेणाथ उन्मादेनाशु ताडितः।
विचचार मदोन्मत्तः काननानि सरांसि च ॥ २८
स्मरन् सतीं महादेवस्तथोन्मादेन ताडितः।
न शर्म लेभे देवर्षे बाणविद्ध इव द्विपः ॥ २९
ततः पपात देवेशः कालिन्दीसरितं मुने।
निमग्ने शंकरे आपो दग्धाः कृष्णत्वमागताः ॥ ३०
तदाप्रभृति कालिन्द्या भृङ्गाञ्जननिभं जलम्।
आस्यन्दत् पुण्यतीर्था सा केशपाशमिवावनेः ॥ ३१
ततो नदीषु पुण्यासु सरस्सु च नदेषु च।
पुलिनेषु च रम्येषु वापीषु नलिनीषु च ॥ ३२
पर्वतेषु च रम्येषु काननेषु च सानुषु।
विचरन् स्वेच्छया नैव शर्म लेभे महेश्वरः ॥ ३३
क्षणं गायति देवर्षे क्षणं रोदिति शंकरः।
क्षणं ध्यायति तन्वङ्गीं दक्षकन्यां मनोरमाम् ॥ ३४
ध्यात्वा क्षणं प्रस्वपिति क्षणं स्वप्नायते हरः।
स्वप्ने तथे॒दं गदति तां दृष्ट्वा दक्षकन्यकाम् ॥ ३५
निर्घृणे तिष्ठ किं मूढे त्यजसे मामनिन्दिते।
मुग्धे त्वया विरहितो दग्धोऽस्मि मदनाग्निना ॥ ३६
सति सत्यं प्रकुपिता मा कोपं कुरु सुन्दरि।
पादप्रणामावनतमभिभाषितुमर्हसि ॥ ३७
श्रूयसे दृश्यसे नित्यं स्पृश्यसे वन्द्यसे प्रिये।
आलिङ्ग्यसे च सततं किमर्थं नाभिभाषसे ॥ ३८
विलपन्तं जनं दृष्ट्वा कृपा कस्य न जायते।
विशेषतः पतिं बाले ननु त्वमतिनिर्घृणा ॥ ३९
त्वयोक्तानि वचांस्येवं पूर्वं मम कृशोदरि।
विना त्वया न जीवेयं तदसत्यं त्वया कृतम् ॥ ४०
एहोहि कामसंतप्तं परिष्वज सुलोचने।
नान्यथा नश्यते तापः सत्येनापि शपे प्रिये ॥ ४१
इत्थं विलप्य स्वप्नान्ते प्रतिबुद्धस्तु तत्क्षणात्।
उत्कूजति तथारण्ये मुक्तकण्ठं पुनः पुनः ॥ ४२
आहत होकर शिवजी उन्मत्त होकर वनों और सरोवरोंमें
घूमने लगे। देवर्षे ! बाणविद्ध गजके समान उन्मादसे
व्यथित महादेव सतीका स्मरण करते हुए बड़े अशान्त
हो रहे थे—उन्हें चैन नहीं था ॥ २६–२९ ॥
मुने ! उसके बाद शिवजी यमुना नदीमें कूद पड़े।
उनके जलमें निमज्जन करनेसे उस नदीका जल काला
हो गया। उस समयसे कालिन्दी नदीका जल भृंग
और अंजनके सदृश कृष्णवर्णका हो गया एवं वह पवित्र
तीर्थोंवाली नदी पृथ्वीके केशपाशके सदृश प्रवाहित
होने लगी। उसके बाद पवित्र नदियों, सरोवरों, नदों,
रमणीय नदी-तटों, वापियों, कमलवनों, पर्वतों, मनोहर
काननों तथा पर्वत-शृङ्गोंपर स्वेच्छापूर्वक विचरण
करते हुए भगवान् शिव कहीं भी शान्ति नहीं प्राप्त
कर सके ॥ ३०-३३।
देवर्षे ! वे कभी गाते, कभी रोते और कभी
कृशाङ्गी सुन्दरी सतीका ध्यान करते। ध्यान करके कभी
सोते और कभी स्वप्न देखने लगते थे; स्वप्नकालमें
सतीको देखकर वे इस प्रकार कहते थे—निर्दये ! रुको,
हे मूढे ! मुझे क्यों छोड़ रही हो ? हे अनिन्दिते ! हे मुग्धे !
तुम्हारे विरहमें मैं कामाग्निसे दग्ध हो रहा हूँ। हे सति !
क्या तुम वस्तुतः क्रुद्ध हो ? सुन्दरि ! क्रोध मत करो।
मैं तुम्हारे चरणोंमें अवनत होकर प्रणाम करता हूँ। तुम्हें
मेरे साथ बात तो करनी ही चाहिये ॥ ३४-३७॥
प्रिये ! मैं सतत तुम्हारी ध्वनि सुनता हूँ, तुम्हें
देखता हूँ, तुम्हारा स्पर्श करता हूँ, तुम्हारी वन्दना करता
हूँ और तुम्हारा परिष्वङ्ग करता हूँ। तुम मुझसे बात क्यों
नहीं कर रही हो ? बाले ! विलाप करनेवाले व्यक्तिको
देखकर किसे दया नहीं उत्पन्न होती ? विशेषतः अपने
पतिको विलाप करता देखकर तो किसे दया नहीं
आती ? निश्चय ही तुम अति निर्दयी हो । सूक्ष्मकटिवाली !
तुमने पहले मुझसे कहा था कि तुम्हारे बिना मैं जीवित
नहीं रहूँगी। उसे तुमने असत्य कर दिया। सुलोचने !
आओ, आओ; कामसन्तप्त मुझे आलिङ्गित करो। प्रिये !
मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि अन्य किसी
प्रकार मेरा ताप नहीं शान्त होगा ॥ ३८-४१॥
इस प्रकार वे विलाप कर स्वप्नके अन्तमें उठकर
वनमें बार-बार रोने लगे। इस प्रकार मुक्तकण्ठसे