तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
तृतीय अनुवाक
पाँच प्रकारकी संहितोपासना
अधुना संहितोपनिषदुच्यते— | अब संहितासम्बन्धिनी उपनिषत्
( उपासना ) कही जाती है—
सह नौ यशः । सह नौ ब्रह्मवर्चसम् । अथातः
सꣳहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः । पञ्चस्वधिकरणेषु ।
अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम् । ता
महासꣳहिता इत्याचक्षते । अथाधिलोकम् । पृथिवी
पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । आकाशः संधिः ॥ १ ॥
वायुः संधानम् । इत्यधिलोकम् । अथाधि-
ज्यौतिषम् । अग्निः पूर्वरूपम् । आदित्य उत्तररूपम् ।
आपः संधिः । वैद्युतः संधानम् । इत्यधिज्यौतिषम् । अथा-
धिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् ॥ २ ॥
अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या संधिः । प्रवचनꣳ-
संधानम् । इत्यधिविद्यम् । अथाधिप्रजम् । माता पूर्व-
रूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजा संधिः । प्रजननꣳसंधानम् ।
इत्यधिप्रजम् ॥ ३ ॥
अथाध्यात्मम् । अधरा हनुः पूर्वरूपम् । उत्तरा
हनुरुत्तररूपम् । वाक्संधिः । जिह्वा संधानम् । इत्य-
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२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
ध्यात्मम् । इतीमा महासꣳहिता य एवमेता महासꣳहिता
व्याख्याता वेद । संधीयते प्रजया पशुभिः । ब्रह्मवर्चसे-
नान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ॥ ४ ॥
हम [ शिष्य और आचार्य ] दोनोंको साथ-साथ यश प्राप्त हो
और हमें साथ-साथ ब्रह्मतेजकी प्राप्ति हो । [ क्योंकि जिन पुरुषोंकी
बुद्धि शास्त्राध्ययनद्वारा परिमार्जित हो गयी है वे भी परमार्थतत्त्वको समझनेमें
सहसा समर्थ नहीं होते, इसलिये ] अब हम पाँच अधिकरणोंमें
संहिताकी * उपनिषद् [ अर्थात् संहितासम्बन्धिनी उपासना ] की
व्याख्या करेंगे । अधिलोक, अधिज्योतिष, अधिविद्य, अधिप्रज और
अध्यात्म—ये ही पाँच अधिकरण हैं । पण्डितजन उन्हें महासंहिता
कहकर पुकारते हैं । अब अधिलोक ( लोकसम्बन्धी ) दर्शन ( उपासना )
का वर्णन किया जाता है—संहिताका प्रथम वर्ण पृथिवी है, अन्तिम वर्ण
द्युलोक है, मध्यभाग आकाश है ॥ १ ॥ और वायु सन्धान ( उनका
परस्पर सम्बन्ध करनेवाला ) है [ अधिलोक-उपासकको संहितामें इस
प्रकार दृष्टि करनी चाहिये ]—यह अधिलोक दर्शन कहा गया । इसके
अनन्तर अधिज्योतिष दर्शन कहा जाता है—यहाँ संहिताका प्रथम वर्ण
अग्नि है, अन्तिम वर्ण द्युलोक है, मध्यभाग आप ( जल ) है और विद्युत्
सन्धान है [ अधिज्योतिष-उपासकको संहितामें ऐसी दृष्टि करनी
चाहिये ]—यह अधिज्योतिष दर्शन कहा गया । इसके पश्चात् अधिविद्य
दर्शन कहा जाता है—इसकी संहिताका प्रथम वर्ण आचार्य
है ॥ २ ॥ अन्तिम वर्ण शिष्य है, विद्या सन्धि है और प्रवचन ( प्रश्नोत्तर-
रूपसे निरूपण करना ) सन्धान है [—ऐसी अधिविद्य-उपासकको दृष्टि
- 'संहिता' शब्दका अर्थ सन्धि या वर्णोंका सामीप्य है । भिन्न-भिन्न
वर्णोंके मिलनेपर ही शब्द बनते हैं; उनमें जब एक वर्णका दूसरे वर्णसे योग होता
है तो उन पूर्वोत्तर वर्णोंके योगको 'सन्धि' कहते हैं और जिस शब्दोच्चारण-सम्बन्धी
प्रयत्नके योगसे सन्धि होती है उसे 'सन्धान' कहा जाता है ।
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अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
करनी चाहिये ] । यह विद्यासम्बन्धी दर्शन कहा गया । इससे आगे
अधिप्रज दर्शन कहा जाता है—यहाँ संहिताका प्रथम वर्ण माता है,
अन्तिम वर्ण पिता है, प्रजा ( सन्तान ) सन्धि है और प्रजनन ( ऋतु-
कालमें भार्यागमन ) सन्धान है [—अधिप्रज-उपासकको ऐसी दृष्टि करनी
चाहिये ] । यह प्रजासम्बन्धी उपासनाका वर्णन किया गया ॥ ३ ॥
इसके पश्चात् अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—इसमें संहिताका प्रथम
वर्ण नीचेका हनु ( नीचेके होठसे ठोडीतकका भाग ) है, अन्तिम वर्ण
ऊपरका हनु ( ऊपरके होठसे नासिकातकका भाग ) है, वाणी सन्धि है
और जिह्वा सन्धान है [—ऐसी अध्यात्म-उपासकको दृष्टि करनी चाहिये ] ।
यह अध्यात्मदर्शन कहा गया । इस प्रकार ये महासंहिताएँ कहलाती हैं ।
जो पुरुष इस प्रकार व्याख्या की हुई इन महासंहिताओंको जानता है
[ अर्थात् इस प्रकार उपासना करता है ] वह प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज,
अन्न और स्वर्गलोकसे संयुक्त किया जाता है । [ अर्थात् उसे इन सबकी
प्राप्ति होती है ] ॥ ४ ॥
तत्र संहिताद्युपनिषत्परिज्ञा- | उस संहितादि उपनिषद्
[ अर्थात् संहितादिसम्बन्धिनी
ननिमित्तं यद्यशः प्रार्थ्यते तन्ना- | उपासना ] के परिज्ञानके कारण
जिस यशकी याचना की जाती है
वावयोः शिष्याचार्ययोः सहैवा- | वह हम शिष्य और आचार्य दोनोंको
साथ-साथ ही प्राप्त हो । तथा
स्तु । तन्निमित्तं च यद्ब्रह्मवर्चसं | उसके कारण जो ब्रह्मतेज होता है
तेजस्तच्च सहैवास्त्विति शिष्य- | वह भी हम दोनोंको साथ-साथ ही
मिले—इस प्रकार यह कामना शिष्य-
वचनमाशीः । शिष्यस्य ह्यकृतार्थ- | का वाक्य है; क्योंकि अकृतार्थ
होनेके कारण शिष्यके लिये ही
त्वात्प्रार्थनोपपद्यते नाचार्यस्य । | प्रार्थना करना सम्भव भी है—
आचार्यके लिये नहीं; क्योंकि वह
कृतार्थत्वात् । कृतार्थो ह्याचार्यो | कृतार्थ होता है । जो पुरुष कृतार्थ
होता है वही आचार्य कहलाता है ।
नाम भवति । |
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३० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
३० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[वाम स्तम्भ / मूल संस्कृत भाष्य]
अथानन्तरमध्ययनलक्षणवि-
धानस्य, अतो यतोऽत्यर्थं ग्रन्थ-
भाविता बुद्धिर्न शक्यते सहसार्थ-
ज्ञानविषयेऽवतारयितुमित्यतः
संहिताया उपनिषदं संहिताविषयं
दर्शनमित्येतद्ग्रन्थसंनिकृष्टामेव
व्याख्यास्यामः; पञ्चस्वधिकरणे-
ष्वाश्रयेषु ज्ञानविषयेष्वित्यर्थः ।
कानि तानीत्याह—अधिलोकं
लोकेष्वधि यद्दर्शनं तदधिलोकम् ।
तथाधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रज-
मध्यात्ममिति । ता एताः पञ्च-
विषया उपनिषदो लोकादिमहा-
वस्तुविषयत्वात्संहिताविषयत्वाच्च
महत्यश्च ताः संहिताश्च महा-
संहिता इत्याचक्षते कथयन्ति
वेदविदः ।
अथ तासां यथोपन्यस्ताना-
मधिलोकं दर्शनमुच्यते । दर्शन-
[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी अनुवाद]
'अथ' अर्थात् पहले कहे हुए
अध्ययनरूप विधानके अनन्तर,
'अतः'—क्योंकि ग्रन्थके अध्ययनमें
अत्यन्त आसक्त की हुई बुद्धिको
सहसा अर्थज्ञान [ को ग्रहण करने ]
में प्रवृत्त नहीं किया जा सकता,
इसलिये हम ग्रन्थकी समीपवर्तिनी
संहितोपनिषद् अर्थात् संहिता-
सम्बन्धिनी दृष्टिकी पाँच अधिकरण
—आश्रय अर्थात् ज्ञानके विषयोंमें
व्याख्या करेंगे [ तात्पर्य यह कि
वर्णोंके विषयमें पाँच प्रकारके
ज्ञान बतलावेंगे ] ।
वे पाँच अधिकरण कौन-से हैं ?
सो बतलाते हैं—'अधिलोक'—जो
दर्शन लोकविषयक हो उसे अधिलोक
कहते हैं । इसी प्रकार अधिद्यौतिष,
अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म
भी समझने चाहिये । ये पञ्चविषय-
सम्बन्धिनी उपनिषदें लोकादि महा-
वस्तुविषयिणी और संहितासम्बन्धिनी
हैं; इसलिये वेदवेत्तालोग इन्हें महती
संहिता अर्थात् 'महासंहिता'
कहकर पुकारते हैं ।
अब ऊपर बतलायी हुई उन (पाँच
प्रकारकी उपासनाओं) मेंसे पहले
अधिलोक-दृष्टि बतलायी जाती है ।
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अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
[संस्कृत-भाष्य]
क्रमविवक्षार्थोऽथशब्दः सर्वत्र ।
पृथिवी पूर्वरूपं पूर्वो वर्णः पूर्व-
रूपम् । संहितायाः पूर्वे वर्णे
पृथिवीदृष्टिः कर्तव्येत्युक्तं भवति ।
तथा द्यौः उत्तररूपमाकाशोऽन्त-
रिक्षलोकः संधिर्मध्यं पूर्वोत्तर-
रूपयोः संधीयेते अस्मिन्पूर्वोत्तर-
रूपे इति । वायुः संधानम् ।
संधीयतेऽनेनेति संधानम् । इत्य-
धिलोकं दर्शनमुक्तम् । अथाधि-
ज्यौतिषमित्यादि समानम् ।
इतीमा इत्युक्ता उपप्रदर्श्यन्ते ।
यः कश्चिदेवमेता महासंहिता
व्याख्याता वेदोपास्ते । वेदेत्यु-
पासनं स्याद्विज्ञानाधिकारात्
“इति प्राचीनयोग्योपास्स्व” इति
च वचनात् । उपासनं च यथा-
[हिन्दी-भाष्यार्थ]
यहाँ दर्शनक्रम बतलाना इष्ट होनेके कारण 'अथ' शब्दकी सर्वत्र अनुवृत्ति करनी चाहिये । पृथिवी पूर्वरूप है । यहाँ पूर्ववर्ण ही पूर्वरूप कहा गया है । इससे यह बतलाया गया है कि संहिता (सन्धि) के प्रथम वर्णमें पृथिवीदृष्टि करनी चाहिये । इसी प्रकार द्युलोक उत्तररूप (अन्तिम वर्ण) है, आकाश अर्थात् अन्तरिक्ष सन्धि—पूर्व और उत्तररूपका मध्य है अर्थात् इसमें ही पूर्व और उत्तररूप एकत्रित किये जाते हैं । वायु सन्धान है । जिससे सन्धि की जाय उसे सन्धान कहते हैं । इस प्रकार अधिलोक दर्शन कहा गया । इसीके समान 'अथाधिज्यौतिषम्' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ भी समझना चाहिये ।
'इति' और 'इमाः' इन शब्दोंसे पूर्वोक्त दर्शनोंका परामर्श किया जाता है । जो कोई इस प्रकार व्याख्या की हुई इस महासंहिताको जानता अर्थात् उपासना करता है—यहाँ उपासनाका प्रकरण होनेके कारण 'वेद' शब्दसे उपासना समझना चाहिये जैसा कि 'इति प्राचीनयोग्योपास्स्व'¹ इस आगे (१ । ६ । २ में) कहे जानेवाले वचनसे सिद्ध होता है ।
१. हे प्राचीनयोग्य शिष्य ! इस प्रकार तू उपासना कर ।
३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
शास्त्रं तुल्यप्रत्ययसन्ततिरसंकीर्णा
चातत्प्रत्ययैः शास्त्रोक्तालम्बन-
विषया च । प्रसिद्धश्चोपासन-
शब्दार्थो लोके गुरुमुपास्ते
राजानमुपास्त इति । यो हि
गुर्वादीन्सन्ततमुपचरति स उपास्त
इत्युच्यते । स च फलमाप्नोत्यु-
पासनस्य । अतोऽत्रापि च य
एवं वेद संधीयते प्रजादिभिः
स्वर्गान्तैः । प्रजादिफलान्याप्नो-
तीत्यर्थः ॥१–४॥
शास्त्रानुसार समान प्रत्ययके प्रवाहका
नाम 'उपासना' है। वह प्रवाह विजा-
तीय प्रत्ययोंसे रहित और शास्त्रोक्त
आलम्बनको आश्रय करनेवाला होना
चाहिये । लोकमें 'गुरुकी उपासना
करता है' 'राजाकी उपासना करता है'
इत्यादि वाक्योंमें 'उपासना' शब्दका
अर्थ प्रसिद्ध ही है । जो पुरुष गुरु
आदिकी निरन्तर परिचर्या करता
है वही 'उपासना करता है' ऐसा
कहा जाता है । वही उस उपासना-
का फल भी प्राप्त करता है । अतः
इस महासंहिताके सम्बन्धमें भी जो
पुरुष इस प्रकार उपासना करता है
वह [ मन्त्रमें बतलाये हुए ] प्रजासे
लेकर स्वर्गपर्यन्त समस्त पदार्थोंसे
सम्पन्न होता है, अर्थात् प्रजादिरूप
फल प्राप्त करता है ॥ १–४ ॥
इति शीक्षावल्ल्यां तृतीयोऽनुवाकः ॥ ३ ॥
और होमसम्बन्धी मन्त्र
चतुर्थ अनुवाक
श्री और बुद्धिकी कामनावालोंके लिये जप
और होमसम्बन्धी मन्त्र
यश्छन्दसामिति मेधाकाम- | अब 'यश्छन्दसाम्' इत्यादि
मन्त्रोंसे मेधाकामी तथा श्रीकामी
स्य श्रीकामस्य च तत्प्राप्तिसाधनं | पुरुषोंके लिये उनकी प्राप्तिके साधन
जप और होम बतलाये जाते हैं;
जपहोमावुच्येते । “स मेन्द्रो | क्योंकि “वह इन्द्र मुझे मेधासे प्रसन्न
अथवा बलयुक्त करे” तथा “अतः
उस श्रीको तू मेरे पास ला” इन
मेधया स्पृणोतु” “ततो मे श्रिय- | वाक्योंमें [ क्रमशः मेधा और श्री-
प्राप्तिके लिये की गयी प्रार्थनाके ]
मावह” इति च लिङ्गदर्शनात् । | लिङ्ग देखे जाते हैं ।
यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः । छन्दोभ्योऽध्य-
मृतात्संबभूव । स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव
धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे
मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम् । ब्रह्मणः कोशोऽसि
मेधया पिहितः । श्रुतं मे गोपाय । आवहन्ती वितन्वाना ॥१॥
कुर्वाणाचीरमात्मनः । वासाꣳसि मम गावश्च ।
अन्नपाने च सर्वदा । ततो मे श्रियमावह । लोमशां पशुभिः
सह स्वाहा । आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । विमायन्तु
ब्रह्मचारिणः स्वाहा । प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ।
दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । शमायन्तु ब्रह्मचारिणः
स्वाहा ॥ २ ॥
तै० उ० ५–६–
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३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
जो वेदोंमें ऋषभ ( श्रेष्ठ अथवा प्रधान ) और सर्वरूप है तथा
वेदरूप अमृतसे प्रधानरूपसे आविर्भूत हुआ है वह [ ओंकाररूप ] इन्द्र
( सम्पूर्ण कामनाओंका ईश ) मुझे मेधासे प्रसन्न अथवा बलयुक्त करे ।
हे देव ! मैं अमृतत्व ( अमृतत्वके हेतुभूत ब्रह्मज्ञान ) का धारण करने-
वाला होऊँ । मेरा शरीर विचक्षण (योग्य) हो । मेरी जिह्वा अत्यन्त मधुमती
( मधुर भाषण करनेवाली ) हो । मैं कानोंसे खूब श्रवण करूँ । [ हे
ओंकार ! ] तू ब्रह्मका कोष है और लौकिक बुद्धिसे ढँका हुआ है
[ अर्थात् लौकिक बुद्धिके कारण तेरा ज्ञान नहीं होता ] । तू मेरी
श्रवण की हुई विद्याकी रक्षा कर । मेरे लिये वस्त्र, गौ और अन्न-पानको
सर्वदा शीघ्र ही ले आनेवाली और इनका विस्तार करनेवाली श्रीको
[ भेड़-बकरी आदि ] ऊनवाले तथा अन्य पशुओंके सहित बुद्धि प्राप्त
करानेके अनन्तर तू मेरे पास ला—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग मेरे पास
आवें-स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग मेरे प्रति निष्कपट हों—स्वाहा । ब्रह्मचारी-
लोग प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) को धारण करें—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग
दम ( इन्द्रियदमन ) करें—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग शम ( मनोनियम )
करें—स्वाहा । [ इन मन्त्रोंके पीछे जो 'स्वाहा' शब्द है वह इस
बातको सूचित करता है कि ये हवनके लिये हैं ] ॥ १-२ ॥
यश्छन्दसां वेदानाम्पृषभ | जो [ ओंकार ] प्रधान होनेके
कारण छन्द- वेदोंमें श्रेष्ठके समान
ओङ्कारतो बुद्धि- इवर्षभः प्राधान्यात् । श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण वाणीमें व्याप्त
बलं प्रार्थ्यते विश्वरूपः सर्वरूपः होनेके कारण विश्वरूप यानी सर्वमय
है; जैसा कि “जिस प्रकार शङ्कुओं
सर्ववाग्व्याप्तेः । “तद्यथा श- ( पत्तोंकी नसों ) से [ सम्पूर्ण पत्ते
व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओंकारसे
ङ्कना" (छा० उ० २।२३।३) सम्पूर्ण वाणी व्याप्त है-ओंकार ही
यह सब कुछ है ]" इस एक अन्य
इत्यादि श्रुत्यन्तरात् । अत एव- श्रुतिसे सिद्ध होता है । इसीलिये
अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
[वाम स्तम्भ / संस्कृत भाष्य]
र्षभत्वमोङ्कारस्य । ओङ्कारो
ह्यत्रोपास्य इति ऋषभादि-
शब्दैः स्तुतिर्न्याय्यैवोङ्कारस्य ।
छन्दोभ्यो वेदेभ्यो वेदा ह्यमृतं
तस्मादमृतादधिसंबभूव । लोक-
देववेदव्याहृतिभ्यः सारिष्ठं
जिघृक्षोः प्रजापतेस्तपस्यत
ओङ्कारः सारिष्ठत्वेन प्रत्यभा-
दित्यर्थः । न हि नित्यस्योङ्कार-
स्याञ्जसैवोत्पत्तिरेव कल्प्यते ।
स एवंभूत ओङ्कार इन्द्रः सर्व-
कामेशः परमेश्वरो मा मां मेधया
प्रज्ञया स्पृणोतु प्रीणयतु बलयतु
वा । प्रज्ञाबलं हि प्रार्थ्यते ।
अमृतस्य अमृतत्वहेतुभूतस्य
ब्रह्मज्ञानस्य तदधिकारात्, हे
देव धारणी धारयिता भूयासं
भवेयम् । किं च शरीरं मे मम
विचर्षणं विचक्षणं योग्यमित्ये-
तत् । भूयादिति प्रथमपुरुष-
विपरिणामः । जिह्वा मे मधु-
[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी भाष्यार्थ]
ओंकारकी श्रेष्ठता है । यहाँ ओंकार
ही उपासनीय है, इसलिये 'ऋषभ'
आदि शब्दोंसे ओंकारकी स्तुति की
जानी उचित ही है । छन्द अर्थात्
वेदोंसे—वेद ही अमृत हैं, उस
अमृतसे जो प्रधानरूपसे हुआ है ।
तात्पर्य यह है कि लोक, देव, वेद
और व्याहृतियोंसे सर्वोत्कृष्ट सार ग्रहण
करनेकी इच्छासे तप करते हुए प्रजा-
पतिको ओंकार ही सर्वोत्तम साररूपसे
भासित हुआ था; क्योंकि नित्य
ओंकारकी साक्षात् उत्पत्तिकी कल्पना
नहीं की जा सकती । वह इस
प्रकारका ओंकाररूप इन्द्र—सम्पूर्ण
कामनाओंका स्वामी परमेश्वर मुझे
मेधाद्वारा प्रसन्न अथवा सबल करे;
इस प्रकार यहाँ बुद्धिबलके लिये
प्रार्थना की जाती है ।
हे देव ! मैं अमृत—अमृतत्वके
हेतुभूत ब्रह्मज्ञानका धारण करने-
वाला होऊँ; क्योंकि यहाँ ब्रह्मज्ञान-
का ही प्रसङ्ग है । तथा मेरा शरीर
विचर्षण—विचक्षण अर्थात् योग्य
हो । [ मूलमें ‘भूयासम्’ (होऊँ) यह
उत्तम पुरुषका प्रयोग है इसे ]
‘भूयात्’ (हो) इस प्रकार प्रथम पुरुष-
में परिणत कर लेना चाहिये । मेरी
३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
मत्तमा मधुमत्यतिशयेन मधुर- | जिह्वा मधुमत्तमा-अतिशय मधुमती
भाषिणीत्यर्थः । कर्णाभ्यां श्रोत्रा- | अर्थात् अत्यन्त मधुरभाषिणी हो । मैं
भ्यां भूरि बहु विश्रुवं व्यश्रवं | कानोंसे भूरि-अधिक मात्रामें श्रवण
श्रोता भूयासमित्यर्थः । आत्म- | करूँ अर्थात् बड़ा श्रोता होऊँ ।
ज्ञानयोग्यः कार्यकारणसंघातो- | इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि
ऽस्त्विति वाक्यार्थः । मेधा च | मेरा शरीर और इन्द्रियसंधात आत्म-
तदर्थमेव हि प्रार्थ्यते । | ज्ञानके योग्य हो । तथा उसीके
लिये ही बुद्धिकी याचना की जाती है ।
ब्रह्मणः परमात्मनः कोशो- | परमात्माकी उपलब्धिका स्थान
ऽसि । असेरिवोपलब्ध्यधिष्ठान- | होनेके कारण तू तलवारके कोशके
त्वात् । त्वं हि ब्रह्मणः प्रतीकं | समान ब्रह्म यानी परमात्माका कोश
त्वयि ब्रह्मोपलभ्यते । मेधया | है; क्योंकि तू ब्रह्मका प्रतीक है—
लौकिकप्रज्ञया पिहित आच्छा- | तुझमें ब्रह्मकी उपलब्धि होती है ।
दितः स त्वं सामान्यप्रज्ञैरविदि- | वही तू मेधा अर्थात् लौकिकी बुद्धि-
ततत्त्व इत्यर्थः । श्रुतं श्रवणपूर्व- | से आच्छादित यानी ढका हुआ है;
कमात्मज्ञानादिकं मे गोपाय | अर्थात् सामान्य-बुद्धि पुरुषोंको तेरे
रक्ष । तत्प्राप्त्यविस्मरणादि | तत्त्वका ज्ञान नहीं होता । मेरे
कुर्वित्यर्थः । जपार्था एते मन्त्रा | श्रुत अर्थात् श्रवणपूर्वक आत्म-
ज्ञानादि विज्ञानकी रक्षा कर; अर्थात्
उसकी प्राप्ति एवं अविस्मरण आदि
मेधाकामस्य । | कर । ये मन्त्र मेधाकामी पुरुषके जपके लिये हैं ।
होमार्थास्त्वधुना श्रीकामस्य | अब लक्ष्मीकामी पुरुषको होमके
ओङ्कारतः मन्त्रा उच्यन्ते । | लिये मन्त्र बतलाये जाते हैं—आव-
श्रियः प्रार्थना आवहन्त्यानयन्ती । | हन्ती—लानेवाली; वितन्वाना—
वितन्वाना विस्तारयन्ती । तनो- | विस्तार करनेवाली; क्योंकि 'तनु'
अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
| संस्कृत मूल एवं भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तैस्तत्कर्मत्वात् । कुर्वाणा निर्वर्त- | धातुका अर्थ विस्तार करना ही है; |
| यन्ती, अचीरमचिरं क्षिप्रमेव, | कुर्वाणा—करनेवाली; अचीरम्— |
| छान्दसो दीर्घः; चिरं वा कुर्वा- | अचिर अर्थात् शीघ्र ही; 'अचीरम्' में |
| णा आत्मनो मम, किमित्याह— | दीर्घ ईकार वैदिक प्रक्रियाके अनुसार |
| वासांसि वस्त्राणि मम गावश्च | है । अथवा चिरं ( चिरकालतक ) |
| गाश्चेति यावत्, अन्नपाने च | आत्मनः—मेरे लिये करनेवाली, क्या |
| सर्वदैवमादीनि कुर्वाणा श्रीर्या | करनेवाली ? सो बतलाते हैं—मेरे वस्त्र, |
| तां ततो मेधानिर्वर्तनात्परमा- | गौ और अन्न-पान इन्हें जो श्री सदा |
| वहानय । अमेधसो हि श्रीरन- | ही करनेवाली है उसे, बुद्धि प्राप्त |
| र्थायैवेति । | करानेके अनन्तर तू मेरे पास ला; क्योंकि बुद्धिहीनके लिये तो लक्ष्मी अनर्थका ही कारण होती है । |
| किंविशिष्टाम् । लोमशामजाव्या- | किन विशेषणोंसे युक्त श्रीको |
| दियुक्तामन्यैश्च पशुभिः संयुक्ता- | लावे ? लोमश अर्थात् भेड़-बकरी |
| मावहेत्यधिकारादोङ्कार एवाभि- | आदि ऊनवालोंके सहित और अन्य |
| संबध्यते । स्वाहा स्वाहाकारो | पशुओंसे युक्त श्रीको ला । यहाँ 'आवह' क्रियाका अधिकार होनेके कारण [ उसके कर्ता ] ओंकारसे ही सम्बन्ध |
| होमार्थमन्त्रान्तज्ञापनार्थः । आ- | है । स्वाहा—यह स्वाहाकार होमार्थ मन्त्रोंका अन्त सूचित करनेके लिये |
| यन्तु मामिति व्यवहितेन सं- | है । [ 'आ मायन्तु ब्रह्मचारिणः' इस वाक्यमें ] 'आयन्तु माम्' इस प्रकार |
| बन्धः । ब्रह्मचारिणो विमायन्तु | 'आ' का व्यवधानयुक्त 'यन्तु' शब्दसे सम्बन्ध है । [ इसी प्रकार मेरे प्रति ] |
| प्रमायन्तु दमायन्तु शमायन्वित्- | ब्रह्मचारीलोग निष्कपट हों । वे प्रमा- |
| त्यादि ॥१-२॥ | को धारण करें, इन्द्रिय-निग्रह करें, मनोनिग्रह करें, इत्यादि ॥ १-२ ॥ |
३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
यशो जनेऽसानि स्वाहा । श्रेयान् वस्यसोऽसानि
स्वाहा । तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा । स मा भग प्रविश
स्वाहा । तस्मिन् सहस्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा ।
यथापः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम् । एवं मां
ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा । प्रतिवेशोऽसि
प्र मा पाहि प्र मा पद्यस्व ॥ ३ ॥
मैं जनतामें यशस्वी होऊँ—स्वाहा । मैं अत्यन्त प्रशंसनीय और
धनवान् होऊँ—स्वाहा । हे भगवन् ! मैं उस ब्रह्मकोशभूत तुझमें प्रवेश कर
जाऊँ—स्वाहा । हे भगवन् ! वह तू मुझमें प्रवेश कर--स्वाहा । हे भगवन् !
उस सहस्रशाखायुक्त [ अर्थात् अनकों भेदवाले ] तुझमें मैं अपने पापा-
चरणोंका शोधन करता हूँ—स्वाहा । जिस प्रकार जल निम्न प्रदेशकी
ओर जाता है तथा महीने अहर्जर—संवत्सरमें अन्तर्हित हो जाते हैं,
उसी प्रकार हे धातः ! ब्रह्मचारीलोग सब ओरसे मेरे पास आवें--
स्वाहा । तू [ शरणागतोंका ] आश्रयस्थान है अतः मेरे प्रति भासमान
हो, तू मुझे प्राप्त हो ॥ ३ ॥
यशो यशस्वी जने जनसमूहे- | मैं जनतामें यशस्वी होऊँ तथा
ऽसानि भवानि। श्रेयान्प्रशस्यतरो | श्रेयान्-प्रशस्यतर और वस्यसः-
वस्यसो वसीयसो वसुतराद्वसुमत्त- | वसीयसः अर्थात् वसुमान्से भी
राद्वासानीत्यन्वयः । किं च तं | वसुमान् यानी अत्यन्त धनी पुरुषों-
से भी विशेष धनवान् होऊँ । तथा
ब्रह्मणः कोशभूतं त्वा त्वां हे भग | हे भग-भगवन्-पूजनीय ! ब्रह्मके
कोशभूत उस तुझमें मैं प्रवेश करूँ;
भगवन्पूज्यावन्प्रविशानि प्रविश्य | तात्पर्य यह है कि तुझमें प्रवेश करके
चानन्यस्त्वदात्मैव भवानीत्यर्थः। | तुझसे अनन्य हो मैं तेरा ही रूप
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अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
स त्वमपि मा मां भग भगवन् | हो जाऊँ; तथा तू भी, हे भग-
प्रविश । आवयोरेकत्वमेवास्तु । | भगवन् ! मुझमें प्रवेश कर । अर्थात्
| हम दोनोंकी एकता ही हो जाय । हे
तस्मिंस्त्वयि सहस्रशाखे बहु- | भगवन् ! उस सहस्रशाख-अनेकों
शाखाभेदे हे भगवन्, निमृजे | शाखाभेदवाले तुझमें मैं अपने पाप-
शोधयाम्यहं पापकृत्याम् । | कर्मोंका शोधन करता हूँ ।
यथा लोक आपः प्रवता | लोकमें जिस प्रकार जल प्रवण-
प्रवणवता निम्नवता देशेन यन्ति | वान्-निम्नतायुक्त देशकी ओर जाते
गच्छन्ति । यथा च मासा | हैं और महीने जिस प्रकार अहर्जरमें
अहर्जरं संवत्सरोऽहर्जरः । | अन्तर्हित होते हैं। अहर्जर संवत्सर-
अहोभिः परिवर्तमानो लोकान्जर- | को कहते हैं; क्योंकि वह अहः
यतीत्यहानि वास्मिञ्जीर्यन्त्यन्त- | दिनोंके रूपमें परिवर्तित होता हुआ
र्भवन्तीत्यहर्जरः । तं च यथा | लोकोंको जीर्ण करता है अथवा
मासा यन्त्येवं मां ब्रह्मचारिणो | उसमें अहः-दिन जीर्ण यानी
हे धातः सर्वस्य विधातः मामा- | अन्तर्भूत होते हैं इसलिये वह
यन्त्वागच्छन्तु सर्वतः सर्व- | अहर्जर है । उस संवत्सरमें जिस
दिग्भ्यः । | प्रकार महीने जाते हैं उसी प्रकार
| हे धातः ! मेरे पास सब ओरसे-
| सम्पूर्ण दिशाओंसे ब्रह्मचारीलोग
| आवें ।
प्रतिवेशः-श्रमापनयनस्थान- | 'प्रतिवेश' श्रमनिवृत्तिके स्थान
मासन्नगृहमित्यर्थः । एवं त्वं | अर्थात् समीपवर्ती गृहको कहते हैं ।
प्रतिवेश इव प्रतिवेशस्त्वच्छी- | इस प्रकार तू प्रतिवेशके समान प्रति-
लिनां सर्वपापदुःखापनयनस्था- | वेश यानी अपना अनुशीलन करने-
नमसि, अतो मा मां प्रति प्रभाहि | वालोंका दुःखनिवृत्तिका स्थान है ।
| अतः तू मेरे प्रति अपनेको प्रकाशित
प्रकाशयात्मानं प्रपद्यस्व च । | कर और मुझे प्राप्त हो; अर्थात्
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४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
मां रसविद्धमिव लोहं तन्मयं | पारदसंयुक्त लोहेके समान तू मुझे
त्वदात्मानं कुर्वित्यर्थः । | अपनेसे अभिन्न कर ले ।
श्रीकामोऽस्मिन्विद्याप्रकरणे- | इस ज्ञानके प्रकरणमें जो लक्ष्मी-
<sub>विद्योपलब्धौ धनस्योपयोगः</sub> ऽभिधीयमानो धना- | की कामना कही जाती है वह धनके
र्थः । धनं च कर्मा- | लिये है, धन कर्मके लिये होता है,
र्थम् । कर्म चोपात्तदुरितक्षयाय । | और कर्म प्राप्त हुए पापोंके क्षयके
तत्क्षये हि विद्या प्रकाशते । तथा | लिये है । उनके क्षीण होनेपर ही
च स्मृतिः "ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां | ज्ञानका प्रकाश होता है; जैसा कि
क्षयात्पापस्य कर्मणः । यथादर्श- | यह स्मृति भी कहती है—"पाप-
तले प्रख्ये पश्यन्त्यात्मान- | कर्मोंका क्षय हो जानेपर ही पुरुष-
मात्मनि" (महा० शा० २०४ । | को ज्ञान होता है । जिस प्रकार
८, गरुड० १ । २३७ । ६ ) | दर्पणके स्वच्छ हो जानेपर उसमें
इति ॥ ३ ॥ | मुख देखा जा सकता है उसी प्रकार शुद्ध अन्तःकरणमें आत्माका साक्षात्कार होता है" ॥ ३ ॥
इति शीक्षावल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥
मन्त्रा अनुक्रान्ताः । ते च पार- | श्रीकामी पुरुषोंके लिये मन्त्र बतलाये
पञ्चम अनुवाक
व्याहृतिरूप ब्रह्मकी उपासना
संहिताविषयमुपासनमुक्तं त- | पहले संहितासम्बन्धिनी
दनु मेधाकामस्य श्रीकामस्य | उपासनाका वर्णन किया गया ।
तत्पश्चात् मेधाकी कामनावाले तथा
मन्त्रा अनुक्रान्ताः । ते च पार- | श्रीकामी पुरुषोंके लिये मन्त्र बतलाये
म्पर्येण विद्योपयोगार्था एव । | गये । वे भी परम्परासे ज्ञानके
अनन्तरं व्याहृत्यात्मनो ब्रह्मणो- | उपयोगके लिये ही हैं । उसके
पश्चात् अब जिसका फल स्वाराज्य
ऽन्तरुपासनं स्वाराज्यफलं प्र- | है उस व्याहृतिरूप ब्रह्मकी आन्तरिक
स्तूयते— | उपासनाका आरम्भ किया जाता है—
भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः ।
तासामु ह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते ।
मह इति । तद्ब्रह्म । स आत्मा । अङ्गान्यन्या देवताः ।
भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम् । सुवरित्यसौ
लोकः ॥ १ ॥
मह इत्यादित्यः । आदित्येन वाव सर्वे लोका
महीयन्ते । भूरिति वा अग्निः । भुव इति वायुः । सुवरित्या-
दित्यः । मह इति चन्द्रमाः । चन्द्रमसा वाव सर्वाणि
ज्योतींषि महीयन्ते । भूरिति वा ऋचः । भुव इति
सामानि । सुवरिति यजूंषि ॥ २ ॥
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४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
मह इति ब्रह्म । ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते ।
भूरिति वै प्राणः । भुव इत्यपानः । सुवरिति व्यानः । मह
इत्यन्नम् । अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते । ता वा
एताश्चतस्रश्चतुर्धा । चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः । ता यो वेद ।
स वेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥ ३ ॥
'भूः, भुवः और सुवः' ये तीन व्याहृतियाँ हैं । उनमेंसे 'महः'
इस चौथी व्याहृतिको माहाचमस्य ( महाचमसका पुत्र ) जानता है ।
वह महः ही ब्रह्म है । वही आत्मा है । अन्य देवता उसके अङ्ग ( अवयव )
हैं । 'भूः' यह व्याहृति यह लोक है, 'भुवः' अन्तरिक्षलोक है
और 'सुवः' यह स्वर्गलोक है ॥ १ ॥ तथा 'महः' आदित्य है । आदित्यसे
ही समस्त लोक वृद्धिको प्राप्त होते हैं । 'भूः' यही अग्नि है, 'भुवः
वायु है, 'सुवः' आदित्य है तथा 'महः' चन्द्रमा है । चन्द्रमासे ही
सम्पूर्ण ज्योतियाँ वृद्धिको प्राप्त होती हैं । 'भूः' यही ऋक् है, 'भुवः'
साम है, 'सुवः' यजुः है ॥ २ ॥ तथा 'महः' ब्रह्म है । ब्रह्मसे ही
समस्त वेद वृद्धिको प्राप्त होते हैं । 'भूः' यही प्राण है, 'भुवः'
अपान है, 'सुवः' व्यान है तथा 'महः' अन्न है । अन्नसे ही समस्त
प्राण वृद्धिको प्राप्त होते हैं । इस प्रकार ये चार व्याहृतियाँ हैं । इनमेंसे
प्रत्येक चार-चार प्रकारकी है । जो इन्हें जानता है वह ब्रह्मको
जानता है । सम्पूर्ण देवगण उसे बलि ( उपहार ) समर्पण करते हैं ॥३॥
भूर्भुवःसुवरिति;इतीत्युक्तोप- | 'भूर्भुवः सुवरिति' इसमें 'इति'
| शब्द पूर्वकथित [ व्याहृतियों ] को
प्रदर्शनार्थः । एता- | ही प्रदर्शित करनेके लिये है;
[हाशिए में: व्याहृतिचतुष्टयम्]
स्तिस्र इति च प्रद- | 'एतास्तिस्रः' ये शब्द भी पूर्व-
| प्रदर्शित [ व्याहृतियों ] के ही
र्शितानां परामर्शार्थः । परामृष्टाः | परामर्शके लिये हैं । 'वै' इस
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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
स्मार्यन्ते वा इत्यनेन । तिस्र एताः | अव्ययसे परामृष्ट व्याहृतियोंका
| स्मरण कराया जाता है। अर्थात्
प्रसिद्धा व्याहृतयः स्मार्यन्ते | [इन शब्दोंसे] ये तीन प्रसिद्ध
| व्याहृतियाँ स्मरण दिलायी जाती
तावत् । तासामियं चतुर्थी | हैं। उनमें 'महः' यह चौथी
व्याहृतिर्मह इति । तामेतां चतुर्थी | व्याहृति है । उस इस चौथी
| व्याहृतिको महाचमसका पुत्र माहा-
महाचमसस्यापत्यं माहाचमस्यः | चमस्य जानता है । किन्तु 'उ ह
| स्म' ये तीन निपात अतीत घटना-
प्रवेदयते । उ ह स्म इत्येतेषां वृत्ता- | का अनुकथन करनेके लिये होनेके
| कारण इसका अर्थ 'जानता था'
नुकथनार्थत्वाद्विदितवान्ददर्श- | 'देखा था' इस प्रकार होगा ।
त्यर्थः । माहाचमस्यग्रहणमार्षा- | [व्याहृतिके द्रष्टा] ऋषिका अनु-
| स्मरण करनेके लिये 'माहाचमस्य'
नुस्मरणार्थम् । ऋषिसंस्मरणमप्यु- | यह नाम लिया गया है । इस प्रकार
| यहाँ उपदेश होनेके कारण यह
पासनाङ्कमिति गम्यत इहो- | जाना जाता है कि ऋषिका अनु-
पदेशात् । | स्मरण भी उपासनाका एक अङ्ग है।
येयं माहाचमस्येन दृष्टा व्या- | जिस 'महः' नामक व्याहृतिको
| माहाचमस्यने देखा था वह ब्रह्म है ।
[व्याहृतिषु महसः] हृतिर्मह इति तद्ब्रह्म । | ब्रह्म भी महान् है और व्याहृति भी
[प्राधान्यम्] महद्धि ब्रह्म महश्च | महः है। और वह क्या है? वही
| आत्मा है । 'व्याप्ति' अर्थवाले
व्याहृतिः। किं पुनस्तत् ? स आत्मा। | 'आप्' धातुसे 'आत्मा' शब्द
आप्नोतेर्व्याप्तिकर्मणः आत्मा । | निष्पन्न होता है । क्योंकि लोक,
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४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
इतराश्च व्याहृतयो लोका देवा | देव, वेद और प्राणरूप अन्य
वेदाः प्राणाश्च मह इत्यनेन | व्याहृतियाँ आदित्य, चन्द्र, ब्रह्म एवं
व्याहृत्यात्मनादित्यचन्द्रब्रह्मान्न- | अन्नस्वरूप व्याहृत्यात्मक महःसे
भूतेन व्याप्यन्ते यतः अतो- | व्याप्त हैं, इसलिये वे अन्य देवता
ऽङ्गान्यवयवा अन्या देवताः। | इसके अंग—अवयव हैं । यहाँ
देवताग्रहणमुपलक्षणार्थं लोका- | लोकादिका उपलक्षण करानेके लिये
दीनाम् । मह इत्येतस्य व्या- | 'देवता' शब्दका ग्रहण किया
हृत्यात्मनो देवलोकादयः सर्वे- | गया है। क्योंकि देव और लोक
ऽवयवभूता यतोऽत आहादित्या- | आदि सभी 'महः' इस व्याहृत्यात्माके
दिभिर्लोकादयो महीयन्ते इति । | अवयवस्वरूप हैं, इसीलिये ऐसा
आत्मनो ह्यङ्गानि महीयन्ते, महनं | कहा है कि आदित्यादिके योगसे
वृद्धिरुपचयः । महीयन्ते वर्धन्त | लोकादि महत्ताको प्राप्त होते हैं ।
इत्यर्थः । | आत्मासे ही अङ्ग महत्ताको प्राप्त
| हुआ करते हैं । 'महन' शब्दका
| अर्थ वृद्धि—उपचय है । अतः
| 'महीयन्ते' इसका 'वृद्धिको प्राप्त
| होते हैं' यह अर्थ है ।
अयं लोकोऽग्निर्ऋग्वेदः प्राण | यह लोक, अग्नि, ऋग्वेद और
प्रतिव्याहृति चत्वारो भेदाः इति प्रथमा व्याहृति- | प्राण—ये पहली व्याहृति भूः हैं; इसी
भूरिति । एवमुत्त- | प्रकार उत्तरोत्तर प्रत्येक व्याहृति चार-
रोत्तरैकैका चतुर्धा भवति । | चार प्रकारकी है ।* 'महः' ब्रह्म
मह इति ब्रह्म । ब्रह्मेत्योङ्कारः, | है; ब्रह्मका अर्थ ओंकार है; क्योंकि
शब्दाधिकारेऽन्यस्यासंभवात् । | शब्दके प्रकरणमें अन्य किसी ब्रह्म-
उक्तार्थमन्यत् । | का होना असम्भव है । शेष सबका
| अर्थ पहले कहा जा चुका है ।
* यथा अन्तरिक्षलोक, वायु, सामवेद और अपान—ये दूसरी व्याहृति
भुवः हैं; द्युलोक, आदित्य, यजुर्वेद और व्यान—ये तीसरी व्याहृति सुवः हैं;
तथा आदित्य, चन्द्रमा, ब्रह्म और अन्न—ये चौथी व्याहृति महः हैं ।
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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धेति । | वे ये चारों व्याहृतियाँ चार प्रकारकी हैं । अर्थात् वे ये भूः, भुवः, सुवः और महः चार व्याहृतियाँ प्रत्येक चार-चार प्रकारकी हैं । 'धा' शब्द 'प्रकार' का वाचक है । अर्थात् वे चार-चार होती हुई चार प्रकारकी हैं । उनकी जिस प्रकार पहले कल्पना की गयी है उसी प्रकार उपासना करनेका नियम करनेके लिये उनका पुनः उपदेश किया गया है । उन उपर्युक्त व्याहृतियोंको जो पुरुष जानता है वही जानता है । किसे जानता है ? ब्रह्मको ।
ता वा एता भूर्भुवः सुवर्मह इति
चतस्र एकैकशश्चतुर्धा चतुष्प्र-
काराः । धाशब्दः प्रकारवचनः ।
चतस्रश्चतस्रः सत्यश्चतुर्धा भव-
न्तीत्यर्थः । तासां यथाक्लृप्तानां
पुनरुपदेशस्तथैवोपासननियमार्थः।
ता यथोक्तव्याहृतीर्यो वेद स
वेद विजानाति । किम् ? ब्रह्म ।
ननु “तद्ब्रह्म स आत्मा” इति | शङ्का- "वह ब्रह्म है, वह आत्मा है" इस वाक्यद्वारा [ महः रूपसे ] ब्रह्मको जान लेनेपर भी उसे न जाननेके समान '[ उसे जो जानता है ] वह ब्रह्मको जानता है' ऐसा कहना तो ठीक नहीं है ।
ज्ञाते ब्रह्मणि न वक्तव्यमविज्ञात-
वत्स वेद ब्रह्मेति ।
न; तद्विशेषविवक्षुत्वाद- | समाधान-ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उस [ ब्रह्मविषयक ज्ञान ] के विषयमें विशेष कहना अभीष्ट होनेके कारण इस प्रकार कहनेमें कोई दोष नहीं है । यह ठीक है कि इतना तो जान लिया कि चतुर्थ व्याहृतिरूप ब्रह्म है; किन्तु हृदयके भीतर उपलब्ध होना तथा मनो- मयत्वादिरूप उसकी विशेषताओंका
दोषः । सत्यं विज्ञातं
[पञ्चमषष्ठानु-वाक्ययोरेकवाक्यता] चतुर्थव्याहृत्यात्मा
ब्रह्मेति न तु तद्विशेषो हृदयान्त-
रुपलभ्यत्वं मनोमयत्वादिश्च ।
४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
'शान्तिसमृद्धम्' इत्येवमन्तो | तो ज्ञान नहीं हुआ । [अगले अनुवाक-
विशेषणविशेष्यरूपो धर्मपूगो न | में ] 'शान्तिसमृद्धम्' इस वाक्यतक
विज्ञायत इति तद्विवक्षु हि | कहा हुआ विशेषण-विशेष्यरूप धर्म-
शास्त्रमविज्ञातमिव ब्रह्म मत्वा स | समूह ज्ञात नहीं है; उसे बतलानेकी
वेद ब्रह्मेत्याह । अतो न दोषः । | इच्छासे ही शास्त्रने ब्रह्मको न जाने
यो हि वक्ष्यमाणेन धर्मपूगेन | हुएके समान मानकर 'वह ब्रह्मको
विशिष्टं ब्रह्म वेद स वेद ब्रह्मे- | जानता है' ऐसा कहा है । इसलिये
त्यभिप्रायः । अतो वक्ष्यमाणा- | इसमें कोई दोष नहीं है । इसका
नुवाके नैकवाक्यतास्य; उभयोर्ह्य- | अभिप्राय यह है कि जो पुरुष आगे
नुवाकयोरेकमुपासनम् । | बतलाये जानेवाले धर्मसमूहसे
| विशिष्ट ब्रह्मको जानता है वही
लिङ्गाच्च, भूरित्यग्नौ प्रति- | ब्रह्मको जानता है । अतः आगे
| कहे जानेवाले अनुवाकसे इसकी
तिष्ठतीत्यादिकं लिङ्गमुपासने- | एकवाक्यता है; क्योंकि इन दोनों
| अनुवाकोंकी एक ही उपासना है ।
कत्वे । विधायकाभावाच्च । न हि | [ ज्ञापक ] लिङ्ग होनेसे भी यही
| बात सिद्ध होती है । [ छठे
| अनुवाकमें ] 'भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति'
'वेद' 'उपासितव्यः' इति विधा- | इत्यादि फलश्रुति इन दोनों अनुवाकोंमें
| एक ही उपासना होनेका लिङ्ग है ।
यकः कश्चिच्छब्दोऽस्ति। व्याहृत्य- | कोई विधान करनेवाला शब्द न
| होनेके कारण भी ऐसा ही समझा
| जाता है । [ छठे अनुवाकमें ] 'वेद'
नुवाके 'ता यो वेद' इति च | 'उपासितव्यः' ऐसा कोई [ उपासना-
| का ] विधान करनेवाला शब्द
| नहीं है । व्याहृति-अनुवाकमें
| जो 'उन ( व्याहृतियों ) को जो
| जानता है' ऐसा वाक्य है वह
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