सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

७६- प्रायश्चित्त-हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति, वासुदेवका अदितिके पुत्र बननेका आश्वासन और स्वतेजसे अदितिके गर्भमें प्रवेश

३६४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
संनिपातस्तयो रौद्रः सैन्ययोरभवन्मुने।<br>महीधरोत्तमे पूर्वं यथा वानरहस्तिनोः॥ २७<br><br>रणरेणू रथोद्भूतः पिङ्गलो रणमूर्धनि।<br>संध्यानुरक्तः सदृशो मेघः खे सुरतापस॥ २८<br><br>तदासीत् तुमुलं युद्धं न प्राज्ञायत किंचन।<br>श्रूयते त्वनिशं शब्दश्छिन्धि भिन्धीति सर्वतः॥ २९भारी युद्ध हुआ। मुनि नारदजी! पहले समयमें जैसा युद्ध बन्दर एवं हाथियोंके बीच हुआ था, वैसा ही घमासान संग्राम उन दोनों सेनाओंमें हुआ। सुरतापस! रथसे उड़ी हुई युद्धकी पिङ्गल वर्णकी धूल युद्ध-भूमिके ऊपर आकाशमें स्थित सन्ध्याकालके लाल बादलकी भाँति लग रही थी। उस समय चल रहे घनघोर युद्धमें कुछ भी नहीं जाना जा रहा था। चारों ओर लगातार '(काटकर) टुकड़े-टुकड़े कर दो', 'विदीर्ण कर दो' के शब्द ही सुनायी पड़ रहे थे॥ २६-२९॥
ततो विशसनो रौद्रो दैत्यानां दैवतैः सह।<br>जातो रुधिरनिष्यन्दो रजःसंयमनात्मकः॥ ३०<br><br>शान्ते रजसि देवाद्यास्तद् दानवबलं महत्।<br>अभिद्रवन्ति सहिताः समं स्कन्देन धीमता॥ ३१<br><br>निजघ्नुर्दानवान् देवाः कुमारभुजपालिताः।<br>देवान् निजघ्नुर्दैत्याश्च मयगुप्ताः प्रहारिणः॥ ३२<br><br>ततोऽमृतरसास्वादाद् विना भूताः सुरोत्तमाः।<br>निर्जिताः समरे दैत्यैः समं स्कन्देन नारद॥ ३३उसके बाद देवोंके साथ दैत्योंकी भयङ्कर मार-काटसे उत्पन्न रक्तप्रवाहकी धारा बह चली, जो धूलको शान्त करनेवाली हो गयी—रक्त और धूल मिलकर कीच बन गयी। धूलके शान्त हो जानेपर देवता आदि बुद्धिमान् कार्तिकेयके साथ बड़े दानव-दलपर टूट पड़े। कुमार कार्तिकेयके बाहुबलसे रक्षित देवताओंने दैत्योंका हनन किया और मयके द्वारा रक्षित दैत्योंने प्रहार करते हुए देवताओंको मारा। किंतु नारदजी! उसके बाद अमृतरसका आस्वाद न लेने—अमृत न पीनेके कारण कार्तिकेयके सहित श्रेष्ठ देवता युद्धमें दैत्योंसे पराजित हो गये॥ ३०-३३॥
विनिर्जितान् सुरान् दृष्ट्वा वैनतेयध्वजोऽरिहा।<br>शार्ङ्गमानम्य बाणौघैर्निजघान ततस्ततः॥ ३४<br><br>ते विष्णुना हन्यमानाः पतत्रिभिरयोमुखैः।<br>दैतेयाः शरणं जग्मुः कालनेमिं महासुरम्॥ ३५<br><br>तेभ्यः स चाभयं दत्त्वा ज्ञात्वाऽजेयं च माधवम्।<br>विवृद्धिमगमद् ब्रह्मन् यथा व्याधिरुपेक्षितः॥ ३६<br><br>यं यं करेण स्पृशति देवं यक्षं सकिन्नरम्।<br>तं तमादाय चिक्षेप विस्तृते वदने बली॥ ३७देवताओंको पराजित हुआ देखकर शत्रुओंका दमन करनेवाले गरुडध्वज विष्णु शार्ङ्गधनुषको चढ़ाकर चारों ओर बाणोंकी वर्षा करने लगे। श्रीविष्णुद्वारा लोहेके मुँहवाले बाणोंसे मारे जा रहे दैत्य कालनेमि नामके महान् असुरकी शरणमें गये। ब्रह्मन्! उन्हें (दैत्योंको) अभय दान देकर और माधव (विष्णु)-को अजेय जानकर भी (वह) उपेक्षित व्याधिके सदृश (घमण्डमें) बढ़ने लगा। बलवान् वह कालनेमि जिस देवता, यक्ष या किन्नरको हाथसे छू (पकड़) लेता था उसे लेकर अपने फैले मुँहमें झोंक देता था॥ ३४-३७॥
संरम्भाद् दानवेन्द्रो विमृदति दितिजैः<br>    संयुतो    देवसैन्यं<br>सेन्द्रं सार्कं सचन्द्रं करचरणनखै-<br>    रस्त्रहीनोऽपि    वेगात्।<br>चक्रैर्वैश्वानराभैस्तववनिगगनयो-<br>    स्तिर्यगूर्ध्वं    समन्तात्<br>प्राप्तेऽन्ते कालवह्नेर्जगदखिलमिदं<br>    रूपमासीद्    दिधक्षोः॥ ३८वह दैत्येन्द्र कालनेमि बिना अस्त्रका था; फिर भी दानवोंके साथ मिलकर क्रोध करके हाथ, पैर और नखके प्रहारसे ही इन्द्र, सूर्य और चन्द्रमाके साथ देवसेनाको तेजीसे मारने लगा। वह आगके समान चक्रोंसे आकाश एवं पृथ्वीपर नीचे-ऊपर चारों ओर वार करने लगा। उस समय उसका रूप प्रलय-कालमें समस्त जगत्को दग्ध करनेवाली आग (प्रलयाग्नि)-के समान था।

| अध्याय ७३ ] | बलि, मय-प्रभृति दैत्योंका देवताओंके साथ युद्ध और कालनेमिका वध | ३६५ |
| :--- | :--- |
| तं दृष्ट्वा वर्द्धमानं रिपुमतिबलिनं देवगन्धर्वमुख्याः<br>सिद्धाः साध्याश्विमुख्या भयतरलदृशः प्राद्रवन् दिक्षु सर्वे।<br>पोप्लूयन्तश्च दैत्या हरिममरगणैरर्चितं चारुमौलिं<br>नानाशास्त्रास्त्रपातैर्विगलितयशसं चक्रुरुत्सिक्तदर्पाः ॥ ३९<br>तानित्थं प्रेक्ष्य दैत्यान् मयबलिपुरगान् कालनेमिप्रधानान्<br>बाणैराकृष्य शार्ङ्गं त्वनवरतमुरोभेदिभिर्वज्रकल्पैः ।<br>कोपादारक्तदृष्टिः सरथगजहयान् दृष्टिनिर्धूतवीर्यान्<br>नाराचाख्यैः सुपुङ्खैर्जलद इव गिरीन् छादयामास विष्णुः ॥ ४०<br>तैर्बाणैश्छाद्यमाना हरिकरनुदितैः कालदण्डप्रकाशै-<br>र्नाराचैरर्धचन्द्रैर्बलिमयपुरगा भीतभीतास्त्वरन्तः ।<br>प्रारम्भे दानवेन्द्रं शतवदनमथो प्रेषयन् कालनेमिं<br>स प्रायाद् देवसैन्यप्रभुममितबलं केशवं लोकनाथम् ॥ ४१ | उस बलिष्ठ शत्रुको बढ़ते देखकर देवता, गन्धर्व, सिद्ध, साध्य, अश्विनीकुमार आदि भयसे इधर-उधर (देखते हुए घबड़ाकर) चारों ओर भागने लगे। उछलते-कूदते हुए दैत्य अत्यन्त घमण्डके साथ देवोंसे पूजित सुन्दर मुकुटवाले विष्णुभगवान्के सामने जाकर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंके आघातसे उनके (अजेयत्ववाले) यशको समाप्त करने लगे—विष्णुकी पराजय मानने लगे। इस प्रकार प्रहार कर रहे मय, बलि एवं कालनेमि आदि दैत्योंको देखकर विष्णुके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। फिर तो उन्होंने अपनी दृष्टिसे ही रथ, हाथी और घोड़ोंको शक्ति और पराक्रमसे रहित कर दिया तथा उसी तरह सुन्दर पंखोंवाले लोहेके बने अर्द्धचन्द्रके समान 'नाराच' बाणोंसे पर्वतको ढक दिया, जैसे मेघ पर्वतको ढक देते हैं। विष्णुके हाथोंसे छोड़े गये कालदण्डके समान अर्धचन्द्राकार उन लोहेके बने 'नाराच' बाणोंसे ढके हुए बलि एवं मय आदि दैत्योंने डरकर तुरंत पहले दानवेन्द्र शतमुख कालनेमिको प्रेषित किया। वह अति बलवान् देव सेनापति लोकनाथ केशवके सामने उपस्थित हुआ॥ ३८-४१॥ |
| तं दृष्ट्वा शतशीर्षमुद्यतगदं शैलेन्द्रशृङ्गाकृतिं<br>विष्णुः शार्ङ्गमपास्य सत्वरमथो जग्राह चक्रं करे।<br>सोऽप्येनं प्रसमीक्ष्य दैत्यविटपप्रच्छेदनं मानिनं<br>प्रोवाचाथ विहस्य तं च सुचिरं मेघस्वनो दानवः ॥ ४२ | गदा उठाये हुए सौ सिरवाले पर्वतशृंगके समान कालनेमिको देखकर विष्णुने (अपने) शार्ङ्गधनुषको छोड़कर हाथमें जल्दीसे चक्रको ले लिया। इनको देखकर बहुत देरतक जोरसे हँसते हुए मेघके समान बोलनेवाले उस कालनेमि दानवने दैत्यरूपी वृक्षोंके |
| अयं स दनुपुत्रसैन्यवित्रासकृद्रिपुः<br>परमकोपितः स मधोर्विघातकृत्।<br>हिरण्यनयनान्तकः कुसुमपूजारतिः<br>क्व याति मम दृष्टिगोचरे निपतितः खलः ॥ ४३ | काटनेवाले सुख-दुःखकी परवाह न करनेवाले मनस्वी हरिसे कहा—यही दानव-सेनाको डरानेवाला शत्रु, अत्यन्त क्रोधी, मधुको मारनेवाला, हिरण्याक्षका वध करनेवाला और फूलोंसे की गयी पूजासे प्रसन्न होनेवाला है। यह खल मेरी आँखोंके सामने आकर अब कहाँ जा सकता |
| यद्येष संप्रति ममाहवमभ्युपैति<br>नूनं न याति निलयं निजम्बुजाक्षः।<br>मन्मुष्टिपिष्टशिथिलाङ्गमुपात्तभस्म<br>संद्रक्ष्यते सुरजनो भयकातराक्षः ॥ ४४ | है। यह कमलनयन यदि इस समय मेरे साथ युद्ध करे तो अपने घर नहीं जा सकेगा और तब देवतालोग मेरी मुट्ठीमें पिसनेसे शिथिल अङ्गोंवाले इस (विष्णु)-को भयसे कातर नेत्रोंसे धूलिधूसरित हुआ देखेंगे। |

३६६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७४
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इत्येवमुक्त्वा मधुसूदनं वै<br>  स कालनेमिः स्फुरिताधरोष्ठः।<br>गदां खगेन्द्रोपरि जातकोपो<br>  मुमोच शैले कुलिशं यथेन्द्रः॥ ४५<br>तामापतन्तीं प्रसमीक्ष्य विष्णु-<br>  र्घोरा गदां दानवबाहुमुक्ताम्।<br>चक्रेण चिच्छेद सुदुर्गतस्य<br>  मनोरथं पूर्वकृतेव कर्म॥ ४६मधुसूदन भगवान् विष्णुसे ऐसा कहकर क्रोधसे अधरोष्ठको फड़काते हुए कालनेमिने, गरुड़पर अपनी गदा इस प्रकार फेंकी जैसे इन्द्र पर्वतपर वज्र फेंकते हैं। भगवान् विष्णुने दानवके हाथसे छूटी हुई उस भयदायिनी गदाको आते देखकर चक्रसे उसे ऐसे नष्ट कर दिया जैसे पूर्वकृत कर्म भाग्यहीन मनुष्यके मनोरथको नष्ट कर देता है॥ ४२—४६॥
गदां छित्त्वा दानवाभ्याशमेत्य<br>  भुजौ पीनौ सम्प्रचिच्छेद वेगात्।<br>भुजाभ्यां कृत्ताभ्यां दग्धशैलप्रकाशः<br>  संदृश्येताप्यपरः कालनेमिः॥ ४७<br>ततोऽस्य माधवः कोपाच्छिरश्चक्रेण भूतले।<br>छित्त्वा निपातयामास पक्वं तालफलं यथा॥ ४८<br>तथा विबाहुर्विशिरा मुण्डतालो यथा वने।<br>तस्थौ मेरुरिवाकम्प्यः कबन्धः क्ष्माधरेश्वरः॥ ४९<br>तं वैनतेयोऽप्युरसा खगोत्तमो<br>  निपातयामास मुने धरण्याम्।<br>यथाऽम्बराद् बाहुशिरः प्रनष्ट-<br>  बलं महेन्द्रः कुलिशेन भूम्याम्॥ ५०<br>तस्मिन् हते दानवसैन्यपाले<br>  सम्पीड्यमानास्त्रिदशैस्तु दैत्याः।<br>विमुक्तशस्त्रात्तकचर्मवस्त्राः<br>  सम्प्राद्रवन् बाणमृतेऽसुरेन्द्राः॥ ५१गदाको काटकर विष्णुभगवान् दानवके निकट चले गये और उन्होंने शीघ्रतासे उसकी मोटी-मोटी बाहुओंको काट डाला। भुजाओंके कट जानेपर कालनेमि दूसरे दग्ध पर्वतके समान दिखलायी पड़ने लगा। उसके बाद माधव (लक्ष्मीपति)-ने क्रोधपूर्वक चक्रसे उसके सिरको काटकर पके हुए ताड़के फलके समान धरतीपर गिरा दिया। वनमें ढूँठे तरकुलके समान बाहुओं एवं सिरसे हीन कबन्ध अचल पर्वतराज मेरुके समान खड़ा रहा। मुने! जैसे महेन्द्रने वज्रसे बाँह और सिररहित बलको पृथिवीपर गिराया था, उसी प्रकार पक्षिश्रेष्ठ गरुड़ने अपनी छातीसे धक्का देकर उस (कबन्ध)-को पृथ्वीपर गिरा दिया। उस दानव-सेनापति (कालनेमि)-के मारे जानेपर बाणासुरके सिवा देवोंसे अत्यन्त पीड़ित सभी दैत्य शस्त्र, पट्टा, ढाल और वस्त्रको छोड़कर भाग गये॥ ४७—५१॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७३॥


चौहत्तरवाँ अध्याय

बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना, बलिको प्रह्लादका उपदेश

पुलस्त्य उवाचपुलस्त्यजी बोले—
संनिवृत्ते ततो बाणे दानवाः सत्वरं पुनः।<br>निवृत्ता देवतानां च सशस्त्रा युद्धलालसाः॥ १—उसके बाद बाणासुरके लौट आनेपर फिर दानव तुरंत शस्त्र लेकर देवताओंसे युद्ध करनेकी इच्छासे लौट पड़े।
विष्णुरप्यमितौजस्तं ज्ञात्वाऽजेयं बलेः सुतम्।<br>प्राह्यामन्त्र्य सुरान् सर्वान् युध्यध्वं विगतज्वराः॥ २अत्यधिक तेजस्वी विष्णुने बलिके पुत्र बाणको अजेय जान करके देवताओंको बुलाकर कहा—आपलोग निर्भय होकर (सतर्कतासे)

अध्याय ७४] बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना ३६७


| विष्णुनाऽथ समादिष्टा देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>युयुधुर्दानवैः सार्धं विष्णुस्त्वन्तरधीयत॥ ३<br><br>माधवं गतमाज्ञाय शुक्नो बलिमुवाच ह।<br>गोविन्देन सुरास्त्यक्तास्त्वं जयस्वाधुना बले॥ ४<br>स पुरोहितवाक्येन प्रीतो याते जनार्दने।<br>गदामादाय तेजस्वी देवसैन्यमभिद्रुतः॥ ५<br>बाणो बाहुसहस्रेण गृह्य प्रहरणान्यथ।<br>देवसैन्यमभिद्रुत्य निजघान सहस्रशः॥ ६<br>मयोऽपि मायामास्थाय तैस्तै रूपान्तरैर्मुने।<br>योधयामास बलवान् सुराणां च वरूथिनीम्॥ ७<br>विद्युज्जिह्वः पारिभद्रो वृषपर्वा शतेक्षणः।<br>विपाको विक्षरः सैन्यं तेऽपि देवानुपाद्रवन्॥ ८<br>ते हन्यमाना दितिजैर्देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>गते जनार्दने देवे प्रायशो विमुखाऽभवन्॥ ९<br>तान् प्रभग्नान् सुरगणान् बलिबाणपुरोगमाः।<br>पृष्ठतश्चाद्रवन् सर्वे त्रैलोक्यविजिगीषवः॥ १०<br>सम्बाध्यमाना दैतेयैर्देवाः सेन्द्रा भयातुराः।<br>त्रिविष्टपं परित्यज्य ब्रह्मलोकमुपागताः॥ ११<br>ब्रह्मलोकं गतेष्वित्थं सेन्द्रेष्वपि सुरेषु वै।<br>स्वर्गभोक्ता बलिर्जातः सपुत्रभ्रातृबान्धवः॥ १२<br>शक्रोऽभूद् भगवान् ब्रह्मन् बलिबाणो यमोऽभवत्।<br>वरुणोऽभून्मयः सोमो राहुर्ह्लादो हुताशनः॥ १३<br><br>स्वर्भानुरभवत् सूर्यः शुक्रश्चासीद् बृहस्पतिः।<br>येऽन्येऽप्यधिकृता देवास्तेषु जाताः सुरारयः॥ १४<br><br>पञ्चमस्य कलेरादौ द्वापरान्ते सुदारुणः।<br>देवासुरोऽभूत् संग्रामो यत्र शक्रोऽप्यभूद् बलिः॥ १५<br><br>पातालाः सप्त तस्यासन् वशे लोकत्रयं तथा।<br>भूर्भुवःस्वरिति ख्यातं दशलोकाधिपो बलिः॥ १६<br>स्वर्गे स्वयं निवसति भुञ्जन् भोगान् सुदुर्लभान्।<br>तत्रोपासन्त गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः॥ १७ | युद्ध कीजिये। विष्णुसे आदेश पाकर इन्द्र आदि देवता दानवोंके साथ युद्ध करने लगे। किंतु विष्णु अदृश्य हो गये। विष्णुको वहाँसे चला गया जानकर शुक्रने बलिसे कहा—बले! विष्णुने देवताओंको अकेले युद्धके लिये छोड़ दिया है। अब तुम जय प्राप्त करो॥ १-४॥<br><br>दुष्टजनोंको ताड़ना देनेवाले भगवान् विष्णुके चले जानेपर तेजस्वी बलि पुरोहित (शुक्राचार्य)-के वाक्यसे हर्षित हो गदा लेकर देवसेनाकी ओर दौड़ा। बाणासुरने हजार हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर देवसेनापर चढ़ाई कर दी और हजारोंका वध कर दिया। मुने! बलवान् मय दानव भी मायाके द्वारा विभिन्न रूपोंको धारणकर अमरोंकी सेनाके साथ युद्ध करने लगा। विद्युज्जिह्व, पारिभद्र, वृषपर्वा, शतेक्षण, विपाक तथा विक्षर भी देवताओंकी सेनापर टूट पड़े॥ ५-८॥<br><br>भगवान् विष्णुके चले जानेपर इन्द्र आदि देवता दैत्योंके द्वारा मारे जानेपर युद्धसे पराङ्मुख हो गये। तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छावाले बलि एवं बाण आदि सभी (दैत्य) भागते हुए देवताओंके पीछे दौड़ पड़े। दैत्योंके द्वारा पीड़ित इन्द्र आदि देवता डरकर और स्वर्गको छोड़कर ब्रह्मलोक चले गये। फिर तो इन्द्रके साथ ही देवताओंके ब्रह्मलोक चले जानेपर बलि अपने पुत्र, भाई और बान्धवोंके साथ स्वर्गका भोक्ता हो गया॥ ९-१२॥<br><br>ब्रह्मन्! भाग्यशाली बलि इन्द्र हुआ और बाण यम बना। मय दानव वरुण बन गया, राहु चन्द्र बना और ह्लाद अग्नि बन गया। केतु सूर्य बना और शुक्राचार्य बृहस्पति बन गये। इसी प्रकार अन्य विभिन्न अधिकार-प्राप्त देवताओंके पदोंपर असुरोंने अधिकार जमा लिया। पाँचवें कलियुगके प्रारम्भ और द्वापरयुगके आखिरी भागमें देवताओं और दैत्योंका भयङ्कर युद्ध हुआ, जब कि बलि इन्द्र बन गया। सातों पाताल और भूः, भुवः, स्वः नामके प्रसिद्ध तीनों लोक उसके वशमें हो गये थे। इस प्रकार बलि दस लोकोंका शासक बन गया था॥ १३-१६॥<br><br>इन्द्र बना हुआ बलि अत्यन्त दुर्लभ भोगोंको स्वयं भोगता हुआ स्वर्गमें रहने लगा। वहाँ विश्वावसु आदि |