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सर्वकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १९
एवंस्वरूपा दनुनाथ कन्या
महोग्रशस्त्राणि च धारयन्ती।
दृष्ट्वा यथेष्टं न च विद्म का सा
सुताऽथवा कस्यचिदेव बाला ॥ १५
तद्भूतले रत्नमनुत्तमं स्थितं
स्वर्गं परित्यज्य महासुरेन्द्र ।
गत्वाथ विन्ध्यं स्वयमेव पश्य
कुरुष्व यत् तेऽभिमतं क्षमं च ॥ १६
श्रुत्वैव ताभ्यां महिषासुरस्तु
देव्याः प्रवृत्तिं कमनीयरूपाम् ।
चक्रे मतिं नात्र विचारमस्ति
इत्येवमुक्त्वा महिषोऽपि नास्ति ॥ १७
प्रागेव पुंसस्तु शुभाशुभानि
स्थाने विधात्रा प्रतिपादितानि ।
यस्मिन् यथा यानि यतोऽथ विप्र
स नीयते वा व्रजति स्वयं वा ॥ १८
ततोऽनु मुण्डं नमरं सचण्डं
विडालनेत्रं सपिाशङ्गवाष्कलम् ।
उग्रायुधं चिक्षुररक्तबीजौ
समादिदेशाथ महासुरेन्द्रः ॥ १९
आहत्य भेरी रणकर्कशास्ते
स्वर्गं परित्यज्य महीधरं तु ।
आगम्य मूले शिविरं निवेश्य
तस्थुश्च सज्जा दनुनन्दनास्ते ॥ २०
ततस्तु दैत्यो महिषासुरेण
सम्प्रेषितो दानवयूथपालः ।
मयस्य पुत्रो रिपुसैन्यमर्दी
स दुन्दुभिर्दुन्दुभिनिःस्वनस्तु ॥ २१
अभ्येत्य देवीं गगनस्थितोऽपि
स दुन्दुभिर्वाक्यमुवाच विप्र ।
कुमारि दूतोऽस्मि महासुरस्य
रम्भात्मजस्याप्रतिमस्य युद्धे ॥ २२
कात्यायनी दुन्दुभिमभ्युवाच
एह्येहि दैत्येन्द्र भयं विमुच्य ।
वाक्यं च यद्रम्भसुतो बभाषे
वदस्व तत्सत्यमपेतमोहः ॥ २३
दैत्येश्वर ! वह कन्या बड़े और भयानक शस्त्रोंको धारण
किये हुए है। उसे भलीभाँति देखकर भी हम यह न
जान सके कि वह कौन है तथा किसकी पुत्री या स्त्री
है। महासुरेन्द्र ! वह स्वर्गका परित्याग कर भूतलमें स्थित
श्रेष्ठरत्न है। आप स्वयं विन्ध्यपर्वतपर जाकर उसे देखें
और फिर जो आपकी इच्छा एवं सामर्थ्य हो वह
करें' ॥ १३-१६ ॥
उन दोनों दूतोंसे कात्यायनीके आकर्षक सौन्दर्यकी
बात सुनकर महिषने 'इस विषयमें कुछ भी विचारना
नहीं है'- यह कहकर जानेका निश्चय किया। इस प्रकार
मानो महिषका अन्त ही आ गया। मनुष्यके शुभाशुभको
ब्रह्माने पहलेसे ही निर्धारित कर रखा है। जिस
व्यक्तिको जहाँपर या जहाँसे जिस प्रकार जो कुछ भी
शुभाशुभ परिणाम होनेवाला होता है, वह वहाँ ले जाया
जाता है या स्वयं चला जाता है। फिर महिषने मुण्ड,
नमर, चण्ड, विडालनेत्र, पिशङ्गके साथ वाष्कल, उग्रायुध,
चिक्षुर और रक्तबीजको आज्ञा दी। वे सभी दानव
रणकर्कश भेरियाँ बजाकर स्वर्गको छोड़कर उस पर्वतके
निकट आ गये और उसके मूलमें सेनाके दलोंका
पड़ाव डालकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ १७-२० ॥
तत्पश्चात् महिषासुरने देवीके पास धौंसकी ध्वनिकी
भाँति उच्च और गम्भीर ध्वनिमें बोलनेवाले तथा
शत्रुओंकी सेनाओंके समूहोंका मर्दन करनेवाले दानवोंके
सेनापति मयपुत्र दुन्दुभिको भेजा। ब्राह्मणदेवता नारदजी !
दुन्दुभिने देवीके पास पहुँचकर आकाशमें स्थित होकर
उनसे यह वाक्य कहा - हे कुमारि ! मैं महान् असुर
रम्भके पुत्र महिषका दूत हूँ। वह युद्धमें अद्वितीय
वीर है। इसपर कात्यायनीने दुन्दुभिसे कहा- दैत्येन्द्र !
तुम निडर होकर इधर आओ और रम्भपुत्रने जो
वचन कहा है, उसे स्वस्थ होकर ठीक-ठीक कहो।