वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४६- स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन-अर्चनका माहात्म्य
| १८६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नाभिस्थाने यदुदकं ब्रह्मणो निर्मलं महत्।<br>महत्सरस्तेन पूर्णं विमलेन वराम्भसा॥ ३७ | गर्भके जल हैं। ब्रह्माके नाभि-स्थानमें जो विशाल निर्मल जल राशि है, उस स्वच्छ श्रेष्ठ जलसे महान् सरोवर भरा-पूरा है॥ ३३—३७॥ |
| तस्मिन् मध्ये स्थाणुरूपी वटवृक्षो महामनाः।<br>तस्माद् विनिर्गता वर्णा ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः॥ ३८<br><br>शूद्राश्च तस्मादुत्पन्नाः शुश्रूषार्थं द्विजन्मनाम्।<br>ततश्चिन्तयतः सृष्टिं ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।<br>मनसा मानसा जाताः सनकाद्या महर्षयः॥ ३९<br><br>पुनश्चिन्तयतस्तस्य प्रजाकामस्य धीमतः।<br>उत्पन्ना ऋषयः सप्त ते प्रजापतयोऽभवन्॥ ४०<br><br>पुनश्चिन्तयतस्तस्य रजसा मोहितस्य च।<br>बालखिल्याः समुत्पन्नास्तपःस्वाध्यायतत्पराः॥ ४१ | उस सरोवरके मध्यमें स्थाणुके आकारका महान् विशाल एक वटवृक्ष है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीनों वर्ण उससे निकले और द्विजोंकी शुश्रूषा करनेके लिये उसीसे शूद्रोंकी भी उत्पत्ति हुई। (इस प्रकार चारों वर्णोंकी सृष्टि सरोवरके मध्यमें स्थाणुरूपसे स्थित वटवृक्षसे हुई।) उसके बाद सृष्टिकी चिन्ता करते हुए अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके मनसे सनकादि महर्षियोंकी उत्पत्ति हुई। फिर प्रजाकी इच्छासे चिन्तन कर रहे मतिमान् ब्रह्मासे सात ऋषि उत्पन्न हुए। वे प्रजापति हुए। रजोगुणसे मोहित होकर ब्रह्माने जब पुनः चिन्तन किया, तब तप एवं स्वाध्यायमें परायण बालखिल्य ऋषियोंकी उत्पत्ति हुई॥ ३८—४१॥ |
| ते सदा स्नाननिरता देवार्चनपरायणाः।<br>उपवासैर्व्रतैस्तीव्रैः शोषयन्ति कलेवरम्॥ ४२<br><br>वानप्रस्थेन विधिना अग्निहोत्रसमन्विताः।<br>तपसा परमेणेह शोषयन्ति कलेवरम्॥ ४३<br><br>दिव्यं वर्षसहस्रं ते कृशा धमनिसंतताः।<br>आराधयन्ति देवेशं न च तुष्यति शंकरः॥ ४४<br><br>ततः कालेन महता उमया सह शंकरः।<br>आकाशमार्गेण तदा दृष्ट्वा देवी सुदुःखिता॥ ४५<br><br>प्रसाद्य देवदेवेशं शंकरं प्राह सुव्रता।<br>क्लिश्यन्ते ते मुनिगणा देवदारुवनाश्रयाः॥ ४६<br><br>तेषां क्लेशक्षयं देव विधेहि कुरु मे दयाम्।<br>किं वेदधर्मनिष्ठानामनन्तं देव दुष्कृतम्॥ ४७<br><br>नाद्यापि येन शुद्ध्यन्ति शुष्कस्राव्यस्थिशोषिताः।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देव्याः पिनाकी पतितान्धकः।<br>प्रोवाच प्रहसन् मूर्ध्नि चारुचन्द्रांशुशोभितः॥ ४८ | वे सर्वदा स्नान (शुद्धि) करनेमें निरत तथा देवताओंकी पूजा करनेमें विशेषरूपसे लगे रहते तथा उपवासों एवं तीव्र व्रतोंसे अपने शरीरको सुखाये जा रहे थे। अग्निहोत्रसे युक्त होकर वानप्रस्थकी विधिसे वे उत्कृष्ट तपस्या करते और अपने शरीर सुखाते जाते थे। वे लोग अत्यन्त दुर्बल एवं कंकाल-काय होकर सहस्र दिव्य वर्षोंतक देवेशकी उपासना करते रहे; परंतु भगवान् शंकर प्रसन्न न हुए। उसके बहुत दिनोंके बाद उमाके साथ भगवान् शंकर आकाश-मार्गसे भ्रमण कर रहे थे। धार्मिक कार्योंको करनेवाली उमा (बालखिल्योंकी) इस प्रकारकी दशा (कंकालमात्र) देखकर दुःखी हो गयीं और दुःखी होकर देवदेवेश शंकरको प्रसन्नकर कहने लगीं—देव! देवदारु-वनमें रहनेवाले वे मुनिगण क्लेश उठा रहे हैं। देव! मेरे ऊपर दया करें। आप उनके क्लेशका विनाश करें। देव! वैदिक धर्ममें निष्ठा रखनेवाले इन (तपस्वियों)-के कौन ऐसा अनन्त दुष्कृत है, जिससे ये कङ्गालमात्र होनेपर भी अबतक शुद्ध नहीं हुए? अन्धकको मार गिरानेवाले, चन्द्रमाकी मनोहर किरणोंसे सुशोभित सिरवाले पिनाकधारी शंकरजी उमाकी बातको सुनकर हँसते हुए बोले—॥ ४२—४८॥ |
| श्रीमहादेव उवाच<br><br>न वेत्सि देवि तत्त्वेन धर्मस्य गहना गतिः।<br>नैते धर्मं विजानन्ति न च कामविवर्जिताः॥ ४९ | श्रीमहादेवजी बोले— देवि! धर्मकी गति गहन होती है। तुम उसे तत्त्वतः नहीं जानती। ये लोग न तो धर्मज्ञ हैं |
| अध्याय ४३ ] | स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहित्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर | १८७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न च क्रोधेन निर्मुक्ताः केवलं मूढबुद्धयः।<br>एतच्छ्रुत्वाऽब्रवीद् देवी मा मैवं शंसितव्रतान् ॥ ५०<br><br>देव दर्शयात्मानं परं कौतूहलं हि मे।<br>स इत्युक्त उवाचेदं देवीं देवः स्मिताननः ॥ ५१<br><br>तिष्ठ त्वमत्र यास्यामि यत्रैते मुनिपुंगवाः।<br>साधयन्ति तपो घोरं दर्शयिष्यामि चेष्टितम् ॥ ५२ | और न कामशून्य। ये क्रोधसे मुक्त भी नहीं हैं और विचार-रहित हैं। यह सुनकर उमादेवीने कहा—नहीं, व्रत धारण करनेवाले इन लोगोंको ऐसा मत कहिये; (प्रत्युत) देव! आप अपनेको प्रकट करें। निश्चय ही मुझे बड़ा कौतूहल है। उमाके ऐसा कहनेपर शंकरने मुस्कुराकर देवीसे इस प्रकार कहा—अच्छा, तुम यहाँ रुको। ये मुनिश्रेष्ठ जहाँ घोर तपस्याकी साधना कर रहे हैं, वहाँ जाकर मैं इनकी चेष्टा कैसी है, उसे दिखलाता हूँ॥ ४९—५२॥ |
| इत्युक्ता तु ततो देवी शंकरेण महात्मना।<br>गच्छस्वेत्याह मुदिता भर्तारं भुवनेश्वरम् ॥ ५३<br><br>यत्र ते मुनयः सर्वे काष्ठलोष्ठसमाः स्थिताः।<br>अधीयाना महाभागाः कृताग्निसदनक्रियाः ॥ ५४<br><br>तान् विलोक्य ततो देवो नग्नः सर्वाङ्गसुन्दरः।<br>वनमालाकृतापीडो युवा भिक्षाकपालभृत् ॥ ५५<br><br>आश्रमे पर्यटन् भिक्षां मुनीनां दर्शनं प्रति।<br>देहि भिक्षां ततश्चोक्त्वा ह्याश्रमादाश्रमं ययौ ॥ ५६ | जब महात्मा शंकरने देवी उमासे इस प्रकार कहा तब उमादेवी प्रसन्न हो गयीं और भुवनोंके पालन करनेवाले भुवनेश्वर शिवसे बोलीं—अच्छा, जिस स्थानपर लकड़ी और मिट्टीके ढेलेके समान निश्चेष्ट, अग्निहोत्री एवं अध्ययनमें लगे हुए मुनिगण रहते हैं, उस स्थानपर आप जायँ। (फिर उमाद्वारा इस प्रकार प्रेरित किये जानेपर शंकरजी मुनिमण्डलीकी ओर जानेके लिये प्रस्तुत हो गये) फिर शंकरने उस मुनिमण्डलीको देखकर वनमाला धारण कर लिया। तब वे सर्वाङ्गसुन्दर (पर) नग्न-सुडौल देह धारण कर युवाके रूपमें हो गये और भिक्षा-पात्र हाथमें लेकर मुनियोंके सामने भिक्षाके लिये भ्रमण करते हुए 'भिक्षा दो' यह कहते हुए एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें जाने लगे ॥ ५३—५६ ॥ |
| तं विलोक्याश्रमगतं योषितो ब्रह्मवादिनाम्।<br>सकौतुकस्वभावेन तस्य रूपेण मोहिताः ॥ ५७<br><br>प्रोचुः परस्परं नार्य एहि पश्याम भिक्षुकम्।<br>परस्परमिति चोक्त्वा गृह्य मूलफलं बहु ॥ ५८<br><br>गृहाण भिक्षामूचुस्तास्तं देवं मुनियोषितः।<br>स तु भिक्षाकपालं तं प्रसार्य बहु सादरम् ॥ ५९<br><br>देहि देहि शिवं वोऽस्तु भवतीभ्यस्तपोवने।<br>हसमानस्तु देवेशस्तत्र देव्या निरीक्षितः।<br>तस्मै दत्त्वैव तां भिक्षां पप्रच्छुस्तं स्मरातुराः ॥ ६० | एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें घूम रहे उन नग्न युवाको देखकर ब्रह्मवादियोंकी स्त्रियाँ उत्सुकताके साथ स्वभाववश उनके रूपसे मोहित हो गयीं और परस्परमें कहने लगीं—आओ, भिक्षुकको देखा जाय। आपसमें इस प्रकार कहकर बहुत-सा मूल-फल लेकर मुनि-पत्नियोंने उन देवसे कहा—आप भिक्षा ग्रहण करें। उन्होंने भी अत्यन्त आदरसे उस भिक्षापात्रको फैलाकर (सामने दिखाकर) कहा-तपोवनवासिनियो! (भिक्षा) दो, दो! आप सबका कल्याण हो। पार्वतीजी वहाँ हँसते हुए शंकरको देख रही थीं। कामातुर मुनिपत्नियोंने उस नग्न युवाको भिक्षा देकर उनसे पूछा— ॥ ५७–६०॥ |
| नार्य ऊचुः<br><br>कोऽसौ नाम व्रतविधिस्त्वया तापस सेव्यते।<br>यत्र नग्नेन लिङ्गेन वनमालाविभूषितः।<br>भवान् वै तापसो हृद्यो हृद्याः स्मो यदि मन्यसे ॥ ६१ | **मुनिपत्नियोंने पूछा—**तापस! आप किस व्रतके विधानका पालन कर रहे हैं, जिसमें वनमालासे विभूषित हृदयहारी तपस्वीका सुन्दर स्वरूप धारण कर नग्न-मूर्ति बनना पड़ा है? आप हमारे हृदयके आनन्दप्रद तापस हैं, यदि आप मानें तो हम भी आपकी |
१८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४३
इत्युक्तस्तापसीभिस्तु प्रोवाच हसिताननः ।
इदमीदृग् व्रतं किंचिन्न रहस्यं प्रकाश्यते ॥ ६२
शृण्वन्ति बहवो यत्र तत्र व्याख्या न विद्यते ।
अस्य व्रतस्य सुभगा इति मत्वा गमिष्यथ ॥ ६३
एवमुक्तास्तदा तेन ताः प्रत्यूचुस्तदा मुनिम् ।
रहस्ये हि गमिष्यामो मुने नः कौतुकं महत् ॥ ६४
इत्युक्त्वा तास्तदा तं वै जगृहुः पाणिपल्लवैः ।
काचित् कण्ठे सकन्दर्पा बाहुभ्यामपरास्तथा ॥ ६५
जानुभ्यामपरा नार्यः केशेषु ललितापराः ।
अपरास्तु कटीरन्धे अपराः पादयोरपि ॥ ६६
क्षोभं विलोक्य मुनय आश्रमेषु स्वयोषिताम् ।
हन्यतामिति संभाष्य काष्ठपाषाणपाणयः ॥ ६७
पातयन्ति स्म देवस्य लिङ्गमुद्धृत्य भीषणम् ।
पतिते तु ततो लिङ्गे गतोऽन्तर्धानमीश्वरः ॥ ६८
देव्या स भगवान् रुद्रः कैलासं नगमाश्रितः ।
पतिते देवदेवस्य लिङ्गे नष्टे चराचरे ॥ ६९
क्षोभो बभूव सुमहानृषीणां भावितात्मनाम् ।
एवं देवे तदा तत्र वर्तति व्याकुलीकृते ॥ ७०
उवाचैको मुनिवरस्तत्र बुद्धिमतां वरः ।
न वयं विद्मः सद्भावं तापसस्य महात्मनः ॥ ७१
विरिञ्चिं शरणं यामः स हि ज्ञास्यति चेष्टितम् ।
एवमुक्ताः सर्व एव ऋषयो लज्जिता भृशम् ॥ ७२
ब्रह्मणः सदनं जग्मुर्देवैः सह निषेवितम् ।
प्रणिपत्याथ देवेशं लज्जयाऽधोमुखाः स्थिताः ॥ ७३
अथ तान् दुःखितान् दृष्ट्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ।
अहो मुग्धा यदा यूयं क्रोधेन कलुषीकृताः ॥ ७४
न धर्मस्य क्रिया काचिज्ज्ञायते मूढबुद्धयः ।
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं तापसाः क्रूरचेष्टिताः ॥ ७५
मनोऽनुकूल प्रिया हो सकती हैं। उन्होंने तपस्विनियोंके
इस प्रकार कहनेपर हँसते हुए कहा - यह व्रत ऐसा
है कि इसका कुछ भी रहस्य प्रकट नहीं किया जा
सकता। सौभाग्यशालिनियो ! जहाँ बहुत-से सुननेवाले
हों वहाँ इस व्रतकी व्याख्या नहीं की जा सकती।
इसलिये यह जानकर आप सभी चली जायँ। उनके
ऐसा कहनेपर उन्होंने मुनिसे कहा - मुने ! हम सब
(यह जाननेके लिये) एकान्तमें चलेंगी; (क्योंकि) हमें
महान् कौतूहल हो रहा है ॥ ६१-६४ ॥
यह कहकर उन सभीने उनको अपने कोमल
हाथोंसे पकड़ लिया। कुछ कामसे आतुर होकर
कण्ठसे लिपट गयीं और कुछने उन्हें भुजाओंमें बाँध
लिया; कुछ स्त्रियोंने उन्हें घुटनोंसे पकड़ लिया; कुछ
सुन्दरी स्त्रियाँ उनके केश छूने लगीं; और कुछ उनकी
कमरसे लिपट गयीं एवं कुछने उनके पैरोंको पकड़
लिया। मुनियोंने आश्रममें अपनी स्त्रियोंकी अधीरता
देख 'मारो-मारो' - इस प्रकार कहते हुए हाथोंमें डंडा
और पत्थर लेकर शिवके लिङ्गको ही उखाड़कर
फेंक दिया। लिङ्गके गिरा दिये जानेपर भगवान् शंकर
अन्तर्हित हो गये ॥ ६५-६८ ॥
वे भगवान् रुद्र उमादेवीके साथ कैलास पर्वतपर
चले गये। देवदेव शंकरके लिङ्गके गिरनेपर प्रायः
समस्त चर-अचर जगत् नष्ट हो गया। इससे आत्मनिष्ठ
महर्षियोंको व्याकुलता हुई। इसी प्रकार देवके (भी)
व्याकुल हो जानेपर एक अत्यन्त बुद्धिमान् श्रेष्ठ मुनिने
कहा - हम उन महात्मा तापसके सद्भाव (सदाशय) -
को नहीं जानते। हम ब्रह्माकी शरणमें चलें। वे ही
उनकी चेष्टा (रहस्य) समझ सकेंगे। ऐसा कहनेपर सभी
ऋषि अत्यन्त लज्जित हो गये ॥ ६९-७२ ॥
फिर, वे लोग देवताओंसे उपासित ब्रह्माके
लोकमें गये। वहाँ देवेश (ब्रह्मा) - को प्रणाम कर
लज्जासे मुख नीचा कर खड़े हो गये। उसके बाद
ब्रह्माने उन्हें दुःखी देखकर यह वचन कहा - अहो,
क्रोध करनेसे तुम सबका मन कलुषित हो गया है,
इसलिये मूढ़ हो गये हो। मूढ बुद्धिवालो ! तुम सब
धर्मकी कोई वास्तविक क्रिया नहीं जानते। अप्रिय कर्म
करनेवाले तापसो ! धर्मके सारभूत रहस्यको सुनो, जिसे
अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८९
विदित्वा यद् बुधः क्षिप्रं धर्मस्य फलमाप्नुयात्।
योऽसावात्मनि देहेऽस्मिन् विभुर्नित्यो व्यवस्थितः ॥ ७६
सोऽनादिः स महास्थाणुः पृथक्त्वे परिसूचितः।
मणिर्यथोपधानेन धत्ते वर्णोज्ज्वलोऽपि वै ॥ ७७
तन्मयो भवते तद्वदात्माऽपि मनसा कृतः।
मनसो भेदमाश्रित्य कर्मभिश्चोपचीयते ॥ ७८
ततः कर्मवशाद् भुङ्क्ते संभोगान् स्वर्गनारकान्।
तन्मनः शोधयेद् धीमाञ्ज्ञानयोगाद्युपक्रमैः ॥ ७९
तस्मिञ्छुद्धे ह्यन्तरात्मा स्वयमेव निराकुलः।
न शरीरस्य संक्लेशैरपि निर्दहनात्मकैः ॥ ८०
शुद्धिमाप्नोति पुरुषः संशुद्धं यस्य नो मनः।
क्रिया हि नियमार्थाय पातकेभ्यः प्रकीर्तिताः ॥ ८१
यस्मादत्याविलं देहं न शीघ्रं शुद्ध्यते किल।
तेन लोकेषु मार्गोऽयं सत्पथस्य प्रवर्तितः ॥ ८२
वर्णाश्रमविभागोऽयं लोकाध्यक्षेण केनचित्।
निर्मितो मोहमाहात्म्यं चिह्नं चोत्तमभागिनाम् ॥ ८३
भवन्तः क्रोधकामाभ्यामभिभूताश्रमे स्थिताः।
ज्ञानिनामाश्रमो वेश्म अनाश्रममयोगिनाम् ॥ ८४
क्व च न्यस्तसमस्तेच्छा क्व च नारीमयो भ्रमः।
क्व क्रोधमीदृशं घोरं येनात्मानं न जानथ ॥ ८५
यत्क्रोधनो यजति यच्च ददाति नित्यं
यद् वा तपस्तपति यच्च जुहोति तस्य।
प्राप्नोति नैव किमपीह फलं हि लोके
मोघं फलं भवति तस्य हि क्रोधनस्य ॥ ८६
जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शीघ्र ही कर्मका फल प्राप्त
करता है। हम सबके इस शरीरमें रहनेवाला जो नित्य
विभु (परमेश्वर) है, वह आदि-अन्त-रहित एवं महा
स्थाणु है। (विचार करनेपर) वह (देही) इस शरीरसे
अलग प्रतीत होता है। जिस प्रकार उज्ज्वल
वर्णकी मणि भी आश्रयके प्रभावसे उसी रूपकी
भासती है, उसी प्रकार आत्मा भी मनसे संयुक्त
होकर मनके भेदका आश्रय कर कर्मोंसे ढक जाता
है। उसके बाद कर्मवश वह स्वर्गीय तथा नारकीय
भोगोंको भोगता रहता है। बुद्धिमान् व्यक्तिको
चाहिये कि ज्ञान तथा योग आदि उपायोंद्वारा मनका
शोधन करे ॥ ७३-७९ ॥
मनके शुद्ध होनेपर अन्तरात्मा अपने-आप निर्मल
हो जाता है। जिसका मन शुद्ध नहीं है, ऐसा पुरुष
शरीरको सुखानेवाले क्लेशोंके द्वारा शुद्ध नहीं होता।
पापोंसे बचनेके लिये ही (धर्म्य) क्रियाओंका विधान
हुआ है, अतः अत्यन्त पापपूर्ण शरीर (स्वतः) शीघ्र
शुद्ध नहीं होता। इसीलिये लोकमें सत्पथ-शास्त्रविहित
क्रियाओंका यह मार्ग प्रवर्तित हुआ है। किसी दिव्यद्रष्टा
लोक-स्वामीने उत्तम भाग्यवालोंके निमित्त मोह-माहात्म्यके
प्रतीकस्वरूप इस वर्णाश्रम-विभागका निर्माण किया
है ॥ ८०-८३ ॥
आपलोग आश्रममें रहते हुए भी क्रोध तथा
कामके वशीभूत हैं। ज्ञानियोंके लिये घर ही आश्रम है
और अयोगियों (अज्ञानियों)-के लिये आश्रम भी
अनाश्रम है। कहाँ समस्त कामनाओंका त्याग और कहाँ
नारीमय यह भ्रम-जाल। (कहाँ तप और) कहाँ तो इस
प्रकारका क्रोध, जिससे तुमलोग अपने आत्मा
(शिव)-को नहीं पहचान पाते। क्रोधी पुरुष लोकमें जो
सदा यज्ञ करता है, जो दान देता है अथवा जो तप या
हवन करता है, उसका कोई फल उसे नहीं मिलता।
उस क्रोधीके सभी फल व्यर्थ होते हैं ॥ ८४-८६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४३ ॥