वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१०- अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय
| अध्याय ८ ] | प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय | ४३ |
|---|
| ततः पतत्त्रिभिर्वीरौ सुभृशं नरदानवौ।<br>युद्धे वरास्त्रैर्युध्येतां घोररूपैः परस्परम्॥ ६१<br>ततस्तु दैत्येन वरास्त्रपाणिना<br>चापे नियुक्तं तु पितामहास्त्रम्।<br>माहेश्वरास्त्रं पुरुषोत्तमेन<br>समं समाहत्य निपेततुस्तौ॥ ६२<br>ब्रह्मास्त्रे तु प्रशमिते प्रह्रादः क्रोधमूर्च्छितः।<br>गदां प्रगृह्य तरसा प्रचस्कन्द रथोत्तमात्॥ ६३<br>गदापाणिं समायान्तं दैत्यं नारायणस्तदा।<br>दृष्ट्वाऽथ पृष्ठतश्चक्रे नरं योद्धुमनाः स्वयम्॥ ६४<br>ततो दितीशः सगदः समाद्रवत्<br>सशार्ङ्गपाणिं तपसां निधानम्।<br>ख्यातं पुराणर्षिमुदारविक्रमं<br>नारायणं नारद लोकपालम्॥ ६५ | बाणोंको काट दिया। तब नर और दानव दोनों वीर बाणों तथा भयंकर श्रेष्ठ अस्त्रोंसे परस्पर युद्ध करने लगे। इसके बाद दैत्यने हाथमें ब्रह्मास्त्र लेकर उस धनुषपर नियोजित कर चला दिया एवं उन पुरुषोत्तमने भी माहेश्वरास्त्रका प्रयोग कर दिया। वे दोनों अस्त्र परस्पर एक-दूसरेसे टक्कर खाकर गिर गये। ब्रह्मास्त्रके व्यर्थ होनेपर क्रोधसे मूर्च्छित हुए प्रह्लाद वेगसे गदा लेकर उत्तम रथसे कूद पड़े॥ ६०—६३॥<br>ऋषि नारायणने उस समय दैत्यको हाथमें गदा लिये अपनी ओर आते देखकर स्वयं युद्ध करनेकी इच्छासे नरको पीछे हटा दिया। नारदजी! तब प्रह्लादजी गदा लेकर तपोनिधान, शार्ङ्गधनुषको धारण करनेवाले, प्रसिद्ध पुरातन ऋषि, महापराक्रमशाली, लोकपति नारायणकी ओर दौड़ पड़े॥ ६४-६५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— प्रह्लादने जब हाथमें शार्ङ्गधनुष |
|---|---|
| शार्ङ्गपाणिनमायान्तं दृष्ट्वाऽग्रे दानवेश्वरः।<br>परिभ्राम्य गदां वेगान्मूर्ध्नि साध्यमताडयत्॥ १<br>ताडितस्याथ गदया धर्मपुत्रस्य नारद।<br>नेत्राभ्यामपतद् वारि वह्निवर्सनिभं भुवि॥ २<br>मूर्ध्नि नारायणस्यापि सा गदा दानवार्पिता।<br>जगाम शतधा ब्रह्मञ्शैलशृङ्गे यथाऽशनिः॥ ३<br>ततो निवृत्य दैत्येन्द्रः समास्थाय रथं द्रुतम्।<br>आदाय कार्मुकं वीरस्तूणाद् बाणं समाददे॥ ४<br>आनम्य चापं वेगेन गार्द्धपत्राञ्शिलीमुखान्।<br>मुमोच साध्याय तदा क्रोधान्धकारिताननः॥ ५<br><br>तानापतत एवाशु बाणांश्चन्द्रार्द्धसन्निभान्।<br>चिच्छेद बाणैरपरैर्निर्बिभेद च दानवम्॥ ६ | लिये भगवान् नारायणको सामनेसे आते देखा तो अपनी गदा घुमाकर वेगसे उनके सिरपर प्रहार कर दिया। नारदजी! गदासे प्रताडित होनेपर नारायणके नेत्रोंसे आगके स्फुलिंगके समान आँसू पृथ्वीपर गिरने लगे। ब्रह्मन्! पर्वतकी चोटीपर गिरकर जैसे वज्र टूट जाता है, उसी प्रकार दानवद्वारा नारायणके सिरपर चलायी गयी वह गदा भी सैकड़ों टुकड़े हो गयी। उसके बाद शीघ्रतापूर्वक लौटकर वीर दैत्येन्द्रने रथपर आरूढ हो धनुष लेकर अपनी तरकससे बाण निकाल लिया॥ १—४॥<br>फिर क्रोधान्ध प्रह्लादने शीघ्रतासे धनुषको चढ़ाकर गृध्रके पंखवाले अनेक बाणोंको नारायणकी ओर चलाया। नारायणने भी बड़ी शीघ्रतासे अपनी ओर आ रहे उन अर्धचन्द्र-तुल्य बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला और कुछ दूसरे बाणोंसे प्रह्लादको विद्ध कर दिया। |
| ४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततो नारायणं दैत्यो दैत्यं नारायणः शरैः।<br>आविध्येतां तदाऽन्योन्यं मर्मभिद्भिरजिह्मगैः॥ ७<br><br>ततोऽम्बरे संनिपातो देवानांमभवन्मुने।<br>दिदृक्षूणां तदा युद्धं लघु चित्रं च सुष्ठु च॥ ८ | तब दैत्यने नारायणको और नारायणने दैत्यको—एक-दूसरेको—मर्मभेदी एवं सीधे चलनेवाले बाणोंसे वेध दिया। मुने! उस समय शीघ्रतापूर्वक हो रहे इस कौशलयुक्त विचित्र एवं सुन्दर युद्धको देखनेकी इच्छावाले देवताओंका समूह आकाशमें एकत्र हो गया॥ ५-८॥ |
| ततः सुराणां दुन्दुभ्यस्त्ववाद्यन्त महास्वनाः।<br>पुष्पवर्षमनौपम्यं मुमुचुः साध्यदैत्ययोः॥ ९<br><br>ततः पश्यत्सु देवेषु गगनस्थेषु तावुभौ।<br>अयुध्येतां महेष्वासौ प्रेक्षकप्रीतिवर्द्धनम्॥ १०<br><br>बबन्धतुस्तदाकाशं तावुभौ शरवृष्टिभिः।<br>दिशश्च विदिशश्चैव छादयेतां शरोत्करैः॥ ११<br><br>ततो नारायणश्चापं समाकृष्य महामुने।<br>बिभेद मार्गणैस्तीक्ष्णैः प्रह्लादं सर्वमर्मसु॥ १२<br><br>तथा दैत्येश्वरः क्रुद्धश्चापमानम्य वेगवान्।<br>बिभेद हृदये बाह्वोर्वदने च नरोत्तमम्॥ १३ | उसके बाद बड़े जोरसे बजनेवाले नगाड़ोंको बजाकर देवताओंने भगवान् नारायणके और दैत्यके ऊपर अनुपमरूपमें पुष्पोंकी वर्षा की। फिर उन दोनों धनुर्धारियोंने आकाशमें स्थित देवताओंके सामने दर्शकोंको आनन्द देनेवाला (दिलचस्प) अनूठा युद्ध किया। उस समय उन दोनोंने बाणोंकी वृष्टिसे आकाशको मानो बाँध दिया और बाणवृष्टिसे दिशाओं एवं विदिशाओंको ढक दिया। महामुनि नारदजी! तब नारायणने धनुषको खींचकर तेज बाणोंसे प्रह्लादके सभी मर्मस्थलोंमें प्रहार किया और फुर्तीवाले दैत्येश्वरने क्रोधपूर्वक धनुषको चढ़ाकर नरोत्तमके हृदय, दोनों भुजाओं और मुँहको भी (बाणोंसे) बेध दिया॥ ९-१३॥ |
| ततोऽस्यतो दैत्यपतेः कार्मुकं मुष्टिबन्धनात्।<br>चिच्छेदैकेन बाणेन चन्द्रार्धाकारवर्चसा॥ १४<br><br>अपास्यत धनुश्छिन्नं चापमादाय चापरम्।<br>अधिज्यं लाघवात् कृत्वा ववर्ष निशिताञ्शरान्॥ १५<br><br>तानप्यस्य शरान् साध्यश्छित्त्वा बाणैरवारयत्।<br>कार्मुकं च क्षुरप्रेण चिच्छेद पुरुषोत्तमः॥ १६<br><br>छिन्नं छिन्नं धनुर्दैत्यस्त्वन्यदन्यत्समाददे।<br>समादत्ते तदा साध्यो मुने चिच्छेद लाघवात्॥ १७ | उसके बाद नारायणने बाण चला रहे प्रह्लादके धनुषके मुष्टिबन्धको अर्धचन्द्रके आकारवाले एक तेजस्वी बाणसे काट दिया। प्रह्लादने भी कटे धनुषको झट फेंककर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और शीघ्र ही उसकी प्रत्यञ्चा (डोरी) चढ़ाकर तेज बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। पर उसके उन शरोंको भी नारायणने बाणोंसे काटकर निवारित कर दिया और उन पुरुषोत्तमने तीक्ष्ण बाणसे उसके धनुषको भी काट डाला। नारदजी! एक धनुषके छिन्न होनेपर दैत्यराजने बारम्बार दूसरा धनुष ग्रहण किया, किंतु नारायणने लिये हुए उन-उन धनुषोंको भी तुरंत काटकर गिरा दिया॥ १४-१७॥ |
| संछिन्नेष्वथ चापेषु जग्राह दितिजेश्वरः।<br>परिघं दारुणं दीर्घं सर्वलोहमयं दृढम्॥ १८<br><br>परिगृह्याथ परिघं भ्रामयामास दानवः।<br>भ्राम्यमाणं स चिच्छेद नाराचेन महामुनिः॥ १९<br><br>छिन्ने तु परिघे श्रीमान् प्रह्लादो दानवेश्वरः।<br>मुद्गरं भ्राम्य वेगेन प्रचिक्षेप नराग्रजे॥ २०<br><br>तमापतन्तं बलवान् मार्गणैर्दशभिर्मुने।<br>चिच्छेद दशधा साध्यः स छिन्नो न्यपतद् भुवि॥ २१ | फिर धनुषोंके कट जानेपर दैत्यपति प्रह्लादने एक भयंकर, मजबूत और लौह (फौलाद)-से बने 'परिघ' नामक अस्त्रको उठा लिया। उसे लेकर वे दानव (प्रह्लाद) चारों ओर घुमाने लगे। उस घुमाये जाते हुए परिघको भी महामुनि नारायणने बाणसे काट दिया। उसके कट जानेपर श्रीमान् दनुजेश्वर प्रह्लादने पुनः एक मुद्गरको वेगसे घुमाकर उसे नारायणके ऊपर फेंका। नारदजी! उस आते हुए मुद्गरको भी बलवान् नारायणने दस बाणोंसे दस भागोंमें काट दिया; वह नष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १८-२१॥ |
अध्याय ८] प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय ४५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मुद्गरे वितथे जाते प्रासमाविध्य वेगवान्।<br>प्रचिक्षेप नराग्र्याय तं च चिच्छेद धर्मजः॥ २२<br>प्रासे छिन्ने ततो दैत्यः शक्तिमादाय चिक्षिपे।<br>तां च चिच्छेद बलवान् क्षुरप्रेण महातपाः॥ २३<br>छिन्नेषु तेषु शस्त्रेषु दानवोऽन्यन्महद्धनुः।<br>समादाय ततो बाणैरवतस्तार नारद॥ २४<br>ततो नारायणो देवो दैत्यनाथं जगद्गुरुः।<br>नाराचेन जघानाथ हृदये सुरतापसः॥ २५ | प्रह्लादने मुद्गरके विफल हो जानेपर 'प्राश' नामक अस्त्र लेकर बड़े जोरसे नरके बड़े भाई नारायणके ऊपर चला दिया; पर उन्होंने उसे भी काट डाला। प्राशके नष्ट हो जानेपर दैत्यने तेज 'शक्ति' फेंकी, पर बलवान् महातपा नारायणने उसे भी अपने क्षुरप्रके द्वारा काट डाला। नारदजी! उन सभी अस्त्रोंके नष्ट हो जानेपर प्रह्लाद दूसरे विशाल धनुषको लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। तब परम तपस्वी जगद्गुरु नारायणदेवने प्रह्लादके हृदयमें नाराचसे प्रहार किया॥ २२—२५॥ |
| संभिन्नहृदयो ब्रह्मन् देवेनाद्भुतकर्मणा।<br>निपपात रथोपस्थे तमपोवाह सारथिः॥ २६<br><br>स संज्ञां सुचिरेणैव प्रतिलभ्य दितीश्वरः।<br>सुदृढं चापमादाय भूयो योद्धुमुपागतः॥ २७<br><br>तमागतं संनिरीक्ष्य प्रत्युवाच नराग्रजः।<br>गच्छ दैत्येन्द्र योत्स्यामः प्रातस्त्वाहिकमाचर॥ २८<br><br>एवमुक्तो दितीशस्तु साध्येनाद्भुतकर्मणा।<br>जगाम नैमिषारण्यं क्रियां चक्रे तदाह्निकम्॥ २९ | नारदजी! अद्भुत पराक्रमी नारायणके प्रहारसे प्रह्लादका हृदय बिंध गया, फलतः वे बेहोश होकर रथके पिछले भागमें गिर पड़े। यह देखकर सारथी उन्हें वहाँसे हटाकर दूर ले गया। बहुत देरके बाद जब उन्हें चेतना प्राप्त हुई—होश आया, तब वे पुनः सुदृढ़ धनुष लेकर नर-नारायणसे युद्ध करनेके लिये संग्रामभूमिमें आ गये। उन्हें आया देख नारायणने कहा—दैत्येन्द्र! अब हम कल प्रातः युद्ध करेंगे; तुम भी जाओ, इस समय अपना नित्य कर्म करो। अद्भुत पराक्रमी श्रीमन्नारायणके ऐसा कहनेपर प्रह्लाद नैमिषारण्य चले गये और वहाँ अपने नित्य कर्म सम्पन्न किये॥ २६—२९॥ |
| एवं युध्यति देवे च प्रह्लादो ह्यसुरो मुने।<br>रात्रौ चिन्तयते युद्धे कथं जेष्यामि दाम्भिकम्॥ ३०<br><br>एवं नारायणेनाऽसौ सहायुध्यत नारद।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु दैत्यो देवं न चायजत्॥ ३१<br><br>ततो वर्षसहस्रान्ते ह्यजिते पुरुषोत्तमे।<br>पीतवाससमभ्येत्य दानवो वाक्यमब्रवीत्॥ ३२<br><br>किमर्थं देवदेवेश साध्यं नारायणं हरिम्।<br>विजेतुं नाद्य शक्नोमि एतन्मे कारणं वद॥ ३३ | नारदजी! इस प्रकार भगवान् नारायण एवं दानवेन्द्र प्रह्लाद—दोनोंमें युद्ध चलता रहा। रात्रिमें प्रह्लाद यह विचार किया करते थे कि मैं युद्धमें इन दम्भ करनेवाले ऋषिको कैसे जीतूँगा? नारदजी! इस प्रकार प्रह्लादने भगवान् नारायणके साथ एक हजार दिव्य वर्षोंतक युद्ध किया, परंतु वे उन्हें (नारायणको) जीत न पाये। फिर हजार दिव्य वर्षोंके बीत जानेपर भी पुरुषोत्तम नारायणको न जीत सकनेपर प्रह्लादने वैकुण्ठमें जाकर पीतवस्त्रधारी भगवान् विष्णुसे कहा—देवेश! मैं (सरलतासे) साध्य नारायणको आजतक क्यों न जीत पाया, आप मुझे इसका कारण बतलायें॥ ३०—३३॥ |
| पीतवासा उवाच<br><br>दुर्जयोऽसौ महाबाहुस्त्वया प्रह्लाद धर्मजः।<br>साध्यो विप्रवरो धीमान् मृधे देवासुरैरपि॥ ३४ | इसपर पीतवस्त्रधारी भगवान् विष्णु बोले—<br><br>प्रह्लाद! महाबाहु धर्मपुत्र नारायण तुम्हारे द्वारा दुर्जेय हैं। वे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ ऋषि परम ज्ञानी हैं। वे सभी देवताओं एवं असुरोंसे भी युद्धमें नहीं जीते जा सकते॥ ३४॥ |
४६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८
प्रह्लाद उवाच
यद्यसौ दुर्जयो देव मया साध्यो रणाजिरे।
तत्कथं यत्प्रतिज्ञातं तदसत्यं भविष्यति ॥ ३५
हीनप्रतिज्ञो देवेश कथं जीवेत मादृशः ।
तस्मात्तवाग्रतो विष्णो करिष्ये कायशोधनम् ॥ ३६
पुलस्त्य उवाच
इत्येवमुक्त्वा वचनं देवाग्रे दानवेश्वरः ।
शिरःस्नातस्तदा तस्थौ गृणन् ब्रह्म सनातनम् ॥ ३७
ततो दैत्यपतिं विष्णुः पीतवासाऽब्रवीद्वचः।
गच्छ जेष्यसि भक्त्या तं न युद्धेन कथंचन ॥ ३८
प्रह्लाद उवाच
मया जितं देवदेव त्रैलोक्यमपि सुव्रत ।
जितोऽयं त्वत्प्रसादेन शक्रः किमुत धर्मजः ॥ ३९
असौ यद्यजयो देव त्रैलोक्येनापि सुव्रतः ।
न स्थातुं त्वत्प्रसादेन शक्यं किमु करोम्यज ॥ ४०
पीतवासा उवाच
सोऽहं दानवशार्दूल लोकानां हितकाम्यया ।
धर्मं प्रवर्त्तयितुं तपश्चर्यां समास्थितः ॥ ४१
तस्माद्यदिच्छसि जयं तमाराधय दानव ।
तं पराजेष्यसे भक्त्या तस्माच्छुश्रूष धर्मजम् ॥ ४२
पुलस्त्य उवाच
इत्युक्तः पीतवासेन दानवेन्द्रो महात्मना ।
अब्रवीद्वचनं हृष्टः समाहूयाऽन्धकं मुने ॥ ४३
प्रह्लाद उवाच
दैत्याश्च दानवाश्चैव परिपाल्यास्त्वयान्धक ।
मयोत्सृष्टमिदं राज्यं प्रतीच्छस्व महाभुज ॥ ४४
इत्येवमुक्तो जग्राह राज्यं हैरण्यलोचनिः ।
प्रह्लादोऽपि तदाऽगच्छत् पुण्यं बदरिकाश्रमम् ॥ ४५
दृष्ट्वा नारायणं देवं नरं च दितिजेश्वरः ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ववन्दे चरणौ तयोः ॥ ४६
तमुवाच महातेजा वाक्यं नारायणोऽव्ययः ।
किमर्थं प्रणतोऽसीह मामजित्वा महासुर ॥ ४७
प्रह्लादने कहा - देव ! यदि वे साध्यदेव (नारायण)
युद्धभूमिमें मुझसे जीते नहीं जा सकते हैं तो मैंने जो
प्रतिज्ञा की है, उसका क्या होगा ? वह तो मिथ्या हो
जायगी। देवेश ! मुझ-जैसा व्यक्ति हीनप्रतिज्ञ होकर कैसे
जीवित रह सकेगा? इसलिये हे विष्णु ! अब मैं आपके
सामने अपने शरीरकी शुद्धि करूँगा ॥ ३५-३६ ॥
पुलस्त्यजी बोले - भगवान्से ऐसा कहकर दानवेश्वर
प्रह्लाद सिरसे पैरतक स्नानकर वहाँ बैठ गये और
'ब्रह्मगायत्री' का जप करने लगे। उसके बाद पीताम्बरधारी
विष्णुने प्रह्लादसे कहा - हाँ, तुम जाओ, तुम उन्हें भक्तिसे
जीत सकोगे, युद्धसे कथमपि नहीं ॥ ३७-३८ ॥
प्रह्लादजी बोले- देवाधिदेव ! सुव्रत ! आपकी
कृपासे मैंने तीनों लोकों तथा इन्द्रको भी जीत लिया
है; इन धर्मपुत्रकी बात ही क्या है? हे अज ! यदि ये
सद्व्रती त्रिलोकीसे भी अजेय हैं तथा आपके प्रसादसे
भी मैं उनके सामने नहीं ठहर सकता तो फिर मैं
क्या करूँ ? ॥ ३९-४० ॥
(इसपर) भगवान् विष्णु बोले - दानवश्रेष्ठ !
वस्तुतः नारायणरूपमें वहाँ मैं ही हूँ। मैं ही जगत्की
भलाईकी इच्छासे धर्मप्रवर्तनके लिये उस रूपमें तप कर
रहा हूँ। इसलिये प्रह्लाद ! यदि तुम विजय चाहते हो तो
मेरे उस रूपकी आराधना करो। तुम नारायणको भक्तिद्वारा
ही पराजित कर सकोगे। इसलिये धर्मपुत्र नारायणकी
आराधना करो-इसी अर्थमें वे सुसाध्य हैं ॥ ४१-४२ ॥
पुलस्त्यजी बोले - मुने ! भगवान् विष्णुके ऐसा
कहनेपर प्रह्लाद प्रसन्न हो गये। उन्होंने फिर अन्धकको
बुलाकर इस प्रकार कहा ॥ ४३ ॥
प्रह्लादजी बोले - अन्धक ! तुम दैत्यों और दानवोंका
प्रतिपालन करो। महाबाहो ! मैं यह राज्य छोड़ रहा हूँ।
इसे तुम ग्रहण करो। इस प्रकार कहनेपर जब
हिरण्याक्षके पुत्रने राज्यको स्वीकार कर लिया, तब
प्रह्लाद पवित्र बदरिकाश्रम चले गये। वहाँ उन्होंने
भगवान् नारायण तथा नरको देखकर हाथ जोड़कर
उनके चरणोंमें प्रणाम किया। महातेजस्वी भगवान्
नारायणने उनसे कहा - महासुर ! मुझे बिना जीते ही
अब तुम क्यों प्रणाम कर रहे हो ? ॥ ४४-४७ ॥
अध्याय ८ ]
प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय
४७
प्रह्लाद उवाच
कस्त्वां जेतुं प्रभो शक्तः कस्वतः पुरुषोऽधिकः ।
त्वं हि नारायणोऽनन्तः पीतवासा जनार्दनः ॥ ४८
त्वं देवः पुण्डरीकाक्षस्त्वं विष्णुः शार्ङ्गचापधृक् ।
त्वमव्ययो महेशानः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ॥ ४९
त्वां योगिनश्चिन्तयन्ति चार्चयन्ति मनीषिणः ।
जपन्ति स्नातकास्त्वां च यजन्ति त्वां च याज्ञिकाः ॥ ५०
त्वमच्युतो हृषीकेशश्चक्रपाणिर्धराधरः ।
महामीनो हयशिरास्त्वमेव वरकच्छपः ॥ ५१
हिरण्याक्षरिपुः श्रीमान् भगवनान्थ सूकरः ।
मत्पितुर्नाशनकरो भवानपि नृकेसरी ॥ ५२
ब्रह्मा त्रिनेत्रोऽमरराड् हुताशः
प्रेताधिपो नीरपतिः समीरः ।
सूर्यो मृगाङ्कोऽचलजङ्गमाद्यो
भगवान् विभो नाथ खगेन्द्रकेतो ॥ ५३
त्वं पृथ्वी ज्योतिराकाशं जलं भूत्वा सहस्रशः ।
त्वया व्याप्तं जगत्सर्वं कस्त्वां जेष्यति माधव ॥ ५४
भक्त्या यदि हृषीकेश तोषमेषि जगद्गुरो ।
नान्यथा त्वं प्रशक्योऽसि जेतुं सर्वगताव्यय ॥ ५५
भगवानुवाच
परितुष्टोऽस्मि ते दैत्य स्तवेनानेन सुव्रत ।
भक्त्या त्वनन्यया चाहं त्वया दैत्य पराजितः ॥ ५६
पराजितश्च पुरुषो दैत्य दण्डं प्रयच्छति ।
दण्डार्थं ते प्रदास्यामि वरं वृणु यमिच्छसि ॥ ५७
प्रह्लाद उवाच
नारायणं वरं याचे यं त्वं मे दातुमर्हसि ।
तन्मे पापं लयं यातु शारीरं मानसं तथा ॥ ५८
वाचिकं च जगन्नाथ यत्त्वया सह युध्यतः ।
नरेण यद्यप्यभवद् वरमेतत्प्रयच्छ मे ॥ ५९
नारायण उवाच
एवं भवतु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम् ।
द्वितीयं प्रार्थय वरं तं ददामि तवासुर ॥ ६०
प्रह्लाद उवाच
या या जायेत मे बुद्धिः सा सा विष्णो त्वदाश्रिता ।
देवार्चने च निरता त्वच्चित्ता त्वत्परायणा ॥ ६१
प्रह्लाद बोले- प्रभो ! आपको भला कौन जीत
सकता है ? आपसे बढ़कर कौन हो सकता है ? आप
ही अनन्त नारायण पीताम्बरधारी जनार्दन हैं। आप ही
कमलनयन शार्ङ्गधनुषधारी विष्णु हैं। आप अव्यय,
महेश्वर तथा शाश्वत परम पुरुषोत्तम हैं। योगिजन आपका
ही ध्यान करते हैं। विद्वान् पुरुष आपकी ही पूजा करते
हैं। वेदज्ञ आपके नामका जप करते हैं तथा याज्ञिकजन
आपका यजन करते हैं। आप ही अच्युत, हृषीकेश,
चक्रपाणि, धराधर, महामत्स्य, हयग्रीव तथा श्रेष्ठ कच्छप
(कूर्म) अवतारी हैं ॥ ४८-५१ ॥
आप हिरण्याक्ष दैत्यका वध करनेवाले ऐश्वर्य-
युक्त और भगवान् आदि वाराह हैं। आप ही मेरे
पिताको मारनेवाले भगवान् नृसिंह हैं। आप ब्रह्मा, शिव,
इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण और वायु हैं। हे स्वामिन् ! हे
खगेन्द्रकेतु (गरुड़ध्वज) ! आप सूर्य, चन्द्र तथा स्थावर
और जंगमके आदि हैं। पृथ्वी, अग्नि, आकाश और
जल आप ही हैं। सहस्रों रूपोंसे आपने समस्त जगत्को
व्याप्त किया है। माधव ! आपको कौन जीत सकेगा ?
जगद्गुरो ! हृषीकेश ! आप भक्तिसे ही संतुष्ट हो सकते
हैं। हे सर्वगत ! हे अविनाशिन् ! आप दूसरे किसी भी
अन्य प्रकारसे नहीं जीते जा सकते ॥ ५२-५५ ॥
श्रीभगवान् बोले- सुव्रत ! दैत्य ! तुम्हारी इस
स्तुतिसे मैं अत्यन्त संतुष्ट हूँ। दैत्य ! अनन्य भक्तिसे तुमने
मुझे जीत लिया है। प्रह्लाद ! पराजित पुरुष विजेताको
दण्ड (-के रूपमें कुछ) देता है। परंतु मैं तुम्हारे दण्डके
बदले तुम्हें वर दूँगा; तुम इच्छित वर माँगो ॥ ५६-५७ ॥
प्रह्लादजी बोले- हे नारायण ! मैं आपसे वर
माँग रहा हूँ; आप उसे देनेकी कृपा करें। हे जगन्नाथ !
आपके तथा नरके साथ युद्ध करनेमें मेरे शरीर, मन
और वाणीसे जो भी पाप (अपकर्म) हुआ हो वह सब
नष्ट हो जाय। आप मुझे यही वर दें ॥ ५८-५९ ॥
नारायणने कहा- दैत्येन्द्र ! ऐसा ही होगा।
तुम्हारा पाप नष्ट हो जाय। अब प्रह्लाद ! तुम दूसरा एक
वर और माँग लो, मैं उसे भी तुम्हें दूँगा ॥ ६० ॥
प्रह्लादजी बोले- हे भगवन् ! मेरी जो भी बुद्धि
हो, वह आपसे ही सम्बद्ध हो, वह देवपूजामें लगी रहे।
मेरी बुद्धि, आपका ही ध्यान करे और आपके चिन्तनमें
लगी रहे ॥ ६१ ॥