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सर्वकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 165

अध्याय ३४]
कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवं सम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य
१५५
तस्मिन् तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा कोटीश्वरं हरम् ।
कोटितीर्थ कहा जाता है। मनुष्य श्रद्धापूर्वक उस तीर्थमें
पञ्चयज्ञानवाप्नोति नित्यं श्रद्धासमन्वितः ॥ २९
स्नान कर तथा कोटीश्वर हरका दर्शन कर पाँच प्रकारके
(महा) यज्ञोंके अनुष्ठानका फल प्राप्त करता है। उसी
तत्रैव वामनो देवः सर्वदेवैः प्रतिष्ठितः ।
स्थानपर सब देवताओंने भगवान् वामनदेवकी स्थापना
तत्रापि च नरः स्नात्वा ह्यग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ३०
की है। वहाँ भी स्नान करनेसे मनुष्यको अग्निष्टोम
यज्ञका फल प्राप्त होता है। श्रद्धावान् जितेन्द्रिय मनुष्य
अश्विनोस्तीर्थमासाद्य श्रद्धावान् यो जितेन्द्रियः ।
अश्विनीकुमारोंके तीर्थमें जाकर रूपवान् और यशस्वी
रूपस्य भागी भवति यशस्वी च भवेन्नरः ॥ ३१
होता है॥ २८-३१॥
वाराहं तीर्थमाख्यातं विष्णुना परिकीर्तितम् ।
विष्णुद्वारा वर्णित वाराह नामक विख्यात तीर्थ है।
तस्मिन् स्नात्वा श्रद्धधानः प्राप्नोति परमं पदम् ॥ ३२
श्रद्धालु पुरुष उसमें स्नान कर परमपदको प्राप्त करता
ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः सोमतीर्थमनुत्तमम् ।
है। विप्रेन्द्रो ! उसके बाद श्रेष्ठ सोमतीर्थमें जाना चाहिये,
जहाँ चन्द्रमा पूर्वकालमें तपस्या कर व्याधिसे मुक्त हुए
यत्र सोमस्तपस्तप्त्वा व्याधिमुक्तोऽभवत् पुरा ॥ ३३
थे। उस शुभ तीर्थमें स्नान कर सोमेश्वर भगवान्का दर्शन
तत्र सोमेश्वरं दृष्ट्वा स्नात्वा तीर्थवरे शुभे ।
करनेसे मनुष्य राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त करता है तथा
राजसूयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ३४
व्याधियों और सभी दोषोंसे मुक्त होकर सोमलोकमें
व्याधिभिश्च विनिर्मुक्तः सर्वदोषविवर्जितः ।
जाता एवं चिरकालतक वहाँ सानन्द विहार करता
सोमलोकमवाप्नोति तत्रैव रमते चिरम् ॥ ३५
है॥ ३२-३५॥
भूतेश्वरं च तत्रैव ज्वालामालेश्वरं तथा।
वहींपर भूतेश्वर एवं ज्वालामालेश्वर नामक
तावुभौ लिङ्गावभ्यर्च्य न भूयो जन्म चाप्नुयात् ॥ ३६
लिङ्ग है। उन दोनों लिङ्गोंकी पूजा करनेसे (मनुष्य)
पुनर्जन्म नहीं पाता। एकहंस (सरोवर)-में स्नान कर
एकहंसे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ।
मनुष्य हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त करता है।
कृतशौचं समासाद्य तीर्थसेवी द्विजोत्तमः ॥ ३७
'कृतशौच' नामक तीर्थमें जाकर मनोयोगपूर्वक तीर्थकी
सेवा करनेवाला द्विजोत्तम 'पुण्डरीक' यज्ञविशेषके फलको
पुण्डरीकमवाप्नोति कृतशौचो भवेन्नरः ।
प्राप्त करता है तथा उसकी शुद्धि हो जाती है (-वह
ततो मुञ्जवटं नाम महादेवस्य धीमतः ॥ ३८
पवित्र हो जाता है)। उसके बाद बुद्धिमान् महादेवके
उपोष्य रजनीमेकां गाणपत्यमवाप्नुयात् ।
मुञ्जवट नामक तीर्थमें एक रात्रि निवास करके मनुष्य
तत्रैव च महाग्राही यक्षिणी लोकविश्रुता ॥ ३९
गाणपत्य (गणनायके पदको) प्राप्त करता है। वहीं
विश्वप्रसिद्ध महाग्राही यक्षिणी है। वहाँ जाकर स्नान
स्नात्वाऽभिगत्वा तत्रैव प्रसाद्य यक्षिणीं ततः ।
करनेके बाद यक्षिणीको प्रसन्न कर उपवास करनेसे
उपवासं च तत्रैव महापातकनाशनम् ॥ ४०
महान् पातकोंका नाश होता है॥ ३६-४०॥
कुरुक्षेत्रस्य तद् द्वारं विश्रुतं पुण्यवर्धनम् ।
पुण्यकी वृद्धि करनेवाले कुरुक्षेत्रके उस विख्यात
प्रदक्षिणमुपावर्त्य ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः ।
द्वारकी प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर
पुष्करं च ततो गत्वा अभ्यर्च्य पितृदेवताः ॥ ४१
पुष्करमें जाकर पितृदेवोंकी अर्चना करे। उस तीर्थका
महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजीने निर्माण किया था।
जामदग्न्येन रामेण आहृतं तन्महात्मना ।
वहाँ (जाकर) मनुष्य सफल-मनोरथ हो जाता है और
कृतकृत्यो भवेद् राजा अश्वमेधं च विन्दति ॥ ४२
राजाको अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। कार्तिकी
कन्यादानं च यस्तत्र कार्तिकायां वै करिष्यति ।
पूर्णिमाको जो मनुष्य वहाँ कन्यादान करेगा, उसके ऊपर
प्रसन्ना देवतास्तस्य दास्यन्त्यभिमतं फलम् ॥ ४३
देवता प्रसन्न होकर उसे मनोवाञ्छित फल देंगे। वहाँ