सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

२४- वामन-चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना

११२
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय २१
ततो मृगयाव्याक्षेपाद् एकाकी विजनं वनम्।
वैभ्राजं स जगामाथ अथोन्मादनमभ्ययात्॥ ३०
ततस्तु कौतुकाविष्टः सर्वर्तुकुसुमे वने।
अवितृप्तः सुगन्धस्य समन्ताद् व्यचरद् वनम्॥ ३१
स वनान्तं च ददृशे फुल्लकोकनदावृतम्।
कह्लारपद्मकुमुदैः कमलेन्दीवरैरपि॥ ३२
तत्र क्रीडन्ति सततमप्सरोऽमरकन्यकाः।
तासां मध्ये ददर्शाथ कन्यां संवरणोऽधिकाम्॥ ३३
दर्शनादेव स नृपः काममार्गणपीडितः।
जातः सा च समीक्ष्यैव कामबाणातुरोऽभवत्॥ ३४
उभौ तौ पीडितौ मोहं जग्मतुः काममार्गणैः।
राजा चलासनो भूम्यां निपपात तुरंगमात्॥ ३५
तमभ्येत्य महात्मानो गन्धर्वाः कामरूपिणः।
सिषिचुर्वारिणाऽभ्येत्य लब्धसंज्ञोऽभवत् क्षणात्॥ ३६
सा चाप्सरोभिरुत्थात्य नीता पितृकुलं निजम्।
ताभिराश्वासिता चापि मधुरैर्वचनाम्बुभिः॥ ३७
स चाप्यारुह्य तुरगं प्रतिष्ठानं पुरोत्तमम्।
गतस्तु मेरुशिखरं कामचारी यथाऽमरः॥ ३८
यदाप्रभृति सा दृष्टा आर्क्षिणा तपती गिरौ।
तदाप्रभृति नाश्नाति दिवा स्वपिति नो निशि॥ ३९
ततः सर्वविदव्यग्रो विदित्वा वरुणात्मजः।
तपंतीतापितं वीरं पार्थिवं तपसां निधिः॥ ४०
समुत्पत्य महायोगी गगनं रविमण्डलम्।
विवेश देवं तिग्मांशं ददर्श स्यन्दने स्थितम्॥ ४१
तं दृष्ट्वा भास्करं देवं प्रणमद् द्विजसत्तमः।
प्रतिप्रणमितश्चासौ भास्करेणाविशद् रथे॥ ४२
ज्वलज्जटाकलापोऽसौ दिवाकरसमीपगः।
शोभते वारुणिः श्रीमान् द्वितीय इव भास्करः॥ ४३
फिर शिकारके लिये व्याक्षिप्त (व्यग्र) वह अकेला
ही वैभ्राज नामक निर्जन वनमें पहुँचा। उसके बाद वह
उन्मादसे ग्रस्त हो गया। उस वनमें सभी ऋतुओंमें फूल
फूलते रहते थे, सुगन्ध भी रहती थी, फिर भी उससे
संतुप्त न होनेके कारण वह कुतूहलवश वनमें चारों ओर
विचरण करने लगा। वहाँ उसने फूले हुए श्वेत, लाल,
पीले कमल, कुमुद एवं नीले कमलोंसे भरे उस वनको
देखा। अप्सराएँ एवं देवकन्याएँ वहाँ सदा मनोरञ्जन
(मनबहलाव) किया करती थीं। संवरणने उनके बीच
एक अत्यन्त सुन्दरी कन्याको देखा॥ ३०-३३॥
उसे देखते ही वह राजा कामदेवके बाणसे पीड़ित
(कामसे आशित) हो गया और इसी प्रकार वह कन्या
भी उसे देखकर कामबाणसे अधीर (मोहित) हो गयी।
कामके बाणोंसे विवश होकर वे दोनों अचेत-से हो गये।
राजा घोड़ेकी पीठपर रखे हुए आसनसे खिसककर पृथ्वीपर
गिर पड़ा और इच्छाके अनुसार अपना रूप बना लेनेवाले
महात्मा गन्धर्वलोग उसके पास जाकर उसे जलसे
सींचने लगे। (फिर) वह दूसरे ही क्षण चेतनामें आ
गया। तब अप्सराओंने उसे मधुर वचनरूपी जलसे भी
आश्वस्त किया और उसे उठाकर उसके पिताके घर ले
गयीं॥ ३४-३७॥
फिर वह राजा (अपने) घोड़ेपर चढ़कर (अपने)
श्रेष्ठ पैठण नगर इस प्रकार चला गया, जैसे कोई
इच्छाके अनुसार चलनेवाला देवता (सरलतासे) मेरुशृङ्गपर
चला जाय। ऋक्षके पुत्र संवरणने पर्वतपर देवकन्या
तपतीको जबसे अपनी आँखोंसे देखा था, तबसे वह
दिनमें न तो भोजन करता था और न रात्रिमें सोता ही
था। फिर सब कुछ जाननेवाले एवं शान्त तथा तपस्याके
निधिस्वरूप वरुणके पुत्र महायोगी वसिष्ठ उस वीर
राजपुत्रको तपतीके कारण संतापमें पड़े देखकर आकाशमें
ऊपर जाकर (मध्य आकाशमें स्थित) सूर्यमण्डलमें
प्रवेश किया तथा वहाँ रथपर बैठे हुए तेज किरणवाले
सूर्यदेवका उसने दर्शन किया॥ ३८-४१॥
द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठने सूर्यदेवको देखकर प्रणाम
किया। फिर वे सूर्यके द्वारा प्रत्यभिवादन (प्रणामके
बदले प्रणाम) किये जानेपर उनके समीप जाकर रथमें
बैठ गये। सूर्यदेवके पास रथपर बैठे हुए अग्नि-शिखाके
समान चमचमाती जटावाले वरुणके पुत्र वसिष्ठ दूसरे

अध्याय २९ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह ११३
ततः सम्पूजितोऽर्घ्याद्यैर्भास्करेण तपोधनः ।
पृष्टश्चागमने हेतुं प्रत्युवाच दिवाकरम्॥ ४४
समायातोऽस्मि देवेश याचितुं त्वां महाद्युते ।
सुतां संवरणस्यार्थे तस्य त्वं दातुमर्हसि ॥ ४५
ततो वसिष्ठाय दिवाकरेण
निवेदिता सा तपती तनूजा ।
गृहागताय द्विजपुंगवाय
राज्ञोऽर्थतः संवरणस्य देवाः ॥ ४६
सावित्रिमादाय ततो वसिष्ठः
स्वमाश्रमं पुण्यमुपाजगाम ।
सा चापि संस्मृत्य नृपात्मजं तं
कृताञ्जलिर्वारुणिमाह देवी ॥ ४७
तपत्युवाच
ब्रह्मन् मया खेदमुपेत्य यो हि
सहाप्सरोभिः परिचारिकाभिः ।
दृष्टो हारण्येऽमरगर्भतुल्यो
नृपात्मजो लक्षणतोऽभिजाने ॥ ४८
पादौ शुभौ चक्रगदासिसिद्धौ
जङ्घे तथोरू करिहस्ततुल्यौ ।
कटिस्तथा सिंहकटिर्यथैव
क्षामं च मध्यं त्रिबलीनिबद्धम् ॥ ४९
ग्रीवाऽस्य शङ्खाकृतिमादधाति
भुजौ च पीनौ कठिनौ सुदीर्घौ ।
हस्तौ तथा पद्मदलोद्भवाङ्कौ
छत्राकृतिस्तस्य शिरो विभाति ॥ ५०
नीलाश्च केशाः कुटिलाश्च तस्य
कर्णौ समांसौ सुसमा च नासा ।
दीर्घाश्च तस्याङ्गुलयः सुपर्वाः
पद्भ्यां कराभ्यां दशनाश्च शुभ्राः ॥ ५१
समुन्नतः षड्भिरुदारवीर्य-
स्त्रिभिर्गभीरस्त्रिषु च प्रलम्बः ।
रक्तस्तथा पञ्चसु राजपुत्रः
कृष्णश्चतुर्भिस्त्रिभिरानतोऽपि ॥ ५२
द्वाभ्यां च शुक्लः सुरभिश्चतुर्भिः
दृश्यन्ति पद्मानि दशैव चास्य ।
वृतः स भर्ता भगवन् हि पूर्वं
तं राजपुत्रं भुवि संविचिन्त्य ॥ ५३
सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। फिर भगवान् सूर्यने
उन तपस्वी (अतिथि)-का अर्घ्य आदिसे (सत्कार)
किया; उसके बाद उनसे उनके आनेका कारण पूछा। तब
तपोधन वसिष्ठजीने सूर्यसे कहा - अति तेजस्वी देवेश !
मैं राजपुत्र संवरणके लिये आपसे कन्याकी याचना करने
आया हूँ। उसे आप (कृपया) प्रदान करें ॥ ४२-४५॥
[ भगवान् विष्णु कहते हैं-] देवगण ! उसके
बाद सूर्यदेव घरपर आये और ब्राह्मणश्रेष्ठ वसिष्ठको
राजा संवरणके लिये (अपनी) तपती नामकी उस
कन्याको समर्पित कर दिया। फिर सूर्यपुत्रीको साथ लेकर
वसिष्ठ अपने पवित्र आश्रममें आ गये। वह कन्या उस
राजपुत्रका स्मरण कर और हाथ जोड़कर ऋषि वसिष्ठसे
बोली - ॥ ४६-४७॥
तपतीने कहा - वसिष्ठजी ! मैंने वनमें चिन्तामें विभोर
होकर अपनी सेविकाओं तथा अप्सराओंके साथ देवपुत्रके
समान (सौम्य सुन्दर) जिस व्यक्तिको देखा था, उसे मैं
लक्षणोंसे राजकुमार समझ रही हूँ; क्योंकि उसके दोनों
शुभ चरणोंमें चक्र, गदा और खड्गके चिह्न हैं। उसकी
जाँघें तथा ऊरु दोनों हाथीकी सूँड़के समान हैं। उसकी
कटि सिंहकी कटिके समान है तथा त्रिवलीयुक्त - तीन
बलोंवाला उसका उदरभाग बहुत पतला है। उसकी गर्दन
शङ्खके समान है, दोनों भुजाएँ मोटी, कठोर और लम्बी
हैं, दोनों करतल कमल-चिह्नसे अङ्कित हैं तथा उसका
मस्तक छत्रके समान सुशोभित है। उसके बाल काले
तथा घुँघराले हैं, दोनों कर्ण मांसल हैं, नासिका सुडौल है,
उसके हाथों एवं पैरोंकी अँगुलियाँ सुन्दर पर्वयुक्त (पोरवाली)
और लम्बी हैं और उसके दाँत श्वेत हैं ॥ ४८-५१ ॥
[ तपतीने आगे कहा-] उस महापराक्रमी राजपुत्रके
ललाट, कंधे, कपोल (गाल), ग्रीवा, कमर तथा जाँघें -
ये छः अङ्ग ऊँचे (सुडौल) हैं, नाभि, मध्य तथा
हँसुली - ये तीन अङ्ग गम्भीर हैं और उसकी दोनों
भुजाएँ तथा अण्डकोष - ये तीन अङ्ग लम्बे हैं। दोनों
नेत्र, अधर, दोनों हाथ, दोनों पैर तथा नख - ये पाँचों
लाल वर्णवाले हैं, केश, पक्ष्म (बरौनी) और कनीनिका
(आँखकी पुतली) - ये चार अङ्ग कृष्ण हैं, दोनों भौंहें,
आँखके दोनों कोर तथा दोनों कान झुके हुए हैं, दाँत
तथा नेत्र दो अङ्ग श्वेत वर्णके हैं, केश, मुख तथा