तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
मह इति ब्रह्म । ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते ।
भूरिति वै प्राणः । भुव इत्यपानः । सुवरिति व्यानः । मह
इत्यन्नम् । अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते । ता वा
एताश्चतस्रश्चतुर्धा । चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः । ता यो वेद ।
स वेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥ ३ ॥
'भूः, भुवः और सुवः' ये तीन व्याहृतियाँ हैं । उनमेंसे 'महः'
इस चौथी व्याहृतिको माहाचमस्य ( महाचमसका पुत्र ) जानता है ।
वह महः ही ब्रह्म है । वही आत्मा है । अन्य देवता उसके अङ्ग ( अवयव )
हैं । 'भूः' यह व्याहृति यह लोक है, 'भुवः' अन्तरिक्षलोक है
और 'सुवः' यह स्वर्गलोक है ॥ १ ॥ तथा 'महः' आदित्य है । आदित्यसे
ही समस्त लोक वृद्धिको प्राप्त होते हैं । 'भूः' यही अग्नि है, 'भुवः
वायु है, 'सुवः' आदित्य है तथा 'महः' चन्द्रमा है । चन्द्रमासे ही
सम्पूर्ण ज्योतियाँ वृद्धिको प्राप्त होती हैं । 'भूः' यही ऋक् है, 'भुवः'
साम है, 'सुवः' यजुः है ॥ २ ॥ तथा 'महः' ब्रह्म है । ब्रह्मसे ही
समस्त वेद वृद्धिको प्राप्त होते हैं । 'भूः' यही प्राण है, 'भुवः'
अपान है, 'सुवः' व्यान है तथा 'महः' अन्न है । अन्नसे ही समस्त
प्राण वृद्धिको प्राप्त होते हैं । इस प्रकार ये चार व्याहृतियाँ हैं । इनमेंसे
प्रत्येक चार-चार प्रकारकी है । जो इन्हें जानता है वह ब्रह्मको
जानता है । सम्पूर्ण देवगण उसे बलि ( उपहार ) समर्पण करते हैं ॥३॥
भूर्भुवःसुवरिति;इतीत्युक्तोप- | 'भूर्भुवः सुवरिति' इसमें 'इति'
| शब्द पूर्वकथित [ व्याहृतियों ] को
प्रदर्शनार्थः । एता- | ही प्रदर्शित करनेके लिये है;
[हाशिए में: व्याहृतिचतुष्टयम्]
स्तिस्र इति च प्रद- | 'एतास्तिस्रः' ये शब्द भी पूर्व-
| प्रदर्शित [ व्याहृतियों ] के ही
र्शितानां परामर्शार्थः । परामृष्टाः | परामर्शके लिये हैं । 'वै' इस
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri