वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३९]
कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन
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विज्ञाय तस्य तद्भावं रुषङ्गोस्ते तपोधनाः ।
तं वै तीर्थे उपानिन्युः सरस्वत्यास्तपोधनम् ॥ १८
स तैः पुत्रैः समानीतः सरस्वत्यां समाप्लुतः ।
स्मृत्वा तीर्थगुणान् सर्वान् प्राहेदृषिसत्तमः ॥ १९
सरस्वत्युत्तरे तीर्थे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् ।
पृथूदके जप्यपरो नूनं चामरतां व्रजेत् ॥ २०
तत्रैव ब्रह्मयोन्यस्ति ब्रह्मणा यत्र निर्मिता।
पृथूदकं समाश्रित्य सरस्वत्यास्तटे स्थितः ॥ २१
चातुर्वर्ण्यस्य सृष्ट्यर्थमात्मज्ञानपरोऽभवत्।
तस्याभिधायतः सृष्टिं ब्रह्मणो व्यक्तजन्मनः ॥ २२
मुखतो ब्राह्मणा जाता बाहुभ्यां क्षत्रियास्तथा ।
ऊरुभ्यां वैश्यजातीयाः पद्भ्यां शूद्रास्ततोऽभवन् ॥ २३
चातुर्वर्ण्यं ततो दृष्ट्वा आश्रमस्थं ततस्ततः।
एवं प्रतिष्ठितं तीर्थं ब्रह्मयोनीति संज्ञितम् ॥ २४
तत्र स्नात्वा मुक्तिकामः पुनर्योनिं न पश्यति।
तत्रैव तीर्थं विख्यातमवकीर्णेति नामतः ॥ २५
यस्मिंस्तीर्थे वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रममर्षणम् ।
जुहाव वाहनैः सार्धं तत्राबुध्यत् ततो नृपः ॥ २६
ऋषय ऊचुः
कथं प्रतिष्ठितं तीर्थमवकीर्णेति नामतः।
धृतराष्ट्रेण राज्ञा च स किमर्थं प्रसादितः ॥ २७
लोमहर्षण उवाच
ऋषयो नैमिषेया ये दक्षिणार्थं ययुः पुरा।
तत्रैव च वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रमयाचत ॥ २८
तेनापि तत्र निन्दार्थमुक्तं पश्चानृतं तु यत्।
ततः क्रोधेन महता मांसमुत्कृत्य तत्र ह ॥ २९
पृथूदके महातीर्थे अवकीर्णेति नामतः ।
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेस्ततः ॥ ३०
हूयमाने तदा राष्ट्रे प्रवृत्ते यज्ञकर्मणि ।
अक्षीयत ततो राष्ट्रं नृपतेर्दुष्कृतेन वै ॥ ३१
(तीर्थ)-में ले चलो। रुषङ्गुके उस भावको जानकर वे
तपोधन (पुत्र) उन तपके धनीको सरस्वतीके तीर्थमें
ले गये ॥ १४ - १८॥
उन पुत्रोंद्वारा लाये गये उन ऋषिश्रेष्ठने सरस्वतीमें
स्नान करनेके पश्चात् उस तीर्थके सब गुणोंका स्मरण
कर यह कहा था-'सरस्वतीके उत्तरकी ओर स्थित
पृथूदक नामके तीर्थमें अपने शरीरका त्याग करनेवाला
जपपरायण मनुष्य निश्चय ही देवत्वको प्राप्त होता है।'
वहीं ब्रह्माद्वारा निर्मित 'ब्रह्मयोनितीर्थ' है, जहाँ सरस्वतीके
किनारे अवस्थित पृथूदकमें स्थित होकर ब्रह्मा चारों
वर्णोंकी सृष्टिके लिये आत्मज्ञानमें लीन हुए थे। सृष्टिके
विषयमें अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके चिन्तन करनेपर उनके
मुखसे ब्राह्मण, भुजाओंसे क्षत्रिय, दोनों ऊरुओंसे वैश्य
और दोनों पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए ॥ १९-२३॥
उसके बाद उन्होंने चारों वर्णोंको विभिन्न
आश्रमोंमें स्थित हुआ देखा। इस प्रकार ब्रह्मयोनि
नामक तीर्थकी प्रतिष्ठा हुई थी। मुक्तिकी कामना
करनेवाला व्यक्ति वहाँ स्नान करनेसे पुनर्जन्म नहीं
देखता। वहीं अवकीर्ण नामक एक विख्यात तीर्थ भी
है, जहाँपर दाल्भ्य (दल्भ या दल्भि गोत्रमें उत्पन्न)
वक नामक ऋषिने क्रोधी धृतराष्ट्रको उसके वाहनोंके
साथ हवन कर दिया था, तब कहीं राजाको (अपने
किये कर्मका) ज्ञान हुआ था ॥ २४ - २६ ॥
ऋषियोंने पूछा- अवकीर्ण नामक तीर्थ कैसे
प्रतिष्ठित हुआ एवं राजा धृतराष्ट्रने उन (वक दाल्भ्य
मुनि)-को क्यों प्रसन्न किया था ? ॥ २७ ॥
लोमहर्षणने कहा- प्राचीन कालमें नैमिषारण्य-
निवासी जो ऋषि दक्षिणा पानेके लिये (राजा धृतराष्ट्रके
यहाँ) गये थे, उनमेंसे दल्भिवंशीय वक ऋषिने धृतराष्ट्रसे
(धनकी) याचना की। उन्होंने (धृतराष्ट्रने) भी निन्दापूर्ण
ग्राम्य और असत्य बात कही। उसके बाद वे (वक
दाल्भ्य) अत्यन्त क्रुद्ध होकर पृथूदकमें स्थित अवकीर्ण
नामक तीर्थमें जा करके मांस काट-काटकर धृतराष्ट्रके
राष्ट्रके नाम हवन करने लगे। तब यज्ञमें राष्ट्रका
हवन प्रारम्भ होनेपर राजाके दुष्कर्मके कारण राष्ट्रका
क्षय होने लगा ॥ २८-३१ ॥