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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

Contents

विषयसूची
पृष्ठ से पृष्ठ तक
प्रणाम क— ग
प्राक्कथन घ— ढ
१. तत्त्वविवेकप्रकरण १— ३२
२. पंचभूतविवेकप्रकरण ३३— ७१
३. पंचकोशविवेकप्रकरण ७२— ९०
४. द्वैतविवेकप्रकरण ९१—११७
५. महावाक्यविवेकप्रकरण ११८—१२३
६. चित्रदीपप्रकरण १२४—२२१
७. तृप्तिदीपप्रकरण २२२—३२९
८. कूटस्थदीपप्रकरण ३३०—३५५
९. ध्यानदीपप्रकरण ३५६—४०४
१०. नाटकदीपप्रकरण ४०५—४१३
११. ब्रह्मानन्द में योगानन्दप्रकरण ४१४—४६७
१२. ब्रह्मानन्द में आत्मानन्दप्रकरण ४६८—५००
१३. ब्रह्मानन्द में अद्वैतानन्दप्रकरण ५०१—५३७
१४. ब्रह्मानन्द में विद्यानन्दप्रकरण ५३८—५५६
१५. ब्रह्मानन्द में विषयानन्दप्रकरण ५५७—५६६
१६. पंचदशी के प्रत्येक प्रकरण के भावपूर्ण संक्षेप १—१३८

अद्वैतवाद पर कुछ उपयुक्त ग्रन्थावलि

'उपनिषदें | वैज्ञानिक अद्वैतवाद
भगवद्गीता उपनिषत् | संक्षेप शारीरक
शारीरक भाष्य | वाक्यसुधा
शंकराचार्य के प्रकरणग्रन्थ | उपदेश-साहस्री
पंचदशी | सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह
दक्षिणामूर्ति और वार्तिक | विवेक-चूड़ामणि
पंचीकरण और वार्तिक | बोधसार
आत्मपुराण | स्वामी रामतीर्थ के लेख आदि
भागवत | योगवासिष्ठ
अनुभूतिप्रकाश | सनत्सुजात संवाद(शंकराचार्य
दासबोध | कृत टीका)
त्रिपुरारहस्य | ज्ञानेश्वरी गीता टीका
वार्तिकसार | अध्यात्म पटल
जीवन्मुक्तिविवेक | स्वराज्य सिद्धि
उपनिषदों के उपदेश | शतश्लोकी

1. Tattvaviveka

ओम्
पञ्चदशी
तत्त्वविवेकप्रकरणम्
नमः श्रीशंकरानन्दगुरुपादाम्बुजन्मने ।
सविलासमहामोहग्राहग्रासैककर्मणे ॥ १ ॥
विलास [अर्थात् अपने कार्य] सहित जो महामोह [किंवा
मूलाज्ञान] रूपी महादुःखदायी ग्राह है, उस को ग्रस लेना ही
जिस चरण-कमल का एक मुख्य काम है, श्री शंकरानन्द
नाम के गुरुदेव के उस चरण-कमल को हमारा प्रणाम हो—
अर्थात् हम अपने आप को गुरुदेव के चरणों में अभेद भाव से
अर्पण किये देते हैं ।
तत्पादाम्बुरुहद्वन्द्वसेवनिर्मलचेतसाम् ।
सुखबोधाय तत्वस्य विवेकोऽयं विधीयते ॥२॥
ऐसे गुरु के चरण-कमलों की सेवा से जिनका चित्त निर्मल
[रागादि शून्य] हो चुका हो, उनको सुखबोध [सरलता से तत्व-
ज्ञान] कराने के लिए, अब तत्व [अनारोपित किंवा सत्यस्वरूप]
का विवेचन किया जाता है । [पंचकोश नाम के इस आरोपित
जगत् में से अब उस अनारोपितस्वरूप अखण्ड सच्चिदानन्द
वस्तु को पृथक् करके दिखाया जाता है] ।

२ पञ्चदशी
शब्दस्पर्शादयो वेद्या वैचित्र्याज्जागरे पृथक् ।
ततो विभक्ता तत्संविदैकरूप्यान्न भिद्यते ॥३॥
जागरण अवस्था में, शब्द स्पर्श आदि वेद्य पदार्थ विचित्रता के
कारण पृथक्-पृथक् होते हैं, परन्तु उनका ज्ञान उनसे विभक्त रहना
है। एक रूप होने के कारण उस ज्ञान में कभी भेद नहीं होता।
इन्द्रियों से विषयों के ग्रहण को ‘जागरण’ कहते हैं। उस
जागरण नाम की अवस्था में वेद्य कहलाने वाले जो शब्द स्पर्श
आदि पदार्थ हैं तथा उनके आश्रय जो आकाशादि पदार्थ हैं, वे
विचित्रता के कारण परस्पर भिन्न भिन्न होते हैं। परन्तु उन
शब्दादियों का [बुद्धि की सहायता लेकर उनसे पृथक् किया
हुआ] ज्ञान, एक ही रूप का होने के कारण, अथवा ज्ञान-ज्ञान-
ज्ञान-इस समान रूप से प्रतीत होने के कारण, आकाश के समान
ही भिन्न नहीं हो जाता। दूसरे शब्दों में इसे यों कहना चाहिये
कि ज्ञान में स्वभाव से कोई भेद ही नहीं है। क्योंकि आकाश
के समान उपाधि के परामर्श [कथन] के बिना उसमें भेद की
संभावना ही नहीं रहती। शब्द-ज्ञान में स्पर्श-ज्ञान से स्वयं कोई
भेद नहीं है, क्योंकि ज्ञान ज्ञान सब एक से ही होते हैं। उनमें
जो भेद प्रतीत होने लगा है, वह तो औपाधिक भेद है। ऐसे
तो एक अखण्ड आकाश में भी घटाकाश मठाकाश आदि भेद
पाये जाते हैं। परन्तु वह सच्चे भेद नहीं होते। उन औपाधिक
भेदों से जैसे आकाश में भेद नहीं आता, इसी प्रकार औपाधिक
भेदों से ज्ञान में भी भेद को अवकाश नहीं मिलता।
तथा स्वप्ने, ऽत्र वेद्यं तु न स्थिरं जागरे स्थिरम् ।
तद्भेदात्तत्तयोः संविदेकरूपा न भिद्यते ॥४॥

तत्त्वविवेकप्रकरणम् ३
स्वप्न में भी यही होता है, [वहां भी ज्ञान में भेद नहीं होता।
विशेषता इतनी है कि] इस स्वप्न-काल में वेद्य पदार्थ स्थिर नहीं
होते, [प्रातिभासिक होते हैं] जागरण में तो वे स्थिर [व्यावहा-
रिक] होते हैं। इस कारण स्वप्न और जागरण का तो भेद हो
जाता है। परन्तु इन दोनों अवस्थाओं में होने वाला 'ज्ञान' तो
एकरूप ही है। इसी से उसमें भेद नहीं होता।
जिस प्रकार जागरण में विचित्रता के कारण, विषयों का
तो भेद है, तथा एकरूपता के कारण ज्ञान का अभेद है, ठीक
यही अवस्था स्वप्न की भी है। इन्द्रियों का उपसंहार हो जाने पर
जागरण के संस्कारों से उत्पन्न हुआ विषय सहित ज्ञान 'स्वप्न'
कहाता है। उस स्वप्नावस्था में भी केवल विषय ही परस्पर भिन्न
होते हैं। ज्ञान में तब भी कोई भेद नहीं होता। स्वप्न और जाग-
रण में भेद तो केवल इतना ही है कि स्वप्न में दृश्यमान वेद्य
पदार्थ स्थिर नहीं होते, वे केवल प्रातीतिक होते हैं। जागरण में
तो दीखने वाली वस्तुयें स्थायी होती हैं। वे कालान्तर में भी देखी
जा सकती हैं। केवल अस्थिरता और स्थिरता के कारण ही इन
दोनों में भेद है। परन्तु उन दोनों के ज्ञान में भेद नहीं है क्योंकि
वह तो एकरूप ही है।
सुप्तोत्थितस्य सौषुप्ततमोबोधो भवेत् स्मृतिः ।
सा चावबुद्धविषयाऽवबुद्धं तत्तदा तमः ॥५॥
सोकर उठे हुए पुरुष को जब सुषुप्ति काल के अज्ञान का
बोध होता है तो वह उसकी स्मृति होती है, वह स्मृति जाने बूझे
विषय की ही होती है। [ जिसका मतलब वह है कि ] उसने
सोते समय तम अथवा अज्ञान को जाना था।

४ पञ्चदशी
सोकर उठे हुए पुरुष को जो सुषुप्ति काल के अज्ञान का ज्ञान
है जिससे वह कहता है कि 'मैंने सोते समय कुछ भी जाना नहीं'
वह उसका एक स्मरण ही है । वह स्मरण तो अनुभव किये हुए
विषय का ही होता है । जो भी कोई स्मृति होती है उससे प्रथम
अनुभव का होना सर्वमान्य सिद्धान्त है । इससे यही सिद्ध होता
है कि सुषुप्ति में रहने वाले उस तम को अर्थात् अज्ञान को तत
उसने अनुभव किया था।
स बोधो विषयाद्भिन्नो न बोधात् स्वप्नबोधवत् ।
एवं स्थानत्रयेऽप्येका संवित् तद्वद्दिनान्तरे ॥६॥
मासाब्दयुगकल्पेषु गतागम्येष्वनेकधा ।
नोदेति नास्तमेत्येका संविदेषा स्वयंप्रभा ॥७॥
सुषुप्ति समय का वह ज्ञान अपने विषय [सुषुप्तिकाल के
अज्ञान] से तो भिन्न होता है परन्तु वह (स्वप्नबोध) के समान् ही
बोध से भिन्न कदापि नहीं होता । इस प्रकार एक दिन की जाग्र-
दादि तीनों अवस्थाओं में, दूसरे दिनों में, मास, वर्ष, युग तथा
कल्पों तक में, जो बीत चुके या आगे आयेंगे, एक ही ज्ञान बना
रहता है । इसका कभी उदय या विनाश नहीं होता । यह ज्ञान
एक स्वयंप्रकाश तत्व है ।
सुषुप्ति काल के अज्ञान का वह बोध [अनुभव] भी अपने
अज्ञान नाम के विषय से भिन्न तो होना ही चाहिये। परन्तु स्वप्नबोध
के समान दूसरे बोध से [उसके] भिन्न होने का कोई कारण ही
नहीं है । इस प्रकार एक दिन की जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं में
एक ही ज्ञान रहता है । इसी रीति से दूसरे दिन में भी ज्ञान की
अभिन्नता को समझ लेना चाहिये । जैसे एक दिन की तीनों अव-

तत्त्वविवेकप्रकरणम् ५
स्थाओं में एक ही ज्ञान बना रहता है, इसी प्रकार दूसरे दिन में
तथा अनेक प्रकार से बीते हुए तथा आगामी महीनों वर्षों युगों
और कल्पों तक में एक अभिन्न ज्ञान ही बना रहता है । ज्ञान के
विषय तो भिन्न भिन्न होते जाते हैं, परन्तु ज्ञान में भेद कभी नहीं
आता। दीपक के समान एक होने के कारण यह ज्ञान न तो उत्पन्न
होता है और न विनष्ट ही होता है । यदि इस ज्ञान के भी उत्पत्ति
और विनाश मानोगे, तो इन उत्पत्ति विनाशों को देखने वाला
[साक्षी] कौन होगा ? अपने उत्पत्ति विनाशों को स्वयं वह ज्ञान
ही देखे, यह बात भी संभव नहीं है । इन उत्पत्ति विनाशों को
ग्रहण करने वाला दूसरा कोई ज्ञान भी नहीं पाया जाता। इस
कारण इस ज्ञान को उदय अस्त से रहित तत्व माना जाता है ।
यह ज्ञान तो स्वयंप्रकाश है। स्वयंप्रकाश हो कर भासित होने
वाला यह ज्ञान ही, इस सकल जगत् का प्रकाश कर रहा है। इसी
कारण यह जगत् अन्धा होने से बच रहा है। यदि यह ज्ञान न
होता तो यह जगत् अन्धा होता।
इयमात्मा परानन्दः परप्रेमास्पदं यतः ।
मा न भूवं हि भूयासमिति प्रेमात्मनीक्ष्यते ॥८॥
(यह ज्ञान ही आत्मा है) और यह परमानन्द स्वरूप भी है ।
क्योंकि यह परमप्रेम का आस्पद है । "मैं न रहूँ ऐसा कभी न
हो किन्तु मैं सदा बना रहूँ" ऐसा प्रेम आत्मा से सभी करते हैं।
यह संवित् [ज्ञान] ही आत्मा है और यह परमानन्द स्वरूप
भी है क्योंकि यह परमप्रेम अथवा निरतिशय [सर्वाधिक] प्रेम
का विषय है । इसको सब से अधिक प्रेम किया जाता है । "मैं
कभी न रहूँ ऐसा कभी न हो किन्तु मैं सदा ही बना रहूँ" ऐसा

६ पंचदशी

एक सर्वाधिक प्रेम आत्मविषय में सभी का देखा जाता है। ऐसी
अवस्था में 'मुझको धिक्कार है' ऐसा जो एक द्वेष कभी कभी आत्मा
के विषय में पाया जाता है वह तो दुःख के सम्बन्ध के कारण से
दूसरी तरह से भी सिद्ध हो जाता है। इस कारण यह द्वेष आत्मा
की प्रेम-पात्रता को हटाने में असमर्थ रह जाता है। क्योंकि यह
प्रेम तो आत्मविषय में सब के अनुभव से सिद्ध हो रहा है।
तत्प्रेमात्मार्थमन्यत्र नैवमन्यार्थमात्मनि ।
अतस्तत् परमं तेन परमानन्दतात्मनः ॥९॥
वह प्रेम अपने लिए तो दूसरों से भी कर लिया जाता है,
परन्तु दूसरों के लिए अपने आपे से प्रेम करने की बात ठीक नहीं
जँचती। इस कारण आत्मप्रेम ही परमप्रेम है। इसीसे आत्मा की
परमानन्दता सिद्ध हो जाती है।
अपने से भिन्न पुत्र आदि में भी जब प्रेम दीख पड़ता हो तब
धोखे में आकर उसको स्वाभाविक प्रेम नहीं मान बैठना चाहिये।
क्योंकि वह प्रेम पुत्रादियों में आत्मार्थ ही होता है। उनमें स्वाभा-
विक प्रेम किसी को नहीं होता। इसके विपरीत लोगों को जो
आत्मा में प्रेम होता है वह प्रेम किसी दूसरे के लिए नहीं होता।
किन्तु वह अपने लिये ही होता है। यों निरुपाधिक [अथवा
निर्व्याज] होने के कारण यह आत्म-प्रेम ही परम [अर्थात् निर-
तिशय] प्रेम कहाता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि निर-
तिशय प्रेम का आस्पद होने से, आत्मा ही परमानन्द स्वरूप [किंवा
निरतिशय सुखरूप] है।
इत्थं सच्चित्परानन्द आत्मा युक्त्या, तथाविधम् ।
परं ब्रह्म, तयोरैक्यं श्रुत्यन्तेषूपदिश्यते ॥१०॥

तत्त्वविवेकप्रकरणम् ७
इस प्रकार युक्ति से आत्मा सच्चित् तथा परानन्दरूप सिद्ध
हो गया। वेदान्तों में परब्रह्म को भी सच्चिदानन्द स्वरूप ही बताया
गया है तथा उन वेदान्तों ने उन दोनों की एकता का उपदेश भी
कर दिया है।
इस प्रकार आत्मा की सत् चित् तथा परमानन्दता का सम-
र्थन युक्ति से हो गया। परब्रह्म भी वैसा ही सच्चिदानन्द स्वरूप है
वेदान्तों में आत्मा और ब्रह्म की [जिनको 'त्वं और तत्' भी कहते
हैं] एकता [किंवा अखण्ड एकरसता] का ही प्रतिपादन किया
गया है। इस एकता का प्रतिपादन करके ही वेदान्तों पर प्रामाण्य
आया है। आत्मा की सच्चिदानन्दरूपता का ज्ञान तो युक्ति से भी
हो जाता है, परन्तु आत्मा और ब्रह्म एक है इस बात का ज्ञान
वेदान्तों के सिवाय किसी और से होना संभव नहीं है।
अभाने न परं प्रेम, भाने न विषये स्पृहा।
अतो भानेऽप्यभातासौ परमानन्दतात्मनः ॥११॥
आत्मा की परमानन्दरूपता का अभान होने पर तो आत्मा
से परम प्रेम नहीं होना चाहिये, तथा भान होने पर विषयों की
इच्छा क्यों होनी चाहिये ? इस कारण यह मानना पड़ता है कि
परमानन्दरूपता, ज्ञात होने पर भी अज्ञात ही बनी हुई है।
आत्मा की परमानन्दरूपता के विषय में यह आक्षेप है किं
उसकी परमानन्दरूपता की उसे प्रतीति नहीं होती है अथवा हो
जाती है? यदि प्रतीति का होना नहीं मानते तो आत्मा से परम प्रेम
नहीं होना चाहिये। क्योंकि प्रेम तो विषय की सुन्दरता के ज्ञान से
उत्पन्न होने वाला एक पदार्थ है। यदि तो परमानन्दरूपता की
प्रतीति मानी जाय तो सुख के साधन स्रक्, चन्दन, वनिता आदि

८ पञ्चदशी
भोगों की तथा उनसे उत्पन्न होने वाले सुखों की इच्छा ही प्राणी
को नहीं होनी चाहिये। क्योंकि जिसको साक्षात् फल प्राप्त होचुका
हो उसको साधनोंकी इच्छा ही कैसी? जिसको नित्य तथा निरति-
शय आनन्द का लाभ हो चुका हो उसे क्षणिक साधनों की पराधी-
नता आदि दोषों से दूषित, विषयसुखों की स्पृहा ही क्यों होनी
चाहिये ? इस कारण आत्मा की परमानन्दरूपता युक्तिसंगत
बात नहीं है। इस आक्षेप का समाधान यों करना चाहिये कि भान
और अभान दोनों पक्षों के दोषों को देखकर यों मानना पड़ता
है कि आत्मा की यह परमानन्दरूपता प्रतीत होने पर भी प्रतीत
नहीं होती है। जभी तो प्राणिवर्ग दो विरुद्ध कार्य एक साथ
करते हैं—वे अपने आप से परम प्रेम भी करते हैं और उन्हें
विषयों की इच्छा भी बनी ही रहती है। वे आत्मा को 'मैं' इस
रूप में तो जानते हैं परन्तु उन्हें यह मालूम नहीं होता कि 'मैं'
परमानन्दरूप हूँ ।
अध्येतृवर्गमध्यस्थपुत्राध्ययनशब्दवत् ।
भानेऽप्यभानं भानस्य प्रतिबन्धेन युज्यते ॥ १२ ॥
बहुत से पढ़ने वालों के बीच में बैठे हुए पुत्र के पढ़ने की
आवाज को जैसे उसका पिता जानता भी है और नहीं भी
जानता। इसी प्रकार आनन्द का भान होजाने पर भी अभान
हुआ रहता है। प्रतिबन्ध के कारण भान होना रुक जाता है
और ऊपर की बात युक्त हो जाती है।
बहुत से पढ़नेवालों के बीच में बैठे हुए पुत्र के पढ़ने का
शब्द जैसे उसके पिता को सामान्यतया भासमान होने पर भी
विशेष रूप से भासमान नहीं होता 'कि यह मेरे पुत्र का शब्द

तत्त्वविवेकप्रकरणम् ९
है। इसी प्रकार आनन्द का सामान्यतया भान रहने पर भी विशेष
रूप से अभान हो जाता है । उसका कारण यह है कि [जिस प्रति-
बन्ध का वर्णन हम अगले श्लोक में करेंगे उस] प्रतिबन्ध के प्रताप
से 'मैं हूँ' इस सामान्य रूप से आत्मा का भान होते रहने पर भी वह
विशेष रूप से [कि मैं सच्चिदानन्द हूँ] अप्रतीत रह ही जाता है ।
प्रतिबन्धोऽस्तिभातीतिव्यवहारार्हवस्तुनि ।
तन्निरस्य विरुद्धस्य तस्योत्पादनमुच्यते ॥१३॥
जिस आत्मवस्तु का व्यवहार 'है और प्रतीति भी हो रही है'
ऐसे स्पष्ट शब्दों में होना चाहिये था, उस आत्मवस्तु के उस
उचित व्यवहार को हटाकर उसके उलटे 'न तो है ही और न मुझे
प्रतीति ही हो रही है' ऐसे एक मिथ्या व्यवहार को उत्पन्न कर
देना ही 'प्रतिबन्ध' कहाता है ।
तस्य हेतुः समानाभिहारः पुत्रध्वनिश्रुतौ ।
इहानादिरविद्यैव व्यामोहै कनिबन्धनम् ॥१४॥
पुत्र शब्द-श्रवण [ वाले दृष्टान्त ] में तो उस प्रतिबन्ध का
कारण समानाभिहार [बहुतों के साथ मिलकर पढ़ना] होता है
तथा इस [दाष्टान्तिक] में तो समस्त विपरीत ज्ञानों का
एक मुख्य कारण अनादि [उत्पत्ति रहित] अविद्या ही प्रतिबन्ध
का कारण है [अनादि अविद्या का वर्णन आगे किया गया है] ।
चिदानन्दमयब्रह्मप्रतिबिम्बसमन्विता ।
तमोरजःसत्वगुणा प्रकृति र्द्विविधा च सा ॥१५॥
चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म के प्रतिबिम्ब से युक्त, तम रज तथा
सत्वगुण वाली, एक वस्तु 'प्रकृति' कहाती है । वह दो प्रकार की
होती है [जिनका कि कथन अगले श्लोक में किया जायगा]।

१० पञ्चदशी
सत्वशुद्ध्यविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते मते ।
मायाविम्बो वशीकृत्य तां स्यात् सर्वज्ञ ईश्वरः ॥१६॥
सत्व की शुद्धि से उस प्रकृति को 'माया'और सत्व की अशुद्धि
[ मलिनता ] से उस प्रकृति को 'अविद्या' मान लिया गया है ।
माया में पड़ा हुआ विम्ब उस माया को वश में कर रहा है और
इसी कारण से वह सर्वज्ञ ईश्वर बना बैठा है ।
प्रकाशात्मक सत्व गुण की शुद्धि से जब कि सत्व गुण दूसरे
गुणों से कलुषित नहीं हो जाता—तब वह प्रकृति 'माया' कही
जाती है । जब तो वह सत्व गुण दूसरे गुणों से कलुषित होकर
अशुद्ध हो जाता है तब वही प्रकृति 'अविद्या' कहाने लगती है ।
संक्षेप यह है कि विशुद्ध-सत्व-प्रधान प्रकृति को 'माया' तथा मलिन
सत्व-प्रधान प्रकृति को 'अविद्या'कहते हैं । माया में प्रतिफलित उस
आत्मा ने माया को अपने स्वाधीन कर रक्खा है और वही सर्व-
ज्ञता आदि गुणों वाला ईश्वर होगया है ।
अविद्यावशगस्त्वन्य स्तद्वैचित्र्यादनेकधा ।
सा कारण शरीरं स्यात् प्राज्ञस्तत्राभिमानवान् ॥१७॥
दूसरा तो अविद्या के वश में फँस गया है । अविद्या की
विचित्रता के कारण वह अनेक होजाता है । उस अविद्या को
'कारण शरीर' कहते हैं । उस कारण शरीर कहानेवाली अविद्या
में अभिमान करनेवाले को 'प्राज्ञ' मानते हैं ।
अविद्या में प्रतिबिम्बित होकर उसके पराधीन होजानेवाला
आत्मा तो जीव कहाने लगता है । वह जीव तो उस अविद्या
रूपी उपाधि की विचित्रता [ किंवा अशुद्धि की न्यूनाधिकता ]
के कारण अनेक प्रकार का हो जाता है । उसके देवता मनुष्य पशु

तत्त्वविवेकप्रकरणम् ११
पक्षी आदि अनेक भेद हो जाते हैं । वह अविद्या ही 'कारण शरीर'
कहाती है, क्योंकि स्थूल सूक्ष्म शरीर तथा स्थूल सूक्ष्म भूतों का
वही कारण मानी गयी है । उस कारण शरीर में अभिमान करने
वाले अथवा उसी में 'मैं' भावना करने वाले जीव को 'प्राज्ञ' नाम
से कहा जाता है ।
तमःप्रधानप्रकृते स्तद्भोगायेश्वराज्ञया ।
वियत्पवनतेजोऽम्बुभुवो भूतानि जज्ञिरे ॥१८॥
उन [प्राज्ञों] के भोग के लिये ईश्वर की आज्ञा से तमःप्रधान
प्रकृति में से आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा भूमि नाम के पांच
महाभूत उत्पन्न हुए।
उन प्राज्ञ नामक जीवों के सुख-दुःख-साक्षात्काररूपी भोग
के लिये उस प्रकृति में से [जिस में कि तमोगुण की प्रधानता है]
ईशान आदि शक्ति वाले जगत् के अधिष्ठाता की आज्ञा से
[ जिसको उसका ईक्षण भी कहा जाता है ] आकाश आदि पांच
भूत उत्पन्न होगये ।
सत्त्वांशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमाद्धीन्द्रियपञ्चकम् ।
श्रोत्रत्वगक्षिरसनघ्राणाख्यमुपजायते ॥ १९ ॥
उन आकाश आदि पांच भूतों के पृथक् पृथक् पांच सत्त्व
भागों से क्रमानुसार श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना तथा घ्राण नाम
की पांच ज्ञानेन्द्रियां उत्पन्न हो जाती हैं। [अर्थात् एक एक भूत
के पृथक् पृथक् सत्त्वांश से एक एक इन्द्रिय की उत्पत्ति होती है]
तैरन्तःकरणं सर्वै र्वृत्तिभेदेन तद् द्विधा ।
मनो विमर्शरूपं स्याद् बुद्धिः स्यान्निश्चयात्मिका॥२०॥
उन पांचों भूतों के पांचों सत्त्वांशों से मिलकर एक अन्तः-

१२ पञ्चदशी
करण नाम का द्रव्य उत्पन्न हो जाता है । वह अन्तःकरण अपने
वृत्तिभेद के कारण दो प्रकार का होता है । जब वह विमर्श किंवा
संशयात्मिका वृत्ति करता है अथवा यों कहो कि जब वह विमर्श
रूप हो जाता है तब उसको 'मन' कहा जाता है । निश्चयस्वरूप
हो जाने पर उसी को 'बुद्धि' नाम से कहने लगते हैं ।
रजोंशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमात् कर्मेन्द्रियाणि तु ।
वाक्पाणिपादपायूपस्थाभिधानानि जज्ञिरे ॥२१॥
उन आकाशादि पांच भूतों के पृथक्-पृथक् पांच रजो भागों से
क्रमानुसार वाक्, पाणि, पाद, पायु, तथा उपस्थ नाम की पांच
कर्मेन्द्रियां उत्पन्न हो जाती हैं।
तैः सर्वैः सहितैः प्राणो वृत्तिभेदात् स पंचधा ।
प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ च ते पुनः ॥२२॥
उन पांचों भूतों के पांचों रजो भागों से मिलकर एक प्राण
का जन्म हो जाता है । वह प्राण वृत्तिभेद किंवा प्राणनादि व्यापारों
के भेद से, पांच प्रकार का होता है । वे पांच प्रकार ये हैं—प्राण,
अपान, समान, उदान तथा व्यान ।
बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकै र्मनसा धिया ।
शरीरं सप्तदशभिः सूक्ष्मं तल्लिङ्गमुच्यते ॥२३॥
(पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, पांच प्राण, मन तथा बुद्धि
इन सतरह पदार्थों से मिलकर 'सूक्ष्म शरीर' बनता है । उसी को
वेदान्तों में 'लिंग शरीर' भी कहते हैं)
प्राज्ञस्तत्राभिमानेन तैजसत्वं प्रपद्यते ।
हिरण्यगर्भतामीश स्तयो र्व्यष्टिसमष्टिता ॥२४॥
(वह प्राज्ञ नाम का जीव उस लिंगशरीर में अभिमान करने

[Header: तत्त्वविवेकप्रकरणम् १३]

से 'तैजस' हो जाता है तथा जब वह ईश्वर उस लिंग देह में
अभिमान करता है तब वह 'हिरण्यगर्भ' हो जाता है । उन दोनों
में भेद केवल इतना ही है कि तैजस 'व्यष्टि' है और हिरण्यगर्भ
'समष्टि' है ) इसके अतिरिक्त और कोई भेद नहीं है ।
मलिनसत्वप्रधान अविद्यारूपी उपाधि वाला जीव जब लिंग
शरीर में अभिमान करता है, जब वह उसी को अपना आत्मा
मान लेता है तब उसे 'तैजस' कहने लगते हैं । विशुद्ध सत्व प्रधान
मायारूपी उपाधिवाला परमेश्वर उसी लिंग शरीर में जब 'मैंपने'
का अभिमान करता है तब उसका नाम 'हिरण्यगर्भ' हो जाता
है । तैजस और हिरण्यगर्भ दोनों ही यद्यपि लिंग शरीर पर अभि-
मान करने वाले हैं परन्तु उनमें से एक 'व्यष्टि' है दूसरा 'समष्टि'
है । इसी से दोनों में भेद हो गया है ।
समष्टीशः सर्वेषां स्वात्मतादात्म्यवेदनात् ।
तदभावात् ततोऽन्ये तु कथ्यन्ते व्यष्टिसंज्ञया ॥२५॥
वह ईश्वर–जिसे हिरण्यगर्भ कहा गया है–लिंगशरीर
उपाधि वाले सभी तैजसों के साथ अपने आत्मा की एकता को
समझता रहता है । वह समझता है कि ये सब मिलकर 'मैं' हूँ ।
इसी से वह 'समष्टि' होता है । उस ईश्वर से अन्य जो जीव हैं
वे तो उस तादात्म्यवेदन के अभाव से [उन सब के साथ
एकत्व ज्ञान के न होने से] 'व्यष्टि' नाम से कहे जाते हैं ।
तद्भोगाय पुनर्भोग्यभोगायतनजन्मने ।
पञ्चीकरोति भगवान् प्रत्येकं वियदादिकम् ॥२६॥
भगवान् परमेश्वर उसके बाद उन जीवों के भोग के लिये ही
भोग्य [ अन्नपानादि ] तथा भोगमन्दिरों

१६ पञ्चदशी
प्रकार के शरीरों की उत्पत्ति करने के लिये, आकाश आदि पांच
भूतों में से प्रत्येक भूत को [जो कि अभी तक अपंचात्मक ही थे]
पंचात्मक कर देता है [जिससे कि उनसे जीवों के भोग के लिये
भोग्य अन्नपानादि तथा भोग्य मन्दिर शरीरादि का निर्माण
हो सके]।
द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः ।
स्वस्वेतरद्वितीयांशै योजनात् पञ्च पञ्च ते ॥५७॥
आकाशादि प्रत्येक भूत के पहले दो दो भाग किये जाँय ।
फिर उनमें के पहले एक भाग के तो चार चार भाग किये जाँय
[तथा दूसरे आधे भागों को पूरा ही रक्खा जाय] उसके पश्चात्
अपने अपने से भिन्न दूसरे दूसरे भागों के साथ योग करने से
ये पांचों भूत पंचीकृत हो जाते हैं।
पंचीकरण का चित्र
प्रत्येक भूत में आधा भाग अपना है तथा
आधे में शेष ४ भूत हैं

आकाशवायुअग्निजलपृथिवी
आकाशवायुअग्निजलपृथिवी
वायु<br>अग्नि<br>जल<br>पृथिवीआकाश<br>अग्नि<br>जल<br>पृथिवीआकाश<br>वायु<br>जल<br>पृथिवीआकाश<br>वायु<br>अग्नि<br>पृथिवीआकाश<br>वायु<br>अग्नि<br>जल

तत्त्वविवेकप्रकरणम् १५

तैरण्डस्तत्र भुवनं भोग्यभोगाश्रयोद्भवः ।
हिरण्यगर्भः स्थूलेऽस्मिन् देहे वैश्वानरो भवेत् ॥२८॥
उन पंचीकृत भूतों से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है। ब्रह्माण्ड
में भुवन, प्राणियों के भोगने योग्य भोग्यपदार्थ तथा उन उन
लोकों के अनुकूल शरीर [ईश्वर की आज्ञा से] उत्पन्न हो जाते
हैं। इस सम्पूर्ण स्थूल [विराट्] शरीर में अहंभाव से बैठने
वाला हिरण्यगर्भ 'वैश्वानर' कहाने लगता है ।
तैजसा विश्वतां याता देवतिर्यङ्नरादयः ।
ते पराग्दर्शिनः प्रत्यक्तत्वबोधविवर्जिता ॥२९॥
इस स्थूल शरीर में आते ही तैजस 'विश्व' हो जाते हैं,
जिनको देव तिर्यङ् तथा मनुष्यादि कहा जाने लगता है। वे
सभी बहिर्मुख हैं। इन किसी को भी आत्मतत्व का बोध
नहीं है।
इस स्थूल शरीर में अहंभाव से निवास करने वाले 'तैजस'
ही 'विश्व' कहाने लगते हैं। देवता पशु पक्षी तथा मनुष्यादि भेद
इन विश्वों के ही होते हैं। तैजसों में इस तरह का कोई भेद नहीं
होता। कारणशरीर तथा लिंगशरीर तो सब प्राणियों का एक
समान ही होता है। इनके केवल स्थूल शरीर ही भिन्न भिन्न
प्रकार के होते हैं। वे देवादि सभी पराग्दर्शी [बाह्यदर्शी] हैं। ये बाह्य
शब्दादि विषयों को ही देखा करते हैं। अपने दुर्भाग्य के कारण
ये प्रत्यगात्मा को नहीं देख पाते हैं। इन सभी को आत्मतत्व का
यथार्थ ज्ञान नहीं होता। यद्यपि तार्किक आदि लोग देह से भिन्न
आत्मा को पहचानते हैं परन्तु श्रुतिप्रतिपादित असंग आत्मरूप
का यथार्थ ज्ञान उन को भी नहीं हैं।

१६ पञ्चदशी
कुर्वते कर्म भोगाय कर्म कर्तुं च भुञ्जते ।
नद्यां कीटा इवावर्तादावर्तान्तरमाशु ते ॥
व्रजन्तो जन्मनो जन्म लभन्ते नैव निर्वृतिम् ॥३०॥
[सुखादि को] भोगने के लिये तो ये कर्म करते हैं [आगे
को] कर्म करने के लिये ये भोगों को भोगते हैं। ऐसे ये जीव
नदी के उन कीड़ों की तरह हैं जो एक आवर्त से निकलकर झट-
पट दूसरे आवर्त में जा फँसते हैं। ऐसे ही ये जीव भी जन्म
से जन्म को पाते रहते हैं। इन्हें कभी भी विश्राम किंवा सुख
नहीं मिलता।
क्योंकि उनको आत्मतत्व का यथार्थ ज्ञान तो होता ही नहीं
इस कारण वे लोग भोग [सुख आदि के अनुभव] के लिये
[मनुष्यादि शरीरों में वस कर उन उन शरीरों के अनुकूल] कर्म
किया करते हैं। फिर कर्म करने के लिये [मनुष्यादि शरीरों के
द्वारा] उन उन फलों को भोगा करते हैं। फल को भोगना इस-
लिये आवश्यक होता है कि, यदि कर्म करने के बाद उन को
फल का अनुभव न हुआ करे, तो फिर उन प्राणियों को उस तरह
की इच्छायें ही पैदा न हुआ करें और फिर वे प्राणी उन उन
साधनों के अनुष्ठान में भी न लगा करें। यों जब कोई प्राणी
किसी भोग को भोग लेता है तब फिर वह शतगुण उत्साह से
वैसे वैसे कर्मों में जुट जाता है और जब कर्म कर चुकता है
तब हज़ारों आशाओं से भोगों की बाट देखा करता है। यों यह
कर्म और भोग का अनन्त चक्कर कभी समाप्त होने में ही नहीं
आता। ऐसे जीवों की गति नदी के बहाव में बहने वाले कीड़ों
की सी होती है, जो कभी एक भंवर में से निकलते हैं तो

तत्त्वविवेकप्रकरणम् १७
तुरन्त ही दूसरे में जा पड़ते हैं और कभी भी विश्राम नहीं पाते
हैं। इसी प्रकार ये प्राणी कर्म और भोग के इस भँवर में फँस
कर जन्म से जन्म को पाते हैं। इन हतभागियों को सुख के
चिरस्थायी दर्शन कभी भी नहीं होते।
सत्कर्मपरिपाकात्ते करुणानिधिनोद्धृताः ।
प्राप्य तीरतरुच्छायां विश्राम्यन्ति यथासुखम् ॥ ३१ ॥
नदी के वे कीड़े अपने किसी पुण्य कर्म का परिपाक होने
पर किसी कृपालु के द्वारा नदी में से बाहर निकाले जाकर किसी
किनारे के पेड़ की छाया में सुखपूर्वक विश्राम पा लेते हैं।
उपदेशमवाप्यैवमाचार्यात् तत्वदर्शिनः ।
पञ्चकोशविवेकेन लभन्ते निर्वृतिं पराम् ॥ ३२ ॥
इसी प्रकार जब किन्हीं के पूर्वोपार्जित कोटि पुण्य कर्मों का
परिपाक होता है तब वे प्राणी किसी तत्वदर्शी आचार्य से उपदेश
[श्रवण] को पाकर [आगे बतायी विधि से] पांच कोशों का
विवेक कर लेने पर, परानिर्वृति [मोक्ष सुख] को पा लेते हैं।
अन्नं प्राणो मनो बुद्धिरानन्दश्चेति पञ्च ते ।
कोशास्तैरावृतः स्वात्मा विस्मृत्या संसृतिं व्रजेत् ॥ ३३ ॥
अन्न, प्राण, मन, बुद्धि [विज्ञान] तथा आनन्द ये पांच कोश
कहाते हैं। [इनको कोश कहने का कारण यह है कि] इन कोशों
से आच्छादित हुआ अपना आत्मा, अपने स्वरूप को भूल जाने
के कारण, जन्म मरण रूपी संसार में फँस जाता है।
कोश [चन्दा] जैसे कोश बनाने वाले कीड़े के क्लेश का
कारण होता है अथवा जैसे कोश [म्यान] के अन्दर रक्खी हुई
तलवार का रूप छिप जाता है इसी प्रकार इन अन्नादि कोशों ने,
२

१८ पञ्चदशी
अद्वयानन्द आत्मतत्व को ढक दिया है और आत्मा को क्लेश
पहुँचा रक्खा है इसी से इनको भी 'कोश' कहा जाता है।
स्यात् पंचीकृतभूतोत्थो देहः स्थूलोऽन्नसंज्ञकः ।
लिङ्गे तु राजसैः प्राणैः प्राणः कर्मेन्द्रियैः सह ॥ ३४ ॥
पंचीकृत भूतों से उत्पन्न हुआ यह स्थूल देह 'अन्नमय कोश'
कहाता है। लिङ्ग शरीर में के राजस [रजोगुण से बने हुए]
पांच प्राणों से तथा वागादि कर्मेन्द्रियों से मिलकर 'प्राणमय
कोश' हो जाता है।
सात्विकैर्धीन्द्रियैः साकं विमर्शात्मा मनोमयः ।
तैरेव साकं विज्ञानमयो धीर्निश्चयात्मिका ॥३५॥
विमर्शात्मा मन तथा सात्विक ज्ञानेन्द्रियां मिलकर 'मनोमय
कोश' कहाते हैं। उन्हीं ज्ञानेन्द्रियों के साथ मिली हुई निश्चया-
त्मिका बुद्धि 'विज्ञानमय कोश' कही जाती है।
कारणे सत्त्वमानन्दमयो मोदादिवृत्तिभिः ।
तत्तत्कोशैस्तु तादात्म्यादात्मा तत्तन्मयो भवेत् ॥३६॥
कारण शरीर में मोदादि वृत्तियों के साथ रहनेवाले [मलिन]
सत्व को 'आनन्दमय कोश' कहते हैं। यह हमारा आत्मा उन
उन कोशों के साथ तादात्म्य कर लेने पर तत्तन्मय [उन उन
के रूप का] सा हो जाता है।
कारण शरीर कहानेवाली अविद्या में जो कि मलिन सत्व
रहता है, वह जब उन उन प्रिय मोद तथा प्रमोद नाम की वृत्तियों
से युक्त हो जाता है [जो कि वृत्तियें क्रम से इष्ट पदार्थ के मिलने
की आशा से, इष्ट पदार्थ के मिलने से तथा इष्ट पदार्थ के भोगने
से, पैदा हुआ करती हैं] तब 'आनन्दमयकोश'कहाने लगता है।