तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 45, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
स त्वमपि मा मां भग भगवन् | हो जाऊँ; तथा तू भी, हे भग-
प्रविश । आवयोरेकत्वमेवास्तु । | भगवन् ! मुझमें प्रवेश कर । अर्थात्
| हम दोनोंकी एकता ही हो जाय । हे
तस्मिंस्त्वयि सहस्रशाखे बहु- | भगवन् ! उस सहस्रशाख-अनेकों
शाखाभेदे हे भगवन्, निमृजे | शाखाभेदवाले तुझमें मैं अपने पाप-
शोधयाम्यहं पापकृत्याम् । | कर्मोंका शोधन करता हूँ ।
यथा लोक आपः प्रवता | लोकमें जिस प्रकार जल प्रवण-
प्रवणवता निम्नवता देशेन यन्ति | वान्-निम्नतायुक्त देशकी ओर जाते
गच्छन्ति । यथा च मासा | हैं और महीने जिस प्रकार अहर्जरमें
अहर्जरं संवत्सरोऽहर्जरः । | अन्तर्हित होते हैं। अहर्जर संवत्सर-
अहोभिः परिवर्तमानो लोकान्जर- | को कहते हैं; क्योंकि वह अहः
यतीत्यहानि वास्मिञ्जीर्यन्त्यन्त- | दिनोंके रूपमें परिवर्तित होता हुआ
र्भवन्तीत्यहर्जरः । तं च यथा | लोकोंको जीर्ण करता है अथवा
मासा यन्त्येवं मां ब्रह्मचारिणो | उसमें अहः-दिन जीर्ण यानी
हे धातः सर्वस्य विधातः मामा- | अन्तर्भूत होते हैं इसलिये वह
यन्त्वागच्छन्तु सर्वतः सर्व- | अहर्जर है । उस संवत्सरमें जिस
दिग्भ्यः । | प्रकार महीने जाते हैं उसी प्रकार
| हे धातः ! मेरे पास सब ओरसे-
| सम्पूर्ण दिशाओंसे ब्रह्मचारीलोग
| आवें ।
प्रतिवेशः-श्रमापनयनस्थान- | 'प्रतिवेश' श्रमनिवृत्तिके स्थान
मासन्नगृहमित्यर्थः । एवं त्वं | अर्थात् समीपवर्ती गृहको कहते हैं ।
प्रतिवेश इव प्रतिवेशस्त्वच्छी- | इस प्रकार तू प्रतिवेशके समान प्रति-
लिनां सर्वपापदुःखापनयनस्था- | वेश यानी अपना अनुशीलन करने-
नमसि, अतो मा मां प्रति प्रभाहि | वालोंका दुःखनिवृत्तिका स्थान है ।
| अतः तू मेरे प्रति अपनेको प्रकाशित
प्रकाशयात्मानं प्रपद्यस्व च । | कर और मुझे प्राप्त हो; अर्थात्
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri