पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् २४७
तृप्तिदीपप्रकरणम् २४७
किञ्चन मिषत्' (ऐत० १-१) इस वाक्य से तो पहले ब्रह्म को
लक्षित किया गया, फिर 'स ईक्षत लोकान्नु सृजा' (ऐत० १-१)
इत्यादि रीति से प्रारम्भ करके 'तस्य त्रय आवसथा स्त्रयः स्वप्ना
अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथः' (ऐत० ३-१२) तक जगत् के
आरोप की रीति बतायी गयी। फिर 'स जातो भूतान्यभिव्यैक्षत
किमिहान्यं वावदिषत्' (एते० ३-१३) इसमें आरोपित किये हुए का
अपवाद (खण्डन) किया गया। उस के पश्चात् 'स एतमेव पुरुषं
ब्रह्म ततमपश्यदिदमदर्शमिति' (ऐत० ३-१३) इस वाक्य में प्रत्य-
गात्मा के रूप में ब्रह्मस्वरूप को प्रत्यक्ष देखा गया। उस के
अनन्तर 'पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो जायते' (ऐत० ४-१) इत्यादि
वाक्यों में ज्ञान के साधन वैराग्य को उत्पन्न करने के लिये
गर्भवासादि के दुःखों का प्रदर्शन कराया गया। फिर 'कोय-
मात्मेति वयमुपास्महे' (ऐत० ५-१) इत्यादि विचार के द्वारा 'तत्'
'त्वं' पदार्थ का परिशोधन करने के पश्चात् प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐत०५-१)
इस महावाक्य के द्वारा प्रज्ञानरूप आत्मा की ब्रह्मता का प्रद्-
र्शन किया गया है।
अवान्तरेण वाक्येन परोक्षा ब्रह्मधीर्भवेत् ।
सर्वत्रैव महावाक्यविचारादपरोक्षधीः ॥६९॥
[इन ही उपनिषदों में नहीं और भी] सब शास्त्रों में
अवान्तर वाक्यों से तो परोक्ष ब्रह्मज्ञान कराया जाता है
तथा महावाक्यों के द्वारा अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ब्रह्मज्ञान किया
जाता है।
ब्रह्मापरोक्ष्यसिद्धयर्थं महावाक्यमितीरितम् ।
वाक्यवृत्तावतो ब्रह्मापरोक्ष्ये विमतिर्नहि ॥७०॥
२४८ पञ्चदशी
ब्रह्म के अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) करने के लिये ही महावाक्यों
का कथन है, यह बात शंकराचार्यजी ने अपनी 'वाक्यवृत्ति'
नाम की पुस्तक में कही है । इस कारण वाक्य से ब्रह्म का
प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाने में कोई भी विप्रतिपत्ति नहीं रहती ।
आलम्बनतया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः ।
अन्तःकरणसंभिन्नबोधः स त्वंपदाभिधः ॥७१॥
वाक्यवृत्ति में कहा गया है कि—अन्तःकरण उपाधिवाला
जो बोध (चिदात्मा) है, जो 'मैं' इस प्रतीति के तथा 'मैं' इस
शब्द के विषयरूप से प्रतीत होता है, वही (बोध) त्वं पद का
वाच्यार्थ कहाता है ।
मायोपाधि र्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः ।
पारोक्ष्यशबलः सत्याद्यात्मक स्तत्पदाभिधः ॥७२॥
माया जिसकी उपाधि है, जगत् का जो [निमित्त और
उपादान] कारण है, सर्वज्ञता आदि जिसके तटस्थ लक्षण हैं,
परोक्षता नामक धर्म जिसमें पाया जाता है, सत्य ज्ञानादि
जिसका स्वरूप बताया जाता है वही तो 'तत्' पद का वाच्यार्थ है।
प्रत्यक्परोक्षतैकस्य सद्वितीयत्वपूर्णता ।
विरुद्ध्येते यतस्तस्माल्लक्षणा संप्रवर्तते ॥७३॥
वही वस्तु 'प्रत्यक्' भी हो और 'परोक्ष' भी हो, तथा 'सद्वि-
तीय' भी हो और 'पूर्ण' भी हो, ये दोनों बातें विरुद्ध हैं (हो
नहीं सकती) इस कारण (संगति बैठाने के लिए) लक्षणा वृत्ति
का आश्रय लेना पड़ जाता है ।
तत्त्वमस्यादिवाक्येषु लक्षणा भागलक्षणा ।
सोऽयमित्यादिवाक्यस्थपदयोरिव नापरा ॥७४॥