वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८
प्रह्लाद उवाच
यद्यसौ दुर्जयो देव मया साध्यो रणाजिरे।
तत्कथं यत्प्रतिज्ञातं तदसत्यं भविष्यति ॥ ३५
हीनप्रतिज्ञो देवेश कथं जीवेत मादृशः ।
तस्मात्तवाग्रतो विष्णो करिष्ये कायशोधनम् ॥ ३६
पुलस्त्य उवाच
इत्येवमुक्त्वा वचनं देवाग्रे दानवेश्वरः ।
शिरःस्नातस्तदा तस्थौ गृणन् ब्रह्म सनातनम् ॥ ३७
ततो दैत्यपतिं विष्णुः पीतवासाऽब्रवीद्वचः।
गच्छ जेष्यसि भक्त्या तं न युद्धेन कथंचन ॥ ३८
प्रह्लाद उवाच
मया जितं देवदेव त्रैलोक्यमपि सुव्रत ।
जितोऽयं त्वत्प्रसादेन शक्रः किमुत धर्मजः ॥ ३९
असौ यद्यजयो देव त्रैलोक्येनापि सुव्रतः ।
न स्थातुं त्वत्प्रसादेन शक्यं किमु करोम्यज ॥ ४०
पीतवासा उवाच
सोऽहं दानवशार्दूल लोकानां हितकाम्यया ।
धर्मं प्रवर्त्तयितुं तपश्चर्यां समास्थितः ॥ ४१
तस्माद्यदिच्छसि जयं तमाराधय दानव ।
तं पराजेष्यसे भक्त्या तस्माच्छुश्रूष धर्मजम् ॥ ४२
पुलस्त्य उवाच
इत्युक्तः पीतवासेन दानवेन्द्रो महात्मना ।
अब्रवीद्वचनं हृष्टः समाहूयाऽन्धकं मुने ॥ ४३
प्रह्लाद उवाच
दैत्याश्च दानवाश्चैव परिपाल्यास्त्वयान्धक ।
मयोत्सृष्टमिदं राज्यं प्रतीच्छस्व महाभुज ॥ ४४
इत्येवमुक्तो जग्राह राज्यं हैरण्यलोचनिः ।
प्रह्लादोऽपि तदाऽगच्छत् पुण्यं बदरिकाश्रमम् ॥ ४५
दृष्ट्वा नारायणं देवं नरं च दितिजेश्वरः ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ववन्दे चरणौ तयोः ॥ ४६
तमुवाच महातेजा वाक्यं नारायणोऽव्ययः ।
किमर्थं प्रणतोऽसीह मामजित्वा महासुर ॥ ४७
प्रह्लादने कहा - देव ! यदि वे साध्यदेव (नारायण)
युद्धभूमिमें मुझसे जीते नहीं जा सकते हैं तो मैंने जो
प्रतिज्ञा की है, उसका क्या होगा ? वह तो मिथ्या हो
जायगी। देवेश ! मुझ-जैसा व्यक्ति हीनप्रतिज्ञ होकर कैसे
जीवित रह सकेगा? इसलिये हे विष्णु ! अब मैं आपके
सामने अपने शरीरकी शुद्धि करूँगा ॥ ३५-३६ ॥
पुलस्त्यजी बोले - भगवान्से ऐसा कहकर दानवेश्वर
प्रह्लाद सिरसे पैरतक स्नानकर वहाँ बैठ गये और
'ब्रह्मगायत्री' का जप करने लगे। उसके बाद पीताम्बरधारी
विष्णुने प्रह्लादसे कहा - हाँ, तुम जाओ, तुम उन्हें भक्तिसे
जीत सकोगे, युद्धसे कथमपि नहीं ॥ ३७-३८ ॥
प्रह्लादजी बोले- देवाधिदेव ! सुव्रत ! आपकी
कृपासे मैंने तीनों लोकों तथा इन्द्रको भी जीत लिया
है; इन धर्मपुत्रकी बात ही क्या है? हे अज ! यदि ये
सद्व्रती त्रिलोकीसे भी अजेय हैं तथा आपके प्रसादसे
भी मैं उनके सामने नहीं ठहर सकता तो फिर मैं
क्या करूँ ? ॥ ३९-४० ॥
(इसपर) भगवान् विष्णु बोले - दानवश्रेष्ठ !
वस्तुतः नारायणरूपमें वहाँ मैं ही हूँ। मैं ही जगत्की
भलाईकी इच्छासे धर्मप्रवर्तनके लिये उस रूपमें तप कर
रहा हूँ। इसलिये प्रह्लाद ! यदि तुम विजय चाहते हो तो
मेरे उस रूपकी आराधना करो। तुम नारायणको भक्तिद्वारा
ही पराजित कर सकोगे। इसलिये धर्मपुत्र नारायणकी
आराधना करो-इसी अर्थमें वे सुसाध्य हैं ॥ ४१-४२ ॥
पुलस्त्यजी बोले - मुने ! भगवान् विष्णुके ऐसा
कहनेपर प्रह्लाद प्रसन्न हो गये। उन्होंने फिर अन्धकको
बुलाकर इस प्रकार कहा ॥ ४३ ॥
प्रह्लादजी बोले - अन्धक ! तुम दैत्यों और दानवोंका
प्रतिपालन करो। महाबाहो ! मैं यह राज्य छोड़ रहा हूँ।
इसे तुम ग्रहण करो। इस प्रकार कहनेपर जब
हिरण्याक्षके पुत्रने राज्यको स्वीकार कर लिया, तब
प्रह्लाद पवित्र बदरिकाश्रम चले गये। वहाँ उन्होंने
भगवान् नारायण तथा नरको देखकर हाथ जोड़कर
उनके चरणोंमें प्रणाम किया। महातेजस्वी भगवान्
नारायणने उनसे कहा - महासुर ! मुझे बिना जीते ही
अब तुम क्यों प्रणाम कर रहे हो ? ॥ ४४-४७ ॥