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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

शास्त्रं तुल्यप्रत्ययसन्ततिरसंकीर्णा
चातत्प्रत्ययैः शास्त्रोक्तालम्बन-
विषया च । प्रसिद्धश्चोपासन-
शब्दार्थो लोके गुरुमुपास्ते
राजानमुपास्त इति । यो हि
गुर्वादीन्सन्ततमुपचरति स उपास्त
इत्युच्यते । स च फलमाप्नोत्यु-
पासनस्य । अतोऽत्रापि च य
एवं वेद संधीयते प्रजादिभिः
स्वर्गान्तैः । प्रजादिफलान्याप्नो-
तीत्यर्थः ॥१–४॥

शास्त्रानुसार समान प्रत्ययके प्रवाहका
नाम 'उपासना' है। वह प्रवाह विजा-
तीय प्रत्ययोंसे रहित और शास्त्रोक्त
आलम्बनको आश्रय करनेवाला होना
चाहिये । लोकमें 'गुरुकी उपासना
करता है' 'राजाकी उपासना करता है'
इत्यादि वाक्योंमें 'उपासना' शब्दका
अर्थ प्रसिद्ध ही है । जो पुरुष गुरु
आदिकी निरन्तर परिचर्या करता
है वही 'उपासना करता है' ऐसा
कहा जाता है । वही उस उपासना-
का फल भी प्राप्त करता है । अतः
इस महासंहिताके सम्बन्धमें भी जो
पुरुष इस प्रकार उपासना करता है
वह [ मन्त्रमें बतलाये हुए ] प्रजासे
लेकर स्वर्गपर्यन्त समस्त पदार्थोंसे
सम्पन्न होता है, अर्थात् प्रजादिरूप
फल प्राप्त करता है ॥ १–४ ॥

इति शीक्षावल्ल्यां तृतीयोऽनुवाकः ॥ ३ ॥

और होमसम्बन्धी मन्त्र

चतुर्थ अनुवाक
श्री और बुद्धिकी कामनावालोंके लिये जप
और होमसम्बन्धी मन्त्र
यश्छन्दसामिति मेधाकाम- | अब 'यश्छन्दसाम्' इत्यादि
मन्त्रोंसे मेधाकामी तथा श्रीकामी
स्य श्रीकामस्य च तत्प्राप्तिसाधनं | पुरुषोंके लिये उनकी प्राप्तिके साधन
जप और होम बतलाये जाते हैं;
जपहोमावुच्येते । “स मेन्द्रो | क्योंकि “वह इन्द्र मुझे मेधासे प्रसन्न
अथवा बलयुक्त करे” तथा “अतः
उस श्रीको तू मेरे पास ला” इन
मेधया स्पृणोतु” “ततो मे श्रिय- | वाक्योंमें [ क्रमशः मेधा और श्री-
प्राप्तिके लिये की गयी प्रार्थनाके ]
मावह” इति च लिङ्गदर्शनात् । | लिङ्ग देखे जाते हैं ।
यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः । छन्दोभ्योऽध्य-
मृतात्संबभूव । स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव
धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे
मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम् । ब्रह्मणः कोशोऽसि
मेधया पिहितः । श्रुतं मे गोपाय । आवहन्ती वितन्वाना ॥१॥
कुर्वाणाचीरमात्मनः । वासाꣳसि मम गावश्च ।
अन्नपाने च सर्वदा । ततो मे श्रियमावह । लोमशां पशुभिः
सह स्वाहा । आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । विमायन्तु
ब्रह्मचारिणः स्वाहा । प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ।
दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । शमायन्तु ब्रह्मचारिणः
स्वाहा ॥ २ ॥
तै० उ० ५–६–
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३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
जो वेदोंमें ऋषभ ( श्रेष्ठ अथवा प्रधान ) और सर्वरूप है तथा
वेदरूप अमृतसे प्रधानरूपसे आविर्भूत हुआ है वह [ ओंकाररूप ] इन्द्र
( सम्पूर्ण कामनाओंका ईश ) मुझे मेधासे प्रसन्न अथवा बलयुक्त करे ।
हे देव ! मैं अमृतत्व ( अमृतत्वके हेतुभूत ब्रह्मज्ञान ) का धारण करने-
वाला होऊँ । मेरा शरीर विचक्षण (योग्य) हो । मेरी जिह्वा अत्यन्त मधुमती
( मधुर भाषण करनेवाली ) हो । मैं कानोंसे खूब श्रवण करूँ । [ हे
ओंकार ! ] तू ब्रह्मका कोष है और लौकिक बुद्धिसे ढँका हुआ है
[ अर्थात् लौकिक बुद्धिके कारण तेरा ज्ञान नहीं होता ] । तू मेरी
श्रवण की हुई विद्याकी रक्षा कर । मेरे लिये वस्त्र, गौ और अन्न-पानको
सर्वदा शीघ्र ही ले आनेवाली और इनका विस्तार करनेवाली श्रीको
[ भेड़-बकरी आदि ] ऊनवाले तथा अन्य पशुओंके सहित बुद्धि प्राप्त
करानेके अनन्तर तू मेरे पास ला—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग मेरे पास
आवें-स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग मेरे प्रति निष्कपट हों—स्वाहा । ब्रह्मचारी-
लोग प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) को धारण करें—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग
दम ( इन्द्रियदमन ) करें—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग शम ( मनोनियम )
करें—स्वाहा । [ इन मन्त्रोंके पीछे जो 'स्वाहा' शब्द है वह इस
बातको सूचित करता है कि ये हवनके लिये हैं ] ॥ १-२ ॥
यश्छन्दसां वेदानाम्पृषभ | जो [ ओंकार ] प्रधान होनेके
कारण छन्द- वेदोंमें श्रेष्ठके समान
ओङ्कारतो बुद्धि- इवर्षभः प्राधान्यात् । श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण वाणीमें व्याप्त
बलं प्रार्थ्यते विश्वरूपः सर्वरूपः होनेके कारण विश्वरूप यानी सर्वमय
है; जैसा कि “जिस प्रकार शङ्कुओं
सर्ववाग्व्याप्तेः । “तद्यथा श- ( पत्तोंकी नसों ) से [ सम्पूर्ण पत्ते
व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओंकारसे
ङ्कना" (छा० उ० २।२३।३) सम्पूर्ण वाणी व्याप्त है-ओंकार ही
यह सब कुछ है ]" इस एक अन्य
इत्यादि श्रुत्यन्तरात् । अत एव- श्रुतिसे सिद्ध होता है । इसीलिये

अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५


[वाम स्तम्भ / संस्कृत भाष्य]

र्षभत्वमोङ्कारस्य । ओङ्कारो
ह्यत्रोपास्य इति ऋषभादि-
शब्दैः स्तुतिर्न्याय्यैवोङ्कारस्य ।
छन्दोभ्यो वेदेभ्यो वेदा ह्यमृतं
तस्मादमृतादधिसंबभूव । लोक-
देववेदव्याहृतिभ्यः सारिष्ठं
जिघृक्षोः प्रजापतेस्तपस्यत
ओङ्कारः सारिष्ठत्वेन प्रत्यभा-
दित्यर्थः । न हि नित्यस्योङ्कार-
स्याञ्जसैवोत्पत्तिरेव कल्प्यते ।
स एवंभूत ओङ्कार इन्द्रः सर्व-
कामेशः परमेश्वरो मा मां मेधया
प्रज्ञया स्पृणोतु प्रीणयतु बलयतु
वा । प्रज्ञाबलं हि प्रार्थ्यते ।
अमृतस्य अमृतत्वहेतुभूतस्य
ब्रह्मज्ञानस्य तदधिकारात्, हे
देव धारणी धारयिता भूयासं
भवेयम् । किं च शरीरं मे मम
विचर्षणं विचक्षणं योग्यमित्ये-
तत् । भूयादिति प्रथमपुरुष-
विपरिणामः । जिह्वा मे मधु-


[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी भाष्यार्थ]

ओंकारकी श्रेष्ठता है । यहाँ ओंकार
ही उपासनीय है, इसलिये 'ऋषभ'
आदि शब्दोंसे ओंकारकी स्तुति की
जानी उचित ही है । छन्द अर्थात्
वेदोंसे—वेद ही अमृत हैं, उस
अमृतसे जो प्रधानरूपसे हुआ है ।
तात्पर्य यह है कि लोक, देव, वेद
और व्याहृतियोंसे सर्वोत्कृष्ट सार ग्रहण
करनेकी इच्छासे तप करते हुए प्रजा-
पतिको ओंकार ही सर्वोत्तम साररूपसे
भासित हुआ था; क्योंकि नित्य
ओंकारकी साक्षात् उत्पत्तिकी कल्पना
नहीं की जा सकती । वह इस
प्रकारका ओंकाररूप इन्द्र—सम्पूर्ण
कामनाओंका स्वामी परमेश्वर मुझे
मेधाद्वारा प्रसन्न अथवा सबल करे;
इस प्रकार यहाँ बुद्धिबलके लिये
प्रार्थना की जाती है ।
हे देव ! मैं अमृत—अमृतत्वके
हेतुभूत ब्रह्मज्ञानका धारण करने-
वाला होऊँ; क्योंकि यहाँ ब्रह्मज्ञान-
का ही प्रसङ्ग है । तथा मेरा शरीर
विचर्षण—विचक्षण अर्थात् योग्य
हो । [ मूलमें ‘भूयासम्’ (होऊँ) यह
उत्तम पुरुषका प्रयोग है इसे ]
‘भूयात्’ (हो) इस प्रकार प्रथम पुरुष-
में परिणत कर लेना चाहिये । मेरी

३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

मत्तमा मधुमत्यतिशयेन मधुर- | जिह्वा मधुमत्तमा-अतिशय मधुमती
भाषिणीत्यर्थः । कर्णाभ्यां श्रोत्रा- | अर्थात् अत्यन्त मधुरभाषिणी हो । मैं
भ्यां भूरि बहु विश्रुवं व्यश्रवं | कानोंसे भूरि-अधिक मात्रामें श्रवण
श्रोता भूयासमित्यर्थः । आत्म- | करूँ अर्थात् बड़ा श्रोता होऊँ ।
ज्ञानयोग्यः कार्यकारणसंघातो- | इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि
ऽस्त्विति वाक्यार्थः । मेधा च | मेरा शरीर और इन्द्रियसंधात आत्म-
तदर्थमेव हि प्रार्थ्यते । | ज्ञानके योग्य हो । तथा उसीके
लिये ही बुद्धिकी याचना की जाती है ।
ब्रह्मणः परमात्मनः कोशो- | परमात्माकी उपलब्धिका स्थान
ऽसि । असेरिवोपलब्ध्यधिष्ठान- | होनेके कारण तू तलवारके कोशके
त्वात् । त्वं हि ब्रह्मणः प्रतीकं | समान ब्रह्म यानी परमात्माका कोश
त्वयि ब्रह्मोपलभ्यते । मेधया | है; क्योंकि तू ब्रह्मका प्रतीक है—
लौकिकप्रज्ञया पिहित आच्छा- | तुझमें ब्रह्मकी उपलब्धि होती है ।
दितः स त्वं सामान्यप्रज्ञैरविदि- | वही तू मेधा अर्थात् लौकिकी बुद्धि-
ततत्त्व इत्यर्थः । श्रुतं श्रवणपूर्व- | से आच्छादित यानी ढका हुआ है;
कमात्मज्ञानादिकं मे गोपाय | अर्थात् सामान्य-बुद्धि पुरुषोंको तेरे
रक्ष । तत्प्राप्त्यविस्मरणादि | तत्त्वका ज्ञान नहीं होता । मेरे
कुर्वित्यर्थः । जपार्था एते मन्त्रा | श्रुत अर्थात् श्रवणपूर्वक आत्म-
ज्ञानादि विज्ञानकी रक्षा कर; अर्थात्
उसकी प्राप्ति एवं अविस्मरण आदि
मेधाकामस्य । | कर । ये मन्त्र मेधाकामी पुरुषके जपके लिये हैं ।
होमार्थास्त्वधुना श्रीकामस्य | अब लक्ष्मीकामी पुरुषको होमके
ओङ्कारतः मन्त्रा उच्यन्ते । | लिये मन्त्र बतलाये जाते हैं—आव-
श्रियः प्रार्थना आवहन्त्यानयन्ती । | हन्ती—लानेवाली; वितन्वाना—
वितन्वाना विस्तारयन्ती । तनो- | विस्तार करनेवाली; क्योंकि 'तनु'

अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७


संस्कृत मूल एवं भाष्यहिन्दी अनुवाद
तैस्तत्कर्मत्वात् । कुर्वाणा निर्वर्त-धातुका अर्थ विस्तार करना ही है;
यन्ती, अचीरमचिरं क्षिप्रमेव,कुर्वाणा—करनेवाली; अचीरम्—
छान्दसो दीर्घः; चिरं वा कुर्वा-अचिर अर्थात् शीघ्र ही; 'अचीरम्' में
णा आत्मनो मम, किमित्याह—दीर्घ ईकार वैदिक प्रक्रियाके अनुसार
वासांसि वस्त्राणि मम गावश्चहै । अथवा चिरं ( चिरकालतक )
गाश्चेति यावत्, अन्नपाने चआत्मनः—मेरे लिये करनेवाली, क्या
सर्वदैवमादीनि कुर्वाणा श्रीर्याकरनेवाली ? सो बतलाते हैं—मेरे वस्त्र,
तां ततो मेधानिर्वर्तनात्परमा-गौ और अन्न-पान इन्हें जो श्री सदा
वहानय । अमेधसो हि श्रीरन-ही करनेवाली है उसे, बुद्धि प्राप्त
र्थायैवेति ।करानेके अनन्तर तू मेरे पास ला; क्योंकि बुद्धिहीनके लिये तो लक्ष्मी अनर्थका ही कारण होती है ।
किंविशिष्टाम् । लोमशामजाव्या-किन विशेषणोंसे युक्त श्रीको
दियुक्तामन्यैश्च पशुभिः संयुक्ता-लावे ? लोमश अर्थात् भेड़-बकरी
मावहेत्यधिकारादोङ्कार एवाभि-आदि ऊनवालोंके सहित और अन्य
संबध्यते । स्वाहा स्वाहाकारोपशुओंसे युक्त श्रीको ला । यहाँ 'आवह' क्रियाका अधिकार होनेके कारण [ उसके कर्ता ] ओंकारसे ही सम्बन्ध
होमार्थमन्त्रान्तज्ञापनार्थः । आ-है । स्वाहा—यह स्वाहाकार होमार्थ मन्त्रोंका अन्त सूचित करनेके लिये
यन्तु मामिति व्यवहितेन सं-है । [ 'आ मायन्तु ब्रह्मचारिणः' इस वाक्यमें ] 'आयन्तु माम्' इस प्रकार
बन्धः । ब्रह्मचारिणो विमायन्तु'आ' का व्यवधानयुक्त 'यन्तु' शब्दसे सम्बन्ध है । [ इसी प्रकार मेरे प्रति ]
प्रमायन्तु दमायन्तु शमायन्वित्-ब्रह्मचारीलोग निष्कपट हों । वे प्रमा-
त्यादि ॥१-२॥को धारण करें, इन्द्रिय-निग्रह करें, मनोनिग्रह करें, इत्यादि ॥ १-२ ॥

३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
यशो जनेऽसानि स्वाहा । श्रेयान् वस्यसोऽसानि
स्वाहा । तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा । स मा भग प्रविश
स्वाहा । तस्मिन् सहस्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा ।
यथापः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम् । एवं मां
ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा । प्रतिवेशोऽसि
प्र मा पाहि प्र मा पद्यस्व ॥ ३ ॥
मैं जनतामें यशस्वी होऊँ—स्वाहा । मैं अत्यन्त प्रशंसनीय और
धनवान् होऊँ—स्वाहा । हे भगवन् ! मैं उस ब्रह्मकोशभूत तुझमें प्रवेश कर
जाऊँ—स्वाहा । हे भगवन् ! वह तू मुझमें प्रवेश कर--स्वाहा । हे भगवन् !
उस सहस्रशाखायुक्त [ अर्थात् अनकों भेदवाले ] तुझमें मैं अपने पापा-
चरणोंका शोधन करता हूँ—स्वाहा । जिस प्रकार जल निम्न प्रदेशकी
ओर जाता है तथा महीने अहर्जर—संवत्सरमें अन्तर्हित हो जाते हैं,
उसी प्रकार हे धातः ! ब्रह्मचारीलोग सब ओरसे मेरे पास आवें--
स्वाहा । तू [ शरणागतोंका ] आश्रयस्थान है अतः मेरे प्रति भासमान
हो, तू मुझे प्राप्त हो ॥ ३ ॥
यशो यशस्वी जने जनसमूहे- | मैं जनतामें यशस्वी होऊँ तथा
ऽसानि भवानि। श्रेयान्प्रशस्यतरो | श्रेयान्-प्रशस्यतर और वस्यसः-
वस्यसो वसीयसो वसुतराद्वसुमत्त- | वसीयसः अर्थात् वसुमान्से भी
राद्वासानीत्यन्वयः । किं च तं | वसुमान् यानी अत्यन्त धनी पुरुषों-
से भी विशेष धनवान् होऊँ । तथा
ब्रह्मणः कोशभूतं त्वा त्वां हे भग | हे भग-भगवन्-पूजनीय ! ब्रह्मके
कोशभूत उस तुझमें मैं प्रवेश करूँ;
भगवन्पूज्यावन्प्रविशानि प्रविश्य | तात्पर्य यह है कि तुझमें प्रवेश करके
चानन्यस्त्वदात्मैव भवानीत्यर्थः। | तुझसे अनन्य हो मैं तेरा ही रूप
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अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
स त्वमपि मा मां भग भगवन् | हो जाऊँ; तथा तू भी, हे भग-
प्रविश । आवयोरेकत्वमेवास्तु । | भगवन् ! मुझमें प्रवेश कर । अर्थात्
| हम दोनोंकी एकता ही हो जाय । हे
तस्मिंस्त्वयि सहस्रशाखे बहु- | भगवन् ! उस सहस्रशाख-अनेकों
शाखाभेदे हे भगवन्, निमृजे | शाखाभेदवाले तुझमें मैं अपने पाप-
शोधयाम्यहं पापकृत्याम् । | कर्मोंका शोधन करता हूँ ।
यथा लोक आपः प्रवता | लोकमें जिस प्रकार जल प्रवण-
प्रवणवता निम्नवता देशेन यन्ति | वान्-निम्नतायुक्त देशकी ओर जाते
गच्छन्ति । यथा च मासा | हैं और महीने जिस प्रकार अहर्जरमें
अहर्जरं संवत्सरोऽहर्जरः । | अन्तर्हित होते हैं। अहर्जर संवत्सर-
अहोभिः परिवर्तमानो लोकान्जर- | को कहते हैं; क्योंकि वह अहः
यतीत्यहानि वास्मिञ्जीर्यन्त्यन्त- | दिनोंके रूपमें परिवर्तित होता हुआ
र्भवन्तीत्यहर्जरः । तं च यथा | लोकोंको जीर्ण करता है अथवा
मासा यन्त्येवं मां ब्रह्मचारिणो | उसमें अहः-दिन जीर्ण यानी
हे धातः सर्वस्य विधातः मामा- | अन्तर्भूत होते हैं इसलिये वह
यन्त्वागच्छन्तु सर्वतः सर्व- | अहर्जर है । उस संवत्सरमें जिस
दिग्भ्यः । | प्रकार महीने जाते हैं उसी प्रकार
| हे धातः ! मेरे पास सब ओरसे-
| सम्पूर्ण दिशाओंसे ब्रह्मचारीलोग
| आवें ।
प्रतिवेशः-श्रमापनयनस्थान- | 'प्रतिवेश' श्रमनिवृत्तिके स्थान
मासन्नगृहमित्यर्थः । एवं त्वं | अर्थात् समीपवर्ती गृहको कहते हैं ।
प्रतिवेश इव प्रतिवेशस्त्वच्छी- | इस प्रकार तू प्रतिवेशके समान प्रति-
लिनां सर्वपापदुःखापनयनस्था- | वेश यानी अपना अनुशीलन करने-
नमसि, अतो मा मां प्रति प्रभाहि | वालोंका दुःखनिवृत्तिका स्थान है ।
| अतः तू मेरे प्रति अपनेको प्रकाशित
प्रकाशयात्मानं प्रपद्यस्व च । | कर और मुझे प्राप्त हो; अर्थात्
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४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


मां रसविद्धमिव लोहं तन्मयं | पारदसंयुक्त लोहेके समान तू मुझे
त्वदात्मानं कुर्वित्यर्थः । | अपनेसे अभिन्न कर ले ।
श्रीकामोऽस्मिन्विद्याप्रकरणे- | इस ज्ञानके प्रकरणमें जो लक्ष्मी-
<sub>विद्योपलब्धौ धनस्योपयोगः</sub> ऽभिधीयमानो धना- | की कामना कही जाती है वह धनके
र्थः । धनं च कर्मा- | लिये है, धन कर्मके लिये होता है,
र्थम् । कर्म चोपात्तदुरितक्षयाय । | और कर्म प्राप्त हुए पापोंके क्षयके
तत्क्षये हि विद्या प्रकाशते । तथा | लिये है । उनके क्षीण होनेपर ही
च स्मृतिः "ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां | ज्ञानका प्रकाश होता है; जैसा कि
क्षयात्पापस्य कर्मणः । यथादर्श- | यह स्मृति भी कहती है—"पाप-
तले प्रख्ये पश्यन्त्यात्मान- | कर्मोंका क्षय हो जानेपर ही पुरुष-
मात्मनि" (महा० शा० २०४ । | को ज्ञान होता है । जिस प्रकार
८, गरुड० १ । २३७ । ६ ) | दर्पणके स्वच्छ हो जानेपर उसमें
इति ॥ ३ ॥ | मुख देखा जा सकता है उसी प्रकार शुद्ध अन्तःकरणमें आत्माका साक्षात्कार होता है" ॥ ३ ॥


इति शीक्षावल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥

मन्त्रा अनुक्रान्ताः । ते च पार- | श्रीकामी पुरुषोंके लिये मन्त्र बतलाये

पञ्चम अनुवाक
व्याहृतिरूप ब्रह्मकी उपासना
संहिताविषयमुपासनमुक्तं त- | पहले संहितासम्बन्धिनी
दनु मेधाकामस्य श्रीकामस्य | उपासनाका वर्णन किया गया ।
तत्पश्चात् मेधाकी कामनावाले तथा
मन्त्रा अनुक्रान्ताः । ते च पार- | श्रीकामी पुरुषोंके लिये मन्त्र बतलाये
म्पर्येण विद्योपयोगार्था एव । | गये । वे भी परम्परासे ज्ञानके
अनन्तरं व्याहृत्यात्मनो ब्रह्मणो- | उपयोगके लिये ही हैं । उसके
पश्चात् अब जिसका फल स्वाराज्य
ऽन्तरुपासनं स्वाराज्यफलं प्र- | है उस व्याहृतिरूप ब्रह्मकी आन्तरिक
स्तूयते— | उपासनाका आरम्भ किया जाता है—
भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः ।
तासामु ह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते ।
मह इति । तद्ब्रह्म । स आत्मा । अङ्गान्यन्या देवताः ।
भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम् । सुवरित्यसौ
लोकः ॥ १ ॥
मह इत्यादित्यः । आदित्येन वाव सर्वे लोका
महीयन्ते । भूरिति वा अग्निः । भुव इति वायुः । सुवरित्या-
दित्यः । मह इति चन्द्रमाः । चन्द्रमसा वाव सर्वाणि
ज्योतींषि महीयन्ते । भूरिति वा ऋचः । भुव इति
सामानि । सुवरिति यजूंषि ॥ २ ॥
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४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
मह इति ब्रह्म । ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते ।
भूरिति वै प्राणः । भुव इत्यपानः । सुवरिति व्यानः । मह
इत्यन्नम् । अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते । ता वा
एताश्चतस्रश्चतुर्धा । चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः । ता यो वेद ।
स वेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥ ३ ॥
'भूः, भुवः और सुवः' ये तीन व्याहृतियाँ हैं । उनमेंसे 'महः'
इस चौथी व्याहृतिको माहाचमस्य ( महाचमसका पुत्र ) जानता है ।
वह महः ही ब्रह्म है । वही आत्मा है । अन्य देवता उसके अङ्ग ( अवयव )
हैं । 'भूः' यह व्याहृति यह लोक है, 'भुवः' अन्तरिक्षलोक है
और 'सुवः' यह स्वर्गलोक है ॥ १ ॥ तथा 'महः' आदित्य है । आदित्यसे
ही समस्त लोक वृद्धिको प्राप्त होते हैं । 'भूः' यही अग्नि है, 'भुवः
वायु है, 'सुवः' आदित्य है तथा 'महः' चन्द्रमा है । चन्द्रमासे ही
सम्पूर्ण ज्योतियाँ वृद्धिको प्राप्त होती हैं । 'भूः' यही ऋक् है, 'भुवः'
साम है, 'सुवः' यजुः है ॥ २ ॥ तथा 'महः' ब्रह्म है । ब्रह्मसे ही
समस्त वेद वृद्धिको प्राप्त होते हैं । 'भूः' यही प्राण है, 'भुवः'
अपान है, 'सुवः' व्यान है तथा 'महः' अन्न है । अन्नसे ही समस्त
प्राण वृद्धिको प्राप्त होते हैं । इस प्रकार ये चार व्याहृतियाँ हैं । इनमेंसे
प्रत्येक चार-चार प्रकारकी है । जो इन्हें जानता है वह ब्रह्मको
जानता है । सम्पूर्ण देवगण उसे बलि ( उपहार ) समर्पण करते हैं ॥३॥
भूर्भुवःसुवरिति;इतीत्युक्तोप- | 'भूर्भुवः सुवरिति' इसमें 'इति'
| शब्द पूर्वकथित [ व्याहृतियों ] को
प्रदर्शनार्थः । एता- | ही प्रदर्शित करनेके लिये है;
[हाशिए में: व्याहृतिचतुष्टयम्]
स्तिस्र इति च प्रद- | 'एतास्तिस्रः' ये शब्द भी पूर्व-
| प्रदर्शित [ व्याहृतियों ] के ही
र्शितानां परामर्शार्थः । परामृष्टाः | परामर्शके लिये हैं । 'वै' इस

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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
स्मार्यन्ते वा इत्यनेन । तिस्र एताः | अव्ययसे परामृष्ट व्याहृतियोंका
| स्मरण कराया जाता है। अर्थात्
प्रसिद्धा व्याहृतयः स्मार्यन्ते | [इन शब्दोंसे] ये तीन प्रसिद्ध
| व्याहृतियाँ स्मरण दिलायी जाती
तावत् । तासामियं चतुर्थी | हैं। उनमें 'महः' यह चौथी
व्याहृतिर्मह इति । तामेतां चतुर्थी | व्याहृति है । उस इस चौथी
| व्याहृतिको महाचमसका पुत्र माहा-
महाचमसस्यापत्यं माहाचमस्यः | चमस्य जानता है । किन्तु 'उ ह
| स्म' ये तीन निपात अतीत घटना-
प्रवेदयते । उ ह स्म इत्येतेषां वृत्ता- | का अनुकथन करनेके लिये होनेके
| कारण इसका अर्थ 'जानता था'
नुकथनार्थत्वाद्विदितवान्ददर्श- | 'देखा था' इस प्रकार होगा ।
त्यर्थः । माहाचमस्यग्रहणमार्षा- | [व्याहृतिके द्रष्टा] ऋषिका अनु-
| स्मरण करनेके लिये 'माहाचमस्य'
नुस्मरणार्थम् । ऋषिसंस्मरणमप्यु- | यह नाम लिया गया है । इस प्रकार
| यहाँ उपदेश होनेके कारण यह
पासनाङ्कमिति गम्यत इहो- | जाना जाता है कि ऋषिका अनु-
पदेशात् । | स्मरण भी उपासनाका एक अङ्ग है।
येयं माहाचमस्येन दृष्टा व्या- | जिस 'महः' नामक व्याहृतिको
| माहाचमस्यने देखा था वह ब्रह्म है ।
[व्याहृतिषु महसः] हृतिर्मह इति तद्ब्रह्म । | ब्रह्म भी महान् है और व्याहृति भी
[प्राधान्यम्] महद्धि ब्रह्म महश्च | महः है। और वह क्या है? वही
| आत्मा है । 'व्याप्ति' अर्थवाले
व्याहृतिः। किं पुनस्तत् ? स आत्मा। | 'आप्' धातुसे 'आत्मा' शब्द
आप्नोतेर्व्याप्तिकर्मणः आत्मा । | निष्पन्न होता है । क्योंकि लोक,
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४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


इतराश्च व्याहृतयो लोका देवा | देव, वेद और प्राणरूप अन्य
वेदाः प्राणाश्च मह इत्यनेन | व्याहृतियाँ आदित्य, चन्द्र, ब्रह्म एवं
व्याहृत्यात्मनादित्यचन्द्रब्रह्मान्न- | अन्नस्वरूप व्याहृत्यात्मक महःसे
भूतेन व्याप्यन्ते यतः अतो- | व्याप्त हैं, इसलिये वे अन्य देवता
ऽङ्गान्यवयवा अन्या देवताः। | इसके अंग—अवयव हैं । यहाँ
देवताग्रहणमुपलक्षणार्थं लोका- | लोकादिका उपलक्षण करानेके लिये
दीनाम् । मह इत्येतस्य व्या- | 'देवता' शब्दका ग्रहण किया
हृत्यात्मनो देवलोकादयः सर्वे- | गया है। क्योंकि देव और लोक
ऽवयवभूता यतोऽत आहादित्या- | आदि सभी 'महः' इस व्याहृत्यात्माके
दिभिर्लोकादयो महीयन्ते इति । | अवयवस्वरूप हैं, इसीलिये ऐसा
आत्मनो ह्यङ्गानि महीयन्ते, महनं | कहा है कि आदित्यादिके योगसे
वृद्धिरुपचयः । महीयन्ते वर्धन्त | लोकादि महत्ताको प्राप्त होते हैं ।
इत्यर्थः । | आत्मासे ही अङ्ग महत्ताको प्राप्त
| हुआ करते हैं । 'महन' शब्दका
| अर्थ वृद्धि—उपचय है । अतः
| 'महीयन्ते' इसका 'वृद्धिको प्राप्त
| होते हैं' यह अर्थ है ।
अयं लोकोऽग्निर्ऋग्वेदः प्राण | यह लोक, अग्नि, ऋग्वेद और
प्रतिव्याहृति चत्वारो भेदाः इति प्रथमा व्याहृति- | प्राण—ये पहली व्याहृति भूः हैं; इसी
भूरिति । एवमुत्त- | प्रकार उत्तरोत्तर प्रत्येक व्याहृति चार-
रोत्तरैकैका चतुर्धा भवति । | चार प्रकारकी है ।* 'महः' ब्रह्म
मह इति ब्रह्म । ब्रह्मेत्योङ्कारः, | है; ब्रह्मका अर्थ ओंकार है; क्योंकि
शब्दाधिकारेऽन्यस्यासंभवात् । | शब्दके प्रकरणमें अन्य किसी ब्रह्म-
उक्तार्थमन्यत् । | का होना असम्भव है । शेष सबका
| अर्थ पहले कहा जा चुका है ।


* यथा अन्तरिक्षलोक, वायु, सामवेद और अपान—ये दूसरी व्याहृति
भुवः हैं; द्युलोक, आदित्य, यजुर्वेद और व्यान—ये तीसरी व्याहृति सुवः हैं;
तथा आदित्य, चन्द्रमा, ब्रह्म और अन्न—ये चौथी व्याहृति महः हैं ।


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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धेति । | वे ये चारों व्याहृतियाँ चार प्रकारकी हैं । अर्थात् वे ये भूः, भुवः, सुवः और महः चार व्याहृतियाँ प्रत्येक चार-चार प्रकारकी हैं । 'धा' शब्द 'प्रकार' का वाचक है । अर्थात् वे चार-चार होती हुई चार प्रकारकी हैं । उनकी जिस प्रकार पहले कल्पना की गयी है उसी प्रकार उपासना करनेका नियम करनेके लिये उनका पुनः उपदेश किया गया है । उन उपर्युक्त व्याहृतियोंको जो पुरुष जानता है वही जानता है । किसे जानता है ? ब्रह्मको ।
ता वा एता भूर्भुवः सुवर्मह इति
चतस्र एकैकशश्चतुर्धा चतुष्प्र-
काराः । धाशब्दः प्रकारवचनः ।
चतस्रश्चतस्रः सत्यश्चतुर्धा भव-
न्तीत्यर्थः । तासां यथाक्लृप्तानां
पुनरुपदेशस्तथैवोपासननियमार्थः।
ता यथोक्तव्याहृतीर्यो वेद स
वेद विजानाति । किम् ? ब्रह्म ।
ननु “तद्ब्रह्म स आत्मा” इति | शङ्का- "वह ब्रह्म है, वह आत्मा है" इस वाक्यद्वारा [ महः रूपसे ] ब्रह्मको जान लेनेपर भी उसे न जाननेके समान '[ उसे जो जानता है ] वह ब्रह्मको जानता है' ऐसा कहना तो ठीक नहीं है ।
ज्ञाते ब्रह्मणि न वक्तव्यमविज्ञात-
वत्स वेद ब्रह्मेति ।
न; तद्विशेषविवक्षुत्वाद- | समाधान-ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उस [ ब्रह्मविषयक ज्ञान ] के विषयमें विशेष कहना अभीष्ट होनेके कारण इस प्रकार कहनेमें कोई दोष नहीं है । यह ठीक है कि इतना तो जान लिया कि चतुर्थ व्याहृतिरूप ब्रह्म है; किन्तु हृदयके भीतर उपलब्ध होना तथा मनो- मयत्वादिरूप उसकी विशेषताओंका
दोषः । सत्यं विज्ञातं
[पञ्चमषष्ठानु-वाक्ययोरेकवाक्यता] चतुर्थव्याहृत्यात्मा
ब्रह्मेति न तु तद्विशेषो हृदयान्त-
रुपलभ्यत्वं मनोमयत्वादिश्च ।

४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
'शान्तिसमृद्धम्' इत्येवमन्तो | तो ज्ञान नहीं हुआ । [अगले अनुवाक-
विशेषणविशेष्यरूपो धर्मपूगो न | में ] 'शान्तिसमृद्धम्' इस वाक्यतक
विज्ञायत इति तद्विवक्षु हि | कहा हुआ विशेषण-विशेष्यरूप धर्म-
शास्त्रमविज्ञातमिव ब्रह्म मत्वा स | समूह ज्ञात नहीं है; उसे बतलानेकी
वेद ब्रह्मेत्याह । अतो न दोषः । | इच्छासे ही शास्त्रने ब्रह्मको न जाने
यो हि वक्ष्यमाणेन धर्मपूगेन | हुएके समान मानकर 'वह ब्रह्मको
विशिष्टं ब्रह्म वेद स वेद ब्रह्मे- | जानता है' ऐसा कहा है । इसलिये
त्यभिप्रायः । अतो वक्ष्यमाणा- | इसमें कोई दोष नहीं है । इसका
नुवाके नैकवाक्यतास्य; उभयोर्ह्य- | अभिप्राय यह है कि जो पुरुष आगे
नुवाकयोरेकमुपासनम् । | बतलाये जानेवाले धर्मसमूहसे
| विशिष्ट ब्रह्मको जानता है वही
लिङ्गाच्च, भूरित्यग्नौ प्रति- | ब्रह्मको जानता है । अतः आगे
| कहे जानेवाले अनुवाकसे इसकी
तिष्ठतीत्यादिकं लिङ्गमुपासने- | एकवाक्यता है; क्योंकि इन दोनों
| अनुवाकोंकी एक ही उपासना है ।
कत्वे । विधायकाभावाच्च । न हि | [ ज्ञापक ] लिङ्ग होनेसे भी यही
| बात सिद्ध होती है । [ छठे
| अनुवाकमें ] 'भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति'
'वेद' 'उपासितव्यः' इति विधा- | इत्यादि फलश्रुति इन दोनों अनुवाकोंमें
| एक ही उपासना होनेका लिङ्ग है ।
यकः कश्चिच्छब्दोऽस्ति। व्याहृत्य- | कोई विधान करनेवाला शब्द न
| होनेके कारण भी ऐसा ही समझा
| जाता है । [ छठे अनुवाकमें ] 'वेद'
नुवाके 'ता यो वेद' इति च | 'उपासितव्यः' ऐसा कोई [ उपासना-
| का ] विधान करनेवाला शब्द
| नहीं है । व्याहृति-अनुवाकमें
| जो 'उन ( व्याहृतियों ) को जो
| जानता है' ऐसा वाक्य है वह

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अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७

वक्ष्यमाणार्थत्वान्नोपासनभेदकः । | आगे बतलायी जानेवाली उपासनाके
| लिये होनेके कारण [ पूर्वोक्त
वक्ष्यमाणार्थत्वं च तद्विशेषविव- | उपासनासे ] उसका भेद करने-
| वाला नहीं है । उसी उपासनाको
| आगे बतलाना क्यों इष्ट है यह बात
क्षुत्वादित्यादिनोक्तम् । सर्वे देवा | 'उसकी विशेषता बतलानेकी इच्छा
| होनेके कारण' आदि हेतुओंसे
| पहले कह ही चुके हैं । ऐसा
अस्मा एवं विदुषेऽङ्गभूता आव- | जाननेवाले उपासकको उसके अङ्ग-
| भूत समस्त देवगण बलि ( उपहार )
हन्त्यानयन्ति बलिं स्वाराज्य- | समर्पण करते हैं अर्थात् स्वाराज्यकी
| प्राप्ति हो जानेपर उसके लिये उपहार
प्राप्तौ सत्यामित्यर्थः ॥ १-३ ॥ | लाते हैं—यह इसका तात्पर्य है॥१-३॥

इति शीक्षावल्ल्यां पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥

षष्ठ अनुवाद
ब्रह्मके साक्षात् उपलब्धिस्थान हृदयाकाशका वर्णन
भूर्भुवःसुवःस्वरूपा मह इत्ये- | भूः, भुवः और सुवः-ये अन्य
तस्य व्याहत्यात्मनो ब्रह्मणोऽङ्- | देवता 'महः' इस व्याहृतिरूप हिरण्य-
| गर्भसंज्ञक ब्रह्मके अङ्ग हैं-ऐसा
गान्यन्या देवता इत्युक्तम् । यस्य | पहले कहा जा चुका है । जिसके
ता अङ्गभूतास्तस्यैतस्य ब्रह्मणः | वे अङ्गभूत हैं उस इस ब्रह्मकी साक्षात्
साक्षादुपलब्ध्यर्थमुपासनार्थं च | उपलब्धि और उपासनाके लिये
| हृदयाकाश स्थान बतलाया जाता है,
हृदयाकाशः स्थानमुच्यते शाल- | जैसे कि विष्णुके लिये शालग्राम ।
ग्राम इव विष्णोः । तस्मिन्हि | उसमें उपासना किये जानेपर
तद्ब्रह्मोपास्यमानं मनोमयत्वादि- | ही वह मनोमयत्वादिधर्मविशिष्ट
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४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [वल्ली १

४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [_वल्ली १
धर्मविशिष्टं साक्षादुपलभ्यते | ब्रह्म हथेलीपर रखे हुए आँवलेके
पाणाविवामलकम् । मार्गश्च | समान साक्षात् उपलब्ध होता है ।
सर्वात्मभावप्रतिपत्तये वक्तव्य | इसके सिवा सर्वात्मभावकी प्राप्तिके
लिये मार्ग भी बतलाना है, इसलिये इस .
इत्यनुवाक आरभ्यते— | अनुवाकका आरम्भ किया जाता है—
स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः । तस्मिन्नयं पुरुषो
मनोमयः । अमृतो हिरण्मयः । अन्तरेण तालुके । य
एष स्तन इवावलम्बते । सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो
विवर्तते । व्यपोह्य शीर्षकपाले । भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति ।
भुव इति वायौ ॥ १ ॥
सुवरित्यादित्ये । मह इति ब्रह्मणि । आप्नोति
स्वाराज्यम् । आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः ।
श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः । एतत्ततो भवति । आकाशशरीरं
ब्रह्म । सत्यात्म प्राणारामं मन आनन्दम् । शान्ति-
समृद्धममृतम् । इति प्राचीनयोग्योपास्स्व ॥ २ ॥
यह जो हृदयके मध्यमें स्थित आकाश है उसमें ही यह मनोमय अमृत-
स्वरूप हिरण्मय पुरुष रहता है । तालुओंके बीचमें और [ उनके मध्य ] यह
जो स्तनके समान [ मांसखण्ड ] लटका हुआ है [ उसमें होकर जो सुषुम्ना
नाडी ] जहाँ केशोंका मूलभाग विभक्त होकर रहता है उस मूर्धप्रदेशमें
मस्तकके कपालोंको विदीर्ण करके निकल गयी है वह इन्द्रयोनि [ अर्थात्
परमात्माकी प्राप्तिका मार्ग ] है । [ इस प्रकार उपासना करनेवाला पुरुष
प्राणप्रयाणके समय मूर्धाका भेदन कर ] 'भूः' इस व्याहृतिरूप अग्निमें
स्थित होता है [ अर्थात् 'भूः' इस व्याहृतिका चिन्तन करनेसे अग्नि-
रूप होकर इस लोकको व्याप्त करता है ] । इसी प्रकार 'भुवः' इस
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अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
व्याहृतिका ध्यान करनेसे वायुमें ॥ १ ॥ 'सुवः' इस व्याहृतिका चिन्तन
करनेसे आदित्यमें तथा 'महः' की उपासना करनेसे ब्रह्ममें स्थित हो जाता
है। इस प्रकार वह स्वाराज्य प्राप्त कर लेता है तथा मनके पति
(ब्रह्म) को पा लेता है। तथा वाणीका पति, चक्षुका पति, श्रोत्रका
पति और सारे विज्ञानका पति हो जाता है। यही नहीं; इससे भी बड़ा
हो जाता है। वह आकाश शरीर, सत्यस्वरूप, प्राणाराम, मनआनन्द
(जिसके लिये मन आनन्दस्वरूप है), शान्तिसम्पन्न और अमृतस्वरूप
ब्रह्म हो जाता है। हे प्राचीनयोग्य शिष्य ! तू इस प्रकार [ उस
ब्रह्मकी ] उपासना कर ॥ २ ॥


'सः' इति व्युत्क्रम्य 'अयं
हृदयाकाशतस्त्य- पुरुषः' इत्यनेन सं-
जीवयोः स्वरूपम् बध्यते। य एषो-
ऽन्तर्हृदये हृदयस्यान्तर्हृदयमिति
पुण्डरीकाकारो मांसपिण्डः प्रा-
णायतनोऽनेकनाडीसुषिर ऊर्ध्व-
नालोऽधोमुखो विशस्यमाने पशौ
प्रसिद्ध उपलभ्यते। तस्यान्तर्य
एष आकाशः प्रसिद्ध एव कर-
काकाशवत्, तस्मिन्सोऽयं पुरुषः।
पुरि शयनात्पूर्णा वा भूरादयो
लोका येनेति पुरुषः । मनोमयो


'सः' इस पहले पदका, पाठ-
क्रमको छोड़कर आगेके 'अयं
पुरुषः' इस पदसे सम्बन्ध है। जो
यह अन्तर्हृदयमें हृदयके भीतर
[ आकाश है ]। हृदय अर्थात्
श्वेत कमलके आकारवाला मांस-
पिण्ड, जो प्राणका आश्रय, अनेकों
नाड़ियोंके छिद्रवाला तथा ऊपरको
नाल और नीचेको मुखवाला है,
जो कि पशुका आलभन (वध)
किये जानेपर स्पष्टतया उपलब्ध
होता है। उसके भीतर जो यह
कमण्डलुके अन्तर्वर्ती आकाशके
समान प्रसिद्ध आकाश है उसीमें
यह पुरुष रहता है, जो शरीररूप
पुरमें शयन करनेके कारण अथवा
उसने भूः आदि सम्पूर्ण लोकोंको
पूरित किया हुआ है इसलिये
'पुरुष' कहलाता है। वह मनोमय


तै० उ० ७-८-
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५० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

५० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


[संस्कृत-भाष्यम्]

मनो विज्ञानम् मनुतेर्ज्ञान-
कर्मणः, तन्मयस्तत्प्रायस्तदुपल-
भ्यत्वात्। मनुतेऽनेनेति वा मनो-
ऽन्तःकरणं तदभिमानी तन्मय-
स्तल्लिङ्गो वा; अमृतोऽमरणधर्मा
हिरण्मयो ज्योतिर्मयः ।
तस्यैवंलक्षणस्य हृदयाकाशे
(पार्श्व-टिप्पणी: हृदयाकाशस्थ-जीवोपलब्धये मार्गः) साक्षात्कृतस्य विदुष
आत्मभूतस्येन्द्रस्यै-
द्यस्वरूपप्रतिपत्तये
मार्गोऽभिधीयते। हृदयादूर्ध्वं प्रवृ-
त्ता सुषुम्ना नाम नाडी योग-
शास्त्रेषु च प्रसिद्धा । सा चान्त-
रेण मध्ये प्रसिद्धे तालुके तालु-
कयोर्गता । यश्चैष तालुकयोर्मध्ये
स्तन इवावलम्बते मांसखण्डस्त-
स्य चान्तरेणेत्येतत् । यत्र च
केशान्तः केशानामन्तोऽवसानं
मूलं केशान्तो विवर्तते विभागेन
वर्तते मूर्धप्रदेश इत्यर्थः तं देशं
प्राप्य तत्र विनिःसृता व्यपोह्य
विभज्य विदार्य शीर्षकपाले


[हिन्दी-अनुवाद]

—ज्ञानवाची 'मन्' धातुसे सिद्ध होनेके
कारण 'मन' शब्दका अर्थ 'विज्ञान'
है, तन्मय–तत्प्राय अर्थात् विज्ञान-
मय है; क्योंकि उस (विज्ञानस्वरूप)
से ही वह उपलब्ध होता है; अथवा
जिसके द्वारा जीव मनन करता है वह
अन्तःकरण ही 'मन' है उसका अभि-
मानी, तन्मय अथवा उससे उपलक्षित
होनेवाला अमृत—अमरणधर्मा और
हिरण्मय—ज्योतिर्मय है ।
हृदयाकाशमें साक्षात्कार किये
हुए उस ऐसे लक्षणोंवाले तथा विद्वान्-
के आत्मभूत इन्द्र ( ईश्वर ) के ऐसे
स्वरूपकी प्राप्तिके लिये मार्ग बतलाया
जाता है—हृदयदेशसे ऊपरकी ओर
जानेवाली सुषुम्ना नामकी नाडी योग-
शास्त्रमें प्रसिद्ध है । वह 'अन्तरेण
तालुके' अर्थात् दोनों तालुओंके
बीचमें होकर गयी है। और तालुओंके
बीचमें यह जो स्तनके समान मांस-
खण्ड लटका हुआ है उसके भी
बीचमें होकर गयी है । तथा जहाँ यह
केशान्त—केशोंके मूलभागका नाम
'केशान्त' है वह जिस स्थानपर
विभक्त होता है अर्थात् जो मूर्ध-
प्रदेश है, उस स्थानमें पहुँचकर
जो निकल गयी है, अर्थात् जो
शीर्षकपालों—मस्तकके कपालोंको

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
............................................~

शिरःकपाले विनिर्गता या सेन्द्र- | पार-विभक्त यानी विदीर्ण करती हुई
योनिरिन्द्रस्य ब्रह्मणो योनिर्मार्गः | बाहर निकल गयी है वही इन्द्रयोनि—
स्वरूपप्रतिपत्तिद्वारमित्यर्थः । | इन्द्र अर्थात् ब्रह्मकी योनि—मार्ग यानी
| ब्रह्मस्वरूपकी प्राप्तिका द्वार है ।
तयैवं विद्वान्मनोमयात्मदर्शी | इस प्रकार उस सुषुम्ना नाडीद्वारा
[सुषुम्नाद्वारा] मूर्ध्ना विनिष्क्रम्या- | जाननेवाला अर्थात् मनोमय आत्मा-
[चतुर्व्याहृतिरूप-] स्य लोकस्याधिष्ठा- | का साक्षात्कार करनेवाला पुरुष
[ब्रह्मप्राप्तिः] ता भूरिति व्याहृति- | मूर्धद्वारसे निकलकर इस लोकका
| अधिष्ठाता जो महान् ब्रह्मका अङ्ग-
रूपो योऽग्निर्महतो ब्रह्मणोऽङ्गभूत- | भूत 'भूः' ऐसा व्याहृतिरूप अग्नि
स्तस्मिन्नग्नौ प्रतितिष्ठत्यग्न्यात्मनेमं | है उस अग्निमें स्थित हो जाता है;
| अर्थात् अग्निरूप होकर इस लोक-
लोकं व्याप्नोतीत्यर्थः । तथा भुव | को व्याप्त कर लेता है । इसी प्रकार
इति द्वितीयव्याहृत्यात्मनि वायौ । | वह 'भुवः' इस द्वितीय व्याहृति-
| रूप वायुमें स्थित हो जाता है—इस
प्रतितिष्ठतीत्यनुवर्तते । सुवरिति | प्रकार 'प्रतितिष्ठति' इस क्रियाकी
| अनुवृत्ति की जाती है । तथा [ ऐसे
तृतीयव्याहृत्यात्मन्यादित्ये । मह | ही ] 'सुवः' इस तृतीय व्याहृति-
इत्यङ्गिनि चतुर्थव्याहृत्यात्मनि | रूप आदित्यमें और 'महः' इस
| चतुर्थ व्याहृतिरूप अङ्गी ब्रह्ममें स्थित
ब्रह्मणि प्रतितिष्ठति । | होता है ।
तेष्वात्मभावेन स्थित्वाप्नोति | उनमें आत्मस्वरूपसे स्थित हो वह
[ब्रह्मभूतस्य] ब्रह्मभूतः स्वाराज्यं | ब्रह्मभूत हुआ स्वाराज्य—स्वराड्भावको
[विदुष ऐश्वर्यम्] स्वराड्भावं स्वयमेव | प्राप्त कर लेता है अर्थात् जिस प्रकार
| ब्रह्म अङ्गभूत देवताओंका अधिपति
राजाधिपतिर्भवति । अङ्गभूतानां | है उसी प्रकार स्वयं उनका राजा—
देवानां यथा ब्रह्म । देवाश्च | अधिपति हो जाता है । तथा उसके

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