तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 261 में से
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[संस्कृत-भाष्यम्]
मनो विज्ञानम् मनुतेर्ज्ञान-
कर्मणः, तन्मयस्तत्प्रायस्तदुपल-
भ्यत्वात्। मनुतेऽनेनेति वा मनो-
ऽन्तःकरणं तदभिमानी तन्मय-
स्तल्लिङ्गो वा; अमृतोऽमरणधर्मा
हिरण्मयो ज्योतिर्मयः ।
तस्यैवंलक्षणस्य हृदयाकाशे
(पार्श्व-टिप्पणी: हृदयाकाशस्थ-जीवोपलब्धये मार्गः) साक्षात्कृतस्य विदुष
आत्मभूतस्येन्द्रस्यै-
द्यस्वरूपप्रतिपत्तये
मार्गोऽभिधीयते। हृदयादूर्ध्वं प्रवृ-
त्ता सुषुम्ना नाम नाडी योग-
शास्त्रेषु च प्रसिद्धा । सा चान्त-
रेण मध्ये प्रसिद्धे तालुके तालु-
कयोर्गता । यश्चैष तालुकयोर्मध्ये
स्तन इवावलम्बते मांसखण्डस्त-
स्य चान्तरेणेत्येतत् । यत्र च
केशान्तः केशानामन्तोऽवसानं
मूलं केशान्तो विवर्तते विभागेन
वर्तते मूर्धप्रदेश इत्यर्थः तं देशं
प्राप्य तत्र विनिःसृता व्यपोह्य
विभज्य विदार्य शीर्षकपाले
[हिन्दी-अनुवाद]
—ज्ञानवाची 'मन्' धातुसे सिद्ध होनेके
कारण 'मन' शब्दका अर्थ 'विज्ञान'
है, तन्मय–तत्प्राय अर्थात् विज्ञान-
मय है; क्योंकि उस (विज्ञानस्वरूप)
से ही वह उपलब्ध होता है; अथवा
जिसके द्वारा जीव मनन करता है वह
अन्तःकरण ही 'मन' है उसका अभि-
मानी, तन्मय अथवा उससे उपलक्षित
होनेवाला अमृत—अमरणधर्मा और
हिरण्मय—ज्योतिर्मय है ।
हृदयाकाशमें साक्षात्कार किये
हुए उस ऐसे लक्षणोंवाले तथा विद्वान्-
के आत्मभूत इन्द्र ( ईश्वर ) के ऐसे
स्वरूपकी प्राप्तिके लिये मार्ग बतलाया
जाता है—हृदयदेशसे ऊपरकी ओर
जानेवाली सुषुम्ना नामकी नाडी योग-
शास्त्रमें प्रसिद्ध है । वह 'अन्तरेण
तालुके' अर्थात् दोनों तालुओंके
बीचमें होकर गयी है। और तालुओंके
बीचमें यह जो स्तनके समान मांस-
खण्ड लटका हुआ है उसके भी
बीचमें होकर गयी है । तथा जहाँ यह
केशान्त—केशोंके मूलभागका नाम
'केशान्त' है वह जिस स्थानपर
विभक्त होता है अर्थात् जो मूर्ध-
प्रदेश है, उस स्थानमें पहुँचकर
जो निकल गयी है, अर्थात् जो
शीर्षकपालों—मस्तकके कपालोंको