तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
वक्ष्यमाणार्थत्वान्नोपासनभेदकः । | आगे बतलायी जानेवाली उपासनाके
| लिये होनेके कारण [ पूर्वोक्त
वक्ष्यमाणार्थत्वं च तद्विशेषविव- | उपासनासे ] उसका भेद करने-
| वाला नहीं है । उसी उपासनाको
| आगे बतलाना क्यों इष्ट है यह बात
क्षुत्वादित्यादिनोक्तम् । सर्वे देवा | 'उसकी विशेषता बतलानेकी इच्छा
| होनेके कारण' आदि हेतुओंसे
| पहले कह ही चुके हैं । ऐसा
अस्मा एवं विदुषेऽङ्गभूता आव- | जाननेवाले उपासकको उसके अङ्ग-
| भूत समस्त देवगण बलि ( उपहार )
हन्त्यानयन्ति बलिं स्वाराज्य- | समर्पण करते हैं अर्थात् स्वाराज्यकी
| प्राप्ति हो जानेपर उसके लिये उपहार
प्राप्तौ सत्यामित्यर्थः ॥ १-३ ॥ | लाते हैं—यह इसका तात्पर्य है॥१-३॥
इति शीक्षावल्ल्यां पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥
षष्ठ अनुवाद
ब्रह्मके साक्षात् उपलब्धिस्थान हृदयाकाशका वर्णन
भूर्भुवःसुवःस्वरूपा मह इत्ये- | भूः, भुवः और सुवः-ये अन्य
तस्य व्याहत्यात्मनो ब्रह्मणोऽङ्- | देवता 'महः' इस व्याहृतिरूप हिरण्य-
| गर्भसंज्ञक ब्रह्मके अङ्ग हैं-ऐसा
गान्यन्या देवता इत्युक्तम् । यस्य | पहले कहा जा चुका है । जिसके
ता अङ्गभूतास्तस्यैतस्य ब्रह्मणः | वे अङ्गभूत हैं उस इस ब्रह्मकी साक्षात्
साक्षादुपलब्ध्यर्थमुपासनार्थं च | उपलब्धि और उपासनाके लिये
| हृदयाकाश स्थान बतलाया जाता है,
हृदयाकाशः स्थानमुच्यते शाल- | जैसे कि विष्णुके लिये शालग्राम ।
ग्राम इव विष्णोः । तस्मिन्हि | उसमें उपासना किये जानेपर
तद्ब्रह्मोपास्यमानं मनोमयत्वादि- | ही वह मनोमयत्वादिधर्मविशिष्ट
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