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सर्वकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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३६६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७४
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इत्येवमुक्त्वा मधुसूदनं वै<br>  स कालनेमिः स्फुरिताधरोष्ठः।<br>गदां खगेन्द्रोपरि जातकोपो<br>  मुमोच शैले कुलिशं यथेन्द्रः॥ ४५<br>तामापतन्तीं प्रसमीक्ष्य विष्णु-<br>  र्घोरा गदां दानवबाहुमुक्ताम्।<br>चक्रेण चिच्छेद सुदुर्गतस्य<br>  मनोरथं पूर्वकृतेव कर्म॥ ४६मधुसूदन भगवान् विष्णुसे ऐसा कहकर क्रोधसे अधरोष्ठको फड़काते हुए कालनेमिने, गरुड़पर अपनी गदा इस प्रकार फेंकी जैसे इन्द्र पर्वतपर वज्र फेंकते हैं। भगवान् विष्णुने दानवके हाथसे छूटी हुई उस भयदायिनी गदाको आते देखकर चक्रसे उसे ऐसे नष्ट कर दिया जैसे पूर्वकृत कर्म भाग्यहीन मनुष्यके मनोरथको नष्ट कर देता है॥ ४२—४६॥
गदां छित्त्वा दानवाभ्याशमेत्य<br>  भुजौ पीनौ सम्प्रचिच्छेद वेगात्।<br>भुजाभ्यां कृत्ताभ्यां दग्धशैलप्रकाशः<br>  संदृश्येताप्यपरः कालनेमिः॥ ४७<br>ततोऽस्य माधवः कोपाच्छिरश्चक्रेण भूतले।<br>छित्त्वा निपातयामास पक्वं तालफलं यथा॥ ४८<br>तथा विबाहुर्विशिरा मुण्डतालो यथा वने।<br>तस्थौ मेरुरिवाकम्प्यः कबन्धः क्ष्माधरेश्वरः॥ ४९<br>तं वैनतेयोऽप्युरसा खगोत्तमो<br>  निपातयामास मुने धरण्याम्।<br>यथाऽम्बराद् बाहुशिरः प्रनष्ट-<br>  बलं महेन्द्रः कुलिशेन भूम्याम्॥ ५०<br>तस्मिन् हते दानवसैन्यपाले<br>  सम्पीड्यमानास्त्रिदशैस्तु दैत्याः।<br>विमुक्तशस्त्रात्तकचर्मवस्त्राः<br>  सम्प्राद्रवन् बाणमृतेऽसुरेन्द्राः॥ ५१गदाको काटकर विष्णुभगवान् दानवके निकट चले गये और उन्होंने शीघ्रतासे उसकी मोटी-मोटी बाहुओंको काट डाला। भुजाओंके कट जानेपर कालनेमि दूसरे दग्ध पर्वतके समान दिखलायी पड़ने लगा। उसके बाद माधव (लक्ष्मीपति)-ने क्रोधपूर्वक चक्रसे उसके सिरको काटकर पके हुए ताड़के फलके समान धरतीपर गिरा दिया। वनमें ढूँठे तरकुलके समान बाहुओं एवं सिरसे हीन कबन्ध अचल पर्वतराज मेरुके समान खड़ा रहा। मुने! जैसे महेन्द्रने वज्रसे बाँह और सिररहित बलको पृथिवीपर गिराया था, उसी प्रकार पक्षिश्रेष्ठ गरुड़ने अपनी छातीसे धक्का देकर उस (कबन्ध)-को पृथ्वीपर गिरा दिया। उस दानव-सेनापति (कालनेमि)-के मारे जानेपर बाणासुरके सिवा देवोंसे अत्यन्त पीड़ित सभी दैत्य शस्त्र, पट्टा, ढाल और वस्त्रको छोड़कर भाग गये॥ ४७—५१॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७३॥


चौहत्तरवाँ अध्याय

बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना, बलिको प्रह्लादका उपदेश

पुलस्त्य उवाचपुलस्त्यजी बोले—
संनिवृत्ते ततो बाणे दानवाः सत्वरं पुनः।<br>निवृत्ता देवतानां च सशस्त्रा युद्धलालसाः॥ १—उसके बाद बाणासुरके लौट आनेपर फिर दानव तुरंत शस्त्र लेकर देवताओंसे युद्ध करनेकी इच्छासे लौट पड़े।
विष्णुरप्यमितौजस्तं ज्ञात्वाऽजेयं बलेः सुतम्।<br>प्राह्यामन्त्र्य सुरान् सर्वान् युध्यध्वं विगतज्वराः॥ २अत्यधिक तेजस्वी विष्णुने बलिके पुत्र बाणको अजेय जान करके देवताओंको बुलाकर कहा—आपलोग निर्भय होकर (सतर्कतासे)