वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २९ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह ११३
ततः सम्पूजितोऽर्घ्याद्यैर्भास्करेण तपोधनः ।
पृष्टश्चागमने हेतुं प्रत्युवाच दिवाकरम्॥ ४४
समायातोऽस्मि देवेश याचितुं त्वां महाद्युते ।
सुतां संवरणस्यार्थे तस्य त्वं दातुमर्हसि ॥ ४५
ततो वसिष्ठाय दिवाकरेण
निवेदिता सा तपती तनूजा ।
गृहागताय द्विजपुंगवाय
राज्ञोऽर्थतः संवरणस्य देवाः ॥ ४६
सावित्रिमादाय ततो वसिष्ठः
स्वमाश्रमं पुण्यमुपाजगाम ।
सा चापि संस्मृत्य नृपात्मजं तं
कृताञ्जलिर्वारुणिमाह देवी ॥ ४७
तपत्युवाच
ब्रह्मन् मया खेदमुपेत्य यो हि
सहाप्सरोभिः परिचारिकाभिः ।
दृष्टो हारण्येऽमरगर्भतुल्यो
नृपात्मजो लक्षणतोऽभिजाने ॥ ४८
पादौ शुभौ चक्रगदासिसिद्धौ
जङ्घे तथोरू करिहस्ततुल्यौ ।
कटिस्तथा सिंहकटिर्यथैव
क्षामं च मध्यं त्रिबलीनिबद्धम् ॥ ४९
ग्रीवाऽस्य शङ्खाकृतिमादधाति
भुजौ च पीनौ कठिनौ सुदीर्घौ ।
हस्तौ तथा पद्मदलोद्भवाङ्कौ
छत्राकृतिस्तस्य शिरो विभाति ॥ ५०
नीलाश्च केशाः कुटिलाश्च तस्य
कर्णौ समांसौ सुसमा च नासा ।
दीर्घाश्च तस्याङ्गुलयः सुपर्वाः
पद्भ्यां कराभ्यां दशनाश्च शुभ्राः ॥ ५१
समुन्नतः षड्भिरुदारवीर्य-
स्त्रिभिर्गभीरस्त्रिषु च प्रलम्बः ।
रक्तस्तथा पञ्चसु राजपुत्रः
कृष्णश्चतुर्भिस्त्रिभिरानतोऽपि ॥ ५२
द्वाभ्यां च शुक्लः सुरभिश्चतुर्भिः
दृश्यन्ति पद्मानि दशैव चास्य ।
वृतः स भर्ता भगवन् हि पूर्वं
तं राजपुत्रं भुवि संविचिन्त्य ॥ ५३
सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। फिर भगवान् सूर्यने
उन तपस्वी (अतिथि)-का अर्घ्य आदिसे (सत्कार)
किया; उसके बाद उनसे उनके आनेका कारण पूछा। तब
तपोधन वसिष्ठजीने सूर्यसे कहा - अति तेजस्वी देवेश !
मैं राजपुत्र संवरणके लिये आपसे कन्याकी याचना करने
आया हूँ। उसे आप (कृपया) प्रदान करें ॥ ४२-४५॥
[ भगवान् विष्णु कहते हैं-] देवगण ! उसके
बाद सूर्यदेव घरपर आये और ब्राह्मणश्रेष्ठ वसिष्ठको
राजा संवरणके लिये (अपनी) तपती नामकी उस
कन्याको समर्पित कर दिया। फिर सूर्यपुत्रीको साथ लेकर
वसिष्ठ अपने पवित्र आश्रममें आ गये। वह कन्या उस
राजपुत्रका स्मरण कर और हाथ जोड़कर ऋषि वसिष्ठसे
बोली - ॥ ४६-४७॥
तपतीने कहा - वसिष्ठजी ! मैंने वनमें चिन्तामें विभोर
होकर अपनी सेविकाओं तथा अप्सराओंके साथ देवपुत्रके
समान (सौम्य सुन्दर) जिस व्यक्तिको देखा था, उसे मैं
लक्षणोंसे राजकुमार समझ रही हूँ; क्योंकि उसके दोनों
शुभ चरणोंमें चक्र, गदा और खड्गके चिह्न हैं। उसकी
जाँघें तथा ऊरु दोनों हाथीकी सूँड़के समान हैं। उसकी
कटि सिंहकी कटिके समान है तथा त्रिवलीयुक्त - तीन
बलोंवाला उसका उदरभाग बहुत पतला है। उसकी गर्दन
शङ्खके समान है, दोनों भुजाएँ मोटी, कठोर और लम्बी
हैं, दोनों करतल कमल-चिह्नसे अङ्कित हैं तथा उसका
मस्तक छत्रके समान सुशोभित है। उसके बाल काले
तथा घुँघराले हैं, दोनों कर्ण मांसल हैं, नासिका सुडौल है,
उसके हाथों एवं पैरोंकी अँगुलियाँ सुन्दर पर्वयुक्त (पोरवाली)
और लम्बी हैं और उसके दाँत श्वेत हैं ॥ ४८-५१ ॥
[ तपतीने आगे कहा-] उस महापराक्रमी राजपुत्रके
ललाट, कंधे, कपोल (गाल), ग्रीवा, कमर तथा जाँघें -
ये छः अङ्ग ऊँचे (सुडौल) हैं, नाभि, मध्य तथा
हँसुली - ये तीन अङ्ग गम्भीर हैं और उसकी दोनों
भुजाएँ तथा अण्डकोष - ये तीन अङ्ग लम्बे हैं। दोनों
नेत्र, अधर, दोनों हाथ, दोनों पैर तथा नख - ये पाँचों
लाल वर्णवाले हैं, केश, पक्ष्म (बरौनी) और कनीनिका
(आँखकी पुतली) - ये चार अङ्ग कृष्ण हैं, दोनों भौंहें,
आँखके दोनों कोर तथा दोनों कान झुके हुए हैं, दाँत
तथा नेत्र दो अङ्ग श्वेत वर्णके हैं, केश, मुख तथा