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वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

अध्याय ४ ] विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष-यक्षकी वार्ता, एवं सतीका प्राण-त्याग २१
ततः कपाली लोके च ख्यातो रुद्र भविष्यसि ।
कपालमोचनेत्येवं तीर्थं चेदं भविष्यति ॥ ४९
'कपाली' नामसे प्रसिद्ध होंगे तथा यह तीर्थ भी
'कपालमोचन' नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ ४६-४९ ॥
पुलस्त्य उवाच
एवमुक्तः सुरेशन केशवेन महेश्वरः।
कपालमोचने सस्नौ वेदोक्तविधिना मुने ॥ ५०
स्नातस्य तीर्थे त्रिपुरान्तकस्य
परिच्युतं हस्ततलात् कपालम्।
नाम्ना बभूवाथ कपालमोचनं
तत्तीर्थवर्यं भगवत्प्रसादात् ॥ ५१
पुलस्त्यजी बोले- मुने ! सुरेश्वर केशवके ऐसा
कहनेपर महेश्वरने कपालमोचनतीर्थमें वेदोक्त विधिसे
स्नान किया। उस तीर्थमें स्नान करते ही उनके
हाथसे ब्रह्म-कपाल गिर गया। तभीसे भगवान्‌की
कृपासे उस उत्तम तीर्थका नाम 'कपालमोचन'
पड़ा* ॥ ५०-५१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय
विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष-यज्ञकी वार्ता, सतीका प्राण-त्याग; शिवका क्रोध
एवं उनके गणोंद्वारा दक्ष-यज्ञका विध्वंस
पुलस्त्य उवाच
एवं कपाली संजातो देवर्षे भगवान् हरः।
अनेन कारणेनासौ दक्षेण न निमन्त्रितः ॥ १
कपालिजायेति सतीं विज्ञायाथ प्रजापतिः।
यज्ञे चार्हापि दुहिता दक्षेण न निमन्त्रिता ॥ २
एतस्मिन्नन्तरे देवीं द्रष्टुं गौतमनन्दिनी।
जया जगाम शैलेन्द्रं मन्दरं चारुकन्दरम् ॥ ३
तामागतां सती दृष्ट्वा जयामेकामुवाच ह।
किमर्थं विजया नागाज्जयन्ती चापराजिता ॥ ४
सा देव्या वचनं श्रुत्वा उवाच परमेश्वरीम्।
गता निमन्त्रिताः सर्वा मखे मातामहस्य ताः ॥ ५
समं पित्रा गौतमेन मात्रा चैवाप्यहल्यया।
अहं समागता द्रष्टुं त्वां तत्र गमनोत्सुका ॥ ६
किं त्वं न व्रजसे तत्र तथा देवो महेश्वरः।
नामन्त्रिताऽसि तातेन उताहोस्वित् व्रजिष्यसि ॥ ७
गतास्तु ऋषयः सर्वे ऋषिपत्न्यः सुरास्तथा।
मातृष्वसः शशाङ्कश्च सपत्नीको गतः क्रतुम् ॥ ८
चतुर्दशेषु लोकेषु जन्तवो ये चराचराः।
निमन्त्रिताः क्रतौ सर्वे किं नासि त्वं निमन्त्रिता ॥ ९
पुलस्त्यजी बोले- देवर्षे ! भगवान् शिव इस
प्रकार कपाली नामसे ख्यात हुए और इसी कारण वे
दक्षके द्वारा निमन्त्रित नहीं हुए। प्रजापति दक्षने सतीको
अपनी पुत्री होनेपर भी कपालीकी पत्नी समझकर
निमन्त्रणके योग्य न मानकर उन्हें यज्ञमें नहीं बुलाया।
इसी बीच देवीका दर्शन करनेके लिये गौतम-पुत्री जया
सुन्दर गुफावाले पर्वतश्रेष्ठ मन्दरपर गयी। जयाको वहाँ
अकेली आयी देखकर सती बोलीं- विजये! जयन्ती
और अपराजिता यहाँ क्यों नहीं आयीं? ॥ १-४ ॥
देवीके वचनको सुनकर जयाने उन सती परमेश्वरीसे
कहा - अपने पिता गौतम और माता अहल्याके साथ वे
मातामहके सत्र (यज्ञ) -में निमन्त्रित होकर चली गयी हैं।
वहाँ जानेके लिये उत्सुक मैं आपसे मिलने आयी हूँ। क्या
आप तथा भगवान् शिव वहाँ नहीं जा रहे हैं? क्या पिताजीने
आपको नहीं बुलाया है ? अथवा आप वहाँ जायेंगी ?
सभी ऋषि, ऋषि-पत्नियों तथा देवगण वहाँ गये हैं। हे
मातृष्वसः (मौसी)! पत्नीके सहित शशाङ्क भी उस यज्ञमें
गये हैं। चौदहों लोकोंके समस्त चराचर प्राणी उस यज्ञमें
निमन्त्रित हुए हैं। क्या आप निमन्त्रित नहीं हैं? ॥ ५-९ ॥

  • कपालमोचन तीर्थ काशीके परिसरमें बकरियाकुण्डसे १ मीलपर स्थित है।