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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 261 में से

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पृष्ठ 41

अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५


[वाम स्तम्भ / संस्कृत भाष्य]

र्षभत्वमोङ्कारस्य । ओङ्कारो
ह्यत्रोपास्य इति ऋषभादि-
शब्दैः स्तुतिर्न्याय्यैवोङ्कारस्य ।
छन्दोभ्यो वेदेभ्यो वेदा ह्यमृतं
तस्मादमृतादधिसंबभूव । लोक-
देववेदव्याहृतिभ्यः सारिष्ठं
जिघृक्षोः प्रजापतेस्तपस्यत
ओङ्कारः सारिष्ठत्वेन प्रत्यभा-
दित्यर्थः । न हि नित्यस्योङ्कार-
स्याञ्जसैवोत्पत्तिरेव कल्प्यते ।
स एवंभूत ओङ्कार इन्द्रः सर्व-
कामेशः परमेश्वरो मा मां मेधया
प्रज्ञया स्पृणोतु प्रीणयतु बलयतु
वा । प्रज्ञाबलं हि प्रार्थ्यते ।
अमृतस्य अमृतत्वहेतुभूतस्य
ब्रह्मज्ञानस्य तदधिकारात्, हे
देव धारणी धारयिता भूयासं
भवेयम् । किं च शरीरं मे मम
विचर्षणं विचक्षणं योग्यमित्ये-
तत् । भूयादिति प्रथमपुरुष-
विपरिणामः । जिह्वा मे मधु-


[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी भाष्यार्थ]

ओंकारकी श्रेष्ठता है । यहाँ ओंकार
ही उपासनीय है, इसलिये 'ऋषभ'
आदि शब्दोंसे ओंकारकी स्तुति की
जानी उचित ही है । छन्द अर्थात्
वेदोंसे—वेद ही अमृत हैं, उस
अमृतसे जो प्रधानरूपसे हुआ है ।
तात्पर्य यह है कि लोक, देव, वेद
और व्याहृतियोंसे सर्वोत्कृष्ट सार ग्रहण
करनेकी इच्छासे तप करते हुए प्रजा-
पतिको ओंकार ही सर्वोत्तम साररूपसे
भासित हुआ था; क्योंकि नित्य
ओंकारकी साक्षात् उत्पत्तिकी कल्पना
नहीं की जा सकती । वह इस
प्रकारका ओंकाररूप इन्द्र—सम्पूर्ण
कामनाओंका स्वामी परमेश्वर मुझे
मेधाद्वारा प्रसन्न अथवा सबल करे;
इस प्रकार यहाँ बुद्धिबलके लिये
प्रार्थना की जाती है ।
हे देव ! मैं अमृत—अमृतत्वके
हेतुभूत ब्रह्मज्ञानका धारण करने-
वाला होऊँ; क्योंकि यहाँ ब्रह्मज्ञान-
का ही प्रसङ्ग है । तथा मेरा शरीर
विचर्षण—विचक्षण अर्थात् योग्य
हो । [ मूलमें ‘भूयासम्’ (होऊँ) यह
उत्तम पुरुषका प्रयोग है इसे ]
‘भूयात्’ (हो) इस प्रकार प्रथम पुरुष-
में परिणत कर लेना चाहिये । मेरी