पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ध्यानदीपप्रकरणम् ३१९
ध्यानदीपप्रकरणम् ३१९
[मरते समय इस जन्म में जो सबसे पिछले विचार होते
हैं वे यह बता देते हैं कि अगला जन्म कैसा होगा-कौन सी
योनि मिलेगी, ऊपर के दो प्रमाणों से यह तो सिद्ध हो ही
जाता है। परन्तु उस के साथ ही मरण काल में ज्ञान हो
जाता है और उस से मोक्ष मिल जाता है यह बात भी इन्हीं
प्रमाणों से सिद्ध हो जाती है ] पिछले ज्ञान जैसे भाविजन्म
की सूचना साधारण प्राणी को मिल जाती है, या जैसे
पूर्वाभ्यासवश मरण के समय सगुणोपासकों को सगुण ब्रह्म
के दर्शन मिल जाते हैं, इसी तरह पूर्वाभ्यास के प्रताप से
मरते समय निर्गुणोपासकों को भी निर्गुण ब्रह्म का ज्ञान हो
ही जायगा, इस में वृथा सन्देह क्यों किये जाते हो ।
नित्यनिर्गुणरूपं तन्नाममात्रेण गीयताम् ।
अर्थतो मोक्ष एवैष संवादिभ्रमवन्मतः ॥१३९॥
[ यदि कहो कि निर्गुणोपासक को तो मरण काल में
निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति ही हो सकती है । उसे मुक्ति क्यों कर
मिल जायगी ? इसका समाधान यह है कि] उसका तुम निर्गुण
नाम भले ही गाते रहो । असल में तो यह मोक्ष ही है। जैसे
संवादिभ्रम कहने ही कहने को भ्रम है, असल में तो उसे तत्त्व
ज्ञान ही कहना चाहिये । [ब्रह्म प्राप्ति और मुक्ति ये एक ही
पदार्थ के दो नाम रख लिये गये हैं] ।
तत्सामर्थ्याज्जायते धीर्मूलाविद्यानिवर्तिका ।
अविमुक्तोपासनेन तारकब्रह्मबुद्धिवत् ॥१४०॥
निर्गुण उपासना के सामर्थ्य से जो ज्ञान पैदा होता है,
वह ज्ञान ही मूलाविद्या को निवृत्त कर देता है। अर्थात् वह
४०० पञ्चदशी
ज्ञान ही मोक्ष का साधन है [ हम मानस क्रिया-रूपी
निर्गुणोपासना को साक्षात् मुक्ति का साधन नहीं कहते हैं ]
अविमुक्तोपासना [ भ्रुकुटी में वैश्वानर की उपासना ] से
तारक ब्रह्म का ज्ञान जैसे हो जाता है [ ऐसे ही निर्गुणो-
पासना से मूलाविद्या को हटा देने वाली बुद्धि उत्पन्न
हो जाती है ] ।
सोऽकामो निष्काम इति ह्यशरीरो निरिन्द्रियः।
अभयं हीति मुक्तत्वं तापनीये फलं श्रुतम् ॥१४१॥
सोऽकामो निष्कामः आप्तकाम आत्मकाम अशरीरो निरिन्द्रियः
अभयं वै ब्रह्म भवति इत्यादि वाक्यों के द्वारा तापनीय उपनिषत्
में मोक्ष को निर्गुणोपासना का फल बताया है ।
उपासनस्य सामर्थ्याद् विद्योत्पत्तिर्भवेत् ततः ।
नान्यः पन्था इति ह्येतच्छास्त्रं नैव विरुध्यते ॥१४२॥
नान्यः पन्था विद्यतऽयनाय (श्वे. ३-८) यह शास्त्र कहता है
कि ज्ञान के सिवाय मुक्ति का दूसरा रास्ता ही नहीं है । उपासना
के सामर्थ्य से भी ज्ञान की उत्पत्ति हो जाती है और ज्ञान से
मुक्ति हो जाती है । यों नान्यः पन्था वाले शास्त्र का विरोध
नहीं होता ।
निष्कामोपासनान्मुक्ति स्तापनीये समीरिता ।
ब्रह्मलोकः सकामस्य शैब्यप्रश्ने समीरितः ॥१४३॥
तापनीय उपनिषत् में निष्कामोपासना से मुक्ति मिलने की
बात कही है । शैब्यप्रश्न में यह बात कही गयी है कि सकामो-
पासना करने वाले को ब्रह्मलोक मिलता है ।