वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४३
इत्युक्तस्तापसीभिस्तु प्रोवाच हसिताननः ।
इदमीदृग् व्रतं किंचिन्न रहस्यं प्रकाश्यते ॥ ६२
शृण्वन्ति बहवो यत्र तत्र व्याख्या न विद्यते ।
अस्य व्रतस्य सुभगा इति मत्वा गमिष्यथ ॥ ६३
एवमुक्तास्तदा तेन ताः प्रत्यूचुस्तदा मुनिम् ।
रहस्ये हि गमिष्यामो मुने नः कौतुकं महत् ॥ ६४
इत्युक्त्वा तास्तदा तं वै जगृहुः पाणिपल्लवैः ।
काचित् कण्ठे सकन्दर्पा बाहुभ्यामपरास्तथा ॥ ६५
जानुभ्यामपरा नार्यः केशेषु ललितापराः ।
अपरास्तु कटीरन्धे अपराः पादयोरपि ॥ ६६
क्षोभं विलोक्य मुनय आश्रमेषु स्वयोषिताम् ।
हन्यतामिति संभाष्य काष्ठपाषाणपाणयः ॥ ६७
पातयन्ति स्म देवस्य लिङ्गमुद्धृत्य भीषणम् ।
पतिते तु ततो लिङ्गे गतोऽन्तर्धानमीश्वरः ॥ ६८
देव्या स भगवान् रुद्रः कैलासं नगमाश्रितः ।
पतिते देवदेवस्य लिङ्गे नष्टे चराचरे ॥ ६९
क्षोभो बभूव सुमहानृषीणां भावितात्मनाम् ।
एवं देवे तदा तत्र वर्तति व्याकुलीकृते ॥ ७०
उवाचैको मुनिवरस्तत्र बुद्धिमतां वरः ।
न वयं विद्मः सद्भावं तापसस्य महात्मनः ॥ ७१
विरिञ्चिं शरणं यामः स हि ज्ञास्यति चेष्टितम् ।
एवमुक्ताः सर्व एव ऋषयो लज्जिता भृशम् ॥ ७२
ब्रह्मणः सदनं जग्मुर्देवैः सह निषेवितम् ।
प्रणिपत्याथ देवेशं लज्जयाऽधोमुखाः स्थिताः ॥ ७३
अथ तान् दुःखितान् दृष्ट्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ।
अहो मुग्धा यदा यूयं क्रोधेन कलुषीकृताः ॥ ७४
न धर्मस्य क्रिया काचिज्ज्ञायते मूढबुद्धयः ।
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं तापसाः क्रूरचेष्टिताः ॥ ७५
मनोऽनुकूल प्रिया हो सकती हैं। उन्होंने तपस्विनियोंके
इस प्रकार कहनेपर हँसते हुए कहा - यह व्रत ऐसा
है कि इसका कुछ भी रहस्य प्रकट नहीं किया जा
सकता। सौभाग्यशालिनियो ! जहाँ बहुत-से सुननेवाले
हों वहाँ इस व्रतकी व्याख्या नहीं की जा सकती।
इसलिये यह जानकर आप सभी चली जायँ। उनके
ऐसा कहनेपर उन्होंने मुनिसे कहा - मुने ! हम सब
(यह जाननेके लिये) एकान्तमें चलेंगी; (क्योंकि) हमें
महान् कौतूहल हो रहा है ॥ ६१-६४ ॥
यह कहकर उन सभीने उनको अपने कोमल
हाथोंसे पकड़ लिया। कुछ कामसे आतुर होकर
कण्ठसे लिपट गयीं और कुछने उन्हें भुजाओंमें बाँध
लिया; कुछ स्त्रियोंने उन्हें घुटनोंसे पकड़ लिया; कुछ
सुन्दरी स्त्रियाँ उनके केश छूने लगीं; और कुछ उनकी
कमरसे लिपट गयीं एवं कुछने उनके पैरोंको पकड़
लिया। मुनियोंने आश्रममें अपनी स्त्रियोंकी अधीरता
देख 'मारो-मारो' - इस प्रकार कहते हुए हाथोंमें डंडा
और पत्थर लेकर शिवके लिङ्गको ही उखाड़कर
फेंक दिया। लिङ्गके गिरा दिये जानेपर भगवान् शंकर
अन्तर्हित हो गये ॥ ६५-६८ ॥
वे भगवान् रुद्र उमादेवीके साथ कैलास पर्वतपर
चले गये। देवदेव शंकरके लिङ्गके गिरनेपर प्रायः
समस्त चर-अचर जगत् नष्ट हो गया। इससे आत्मनिष्ठ
महर्षियोंको व्याकुलता हुई। इसी प्रकार देवके (भी)
व्याकुल हो जानेपर एक अत्यन्त बुद्धिमान् श्रेष्ठ मुनिने
कहा - हम उन महात्मा तापसके सद्भाव (सदाशय) -
को नहीं जानते। हम ब्रह्माकी शरणमें चलें। वे ही
उनकी चेष्टा (रहस्य) समझ सकेंगे। ऐसा कहनेपर सभी
ऋषि अत्यन्त लज्जित हो गये ॥ ६९-७२ ॥
फिर, वे लोग देवताओंसे उपासित ब्रह्माके
लोकमें गये। वहाँ देवेश (ब्रह्मा) - को प्रणाम कर
लज्जासे मुख नीचा कर खड़े हो गये। उसके बाद
ब्रह्माने उन्हें दुःखी देखकर यह वचन कहा - अहो,
क्रोध करनेसे तुम सबका मन कलुषित हो गया है,
इसलिये मूढ़ हो गये हो। मूढ बुद्धिवालो ! तुम सब
धर्मकी कोई वास्तविक क्रिया नहीं जानते। अप्रिय कर्म
करनेवाले तापसो ! धर्मके सारभूत रहस्यको सुनो, जिसे