वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 97, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १६] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८७
कङ्काः समं बलाकाभिरारोहन्ति नभोत्तमान्।
ऋषिश्रेष्ठ ! (तब) बलाकाओं (बगुलोंके झुंडों)-के साथ
वायसाश्चापि कुर्वन्ति नीडानि ऋषिपूंगव ।
कङ्क पक्षी ऊँचे पर्वतोंपर चढ़ जाते हैं तथा कौए घोंसले
वायसाश्च स्वपन्त्येते ऋतौ गर्भभरालसाः ॥ १८
बनाने लगते हैं। इस ऋतुमें मादा कौएँ गर्भभारके कारण
यस्यां तिथ्यां प्रस्वपिति विश्वकर्मा प्रजापतिः।
आलस्यसे सोती हैं। प्रजापति विश्वकर्मा जिस द्वितीया
तिथिमें सोते हैं, वह कल्याणकारिणी पवित्र तिथि अशून्यशयना
द्वितीया सा शुभा पुण्या अशून्यशयनोदिता ॥ १९
द्वितीया तिथि कही जाती है। मुने ! उस तिथिमें लक्ष्मीके
तस्यां तिथावर्च्य हरिं श्रीवत्साङ्कं चतुर्भुजम् ।
साथ पर्यङ्कस्थ श्रीवत्स नामक चिह्न धारण करनेवाले
पर्यङ्कस्थं समं लक्ष्म्या गन्धपुष्पादिभिर्मुने ॥ २०
चतुर्भुज विष्णुभगवान्की गन्ध-पुष्पादिके द्वारा पूजाके
ततो देवाय शय्यायां फलानि प्रक्षिपेत् क्रमात्।
हेतु शय्यापर क्रमशः फल तथा सुगन्ध-द्रव्य निवेदित
सुरभीणि निवेद्येत्थं विज्ञाप्यो मधुसूदनः ॥ २१
कर उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे कि— ॥ १७–२१ ॥
यथा हि लक्ष्म्या न वियुज्यसे त्वं
हे त्रिविक्रम ! हे अनन्त !! हे जगन्निवास !!! जिस
त्रिविक्रमानन्त जगन्निवास।
प्रकार आप लक्ष्मीसे कभी अलग नहीं होते, उसी
तथा त्वशून्यं शयनं सदैव
प्रकार आपकी कृपासे हमारी शय्या भी कभी शून्य न
अस्माकमेवेह तव प्रसादात् ॥ २२
हो। हे देव! हे वरद! हे अच्युत! हे ईश ! हे
यथा त्वशून्यं तव देव तल्पं
अमितवीर्यशाली विष्णो ! आपकी शय्या लक्ष्मीसे शून्य
समं हि लक्ष्म्या वरदाच्युतेश।
नहीं होती, उसी सत्यके प्रभावसे हमारी भी गृहस्थीके
सत्येन तेनामितवीर्य विष्णो
नाशका अवसर न आवे—पत्नीका वियोग न हो। देवर्षे !
गार्हस्थ्यनाशो मम नास्तु देव ॥ २३
इस प्रकार स्तुति करनेके बाद भगवान् विष्णुको
इत्युच्चार्य प्रणम्येशं प्रसाद्य च पुनः पुनः।
प्रणामद्वारा बार-बार प्रसन्नकर रात्रिमें तेल एवं नमकसे
नक्तं भुञ्जीत देवर्षे तैलक्षारविवर्जितम् ॥ २४
रहित भोजन करे। दूसरे दिन बुद्धिमान् व्यक्ति, भगवान्
द्वितीयेऽह्नि द्विजाग्र्याय फलान् दद्याद् विचक्षणः।
लक्ष्मीधर मेरे ऊपर प्रसन्न हों-यह वाक्य उच्चारण
लक्ष्मीधरः प्रीयतां मे इत्युच्चार्य निवेदयेत् ॥ २५
कर श्रेष्ठ ब्राह्मणको फलोंका दान दे ॥ २२-२५ ॥
अनेन तु विधानेन चातुर्मास्यव्रतं चरेत्।
जबतक सूर्य वृश्चिकराशिपर रहते हैं, तबतक इसी
यावद् वृश्चिकराशिस्थः प्रतिभाति दिवाकरः ॥ २६
विधिसे चातुर्मास्य-व्रतका पालन किया जाना चाहिये।
ततो विबुध्यन्ति सुराः क्रमशः क्रमशो मुने।
मुने ! उसके बाद क्रमशः देवता जागते हैं। सूर्यके तुलाराशिमें
स्थित होनेपर विष्णु जाग जाते हैं। उसके बाद काम और
तुलास्थेऽर्के हरिः कामः शिवः पश्चाद्विबुध्यते ॥ २७
शिव जागते हैं। उसके पश्चात् द्वितीयाके दिन अपने
तत्र दानं द्वितीयायां मूर्तिर्लक्ष्मीधरस्य तु।
विभवके अनुसार बिछौनेवाली शय्याके साथ लक्ष्मीधरकी
सशय्यास्तरणोपेता यथा विभवमात्मनः ॥ २८
मूर्तिका दान करे। महामुने ! इस प्रकार मैंने आपको यह
एष व्रतस्तु प्रथमः प्रोक्तस्तव महामुने ।
प्रथम व्रत बतलाया, जिसका आचरण करनेपर इस
यस्मिंश्चीर्णे वियोगस्तु न भवेदिह कस्यचित् ॥ २९
संसारमें किसीको वियोग नहीं होता ॥ २६-२९ ॥
नभस्ये मासि च तथा या स्यात्कृष्णाष्टमी शुभा।
इसी प्रकार भाद्रपदमासमें मृगशिरा नक्षत्रसे
युक्ता मृगशिरेणैव सा तु कालाष्टमी स्मृता ॥ ३०
युक्त जो पवित्र कृष्णाष्टमी होती है उसे कालाष्टमी
माना गया है। उस तिथिमें भगवान् शंकर समस्त लिङ्गोंमें
तस्यां सर्वेषु लिङ्गेषु तिथौ स्वपिति शंकरः।
सोते एवं उनके संनिधानमें निवास करते हैं। इस
वसते संनिधाने तु तत्र पूजाऽक्षया स्मृता ॥ ३१
अवसरपर की गयी शंकरजीकी पूजा अक्षय मानी गयी है।