पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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नहीं है' तब उन्होंने यह समझ कर ही कहा था कि—वैषयिक
[विषयों की मार्फत मिले हुए] सुख हज़ारों शोकों से आच्छा-
दित रहते हैं, इस कारण वे तो एक प्रकार के दुःख ही हैं।
वैषयिक सुखरूपी मांस के टुकड़े पर हज़ारों शोकरूपी
गीधों और बाघों के दांत लगे रहते हैं—वे उस पर सदा मंड-
राते रहते हैं और उसे नोच नोच कर खाते रहते हैं। इस
कारण वैषयिक सुख को सुख कहना ही भूल है। वह तो एक
प्रकार दुःख ही है। वह तो ऐसा है जैसे किसी को खाज में
ही आनन्द आता हो। उसको तो सुख के वेश में आने वाला
दुःख ही मानना चाहिये।
ननु द्वैते सुखं मा भूदद्वैतेऽप्यस्ति नो सुखम् ।
अस्ति चेदुपलभ्येत तथा च त्रिपुटी भवेत् ॥२२॥
अच्छा यह तो मान लिया कि द्वैत में सुख नहीं है। परन्तु
हमें तो दीखता है कि अद्वैत में भी सुख नहीं है। यदि अद्वैत
में सुख होता तो वह [विषयसुखादि की तरह] उपलब्ध होना
चाहिये था [उपलब्ध न होने से मानते हैं कि अद्वैत में भी सुख
नहीं है] यदि कोई कहने लगे कि अद्वैत में तो सुख की उप-
लब्धि होती है तो उससे कहो कि फिर तो त्रिपुटी बन जायगी
[और अद्वैत नहीं रह सकेगा। तब तो अनुभवित्ता अनुभव
और अनुभाव्य ये तीन आकार मानने ही पड़ेंगे और अद्वैत
का नाश हो जायगा।]
मास्त्वद्वैते सुखं किन्तु सुखमद्वैतमेव हि ।
किं मानमिति चेन्नास्ति मानाकांक्षा स्वयंप्रभे ॥२३॥
४२६ पञ्चदशी
[सिद्धान्ती उत्तर देता है कि] अद्वैत में सुख न सही,
परन्तु अद्वैत ही सुख है इस बात का प्रमाण बूझना चाहो तो
यह तुम्हारा प्रमाण का प्रश्न ही नहीं बनता । क्योंकि स्वयंप्रकाश
वस्तु में तो प्रमाण की आवश्यकता होती ही नहीं ।
स्वप्रभत्वे भवद्वाक्यं मानं यस्माद् भवानिदम् ।
अद्वैतमभ्युपेत्यास्मिन् सुखं नास्तीति भाषते ॥२४॥
अद्वैत की स्वप्रकाशता में भी प्रमाण बूझना चाहो तो हम
कहेंगे कि उसमें तो तुम्हारा वाक्य ही प्रमाण है । क्योंकि तुम
प्रमाणों के बिना ही अद्वैत को मानकर, केवल सुख पर आक्षेप
करते हो कि अद्वैत में सुख नहीं है । [इस कारण कहते हैं कि
अद्वैत तत्त्व—जिसको तुम 'मैं' कहते हो—स्वयंप्रकाश ही है ।]
नाभ्युपैम्यहमद्वैतं त्वद्वचोनूद्य दूषणम् ।
वच्मीति चेत्तदा ब्रूहि किमासीद् द्वैततः पुरा ॥२५॥
[पूर्वपक्षी कहता है] मैं अद्वैत को मानने वाला नहीं हूँ ।
किन्तु मैं तो तुम्हारे कथन का अनुवाद करके उस पर दूषण
दे रहा हूँ । ऐसी अवस्था में मेरे शब्दों से अद्वैत की सिद्धि
करना अनुचित है। इस पर सिद्धान्ती कहता है कि अच्छा
तो यह बताओ कि द्वैत से पहले क्या था ?
किमद्वैत मुत द्वैत मन्यो वा कोटिरन्तिमः ।
अप्रसिद्धो, न द्वितीयोऽनुत्पत्तेः, शिष्यतेऽग्रिमः ॥२६॥
बताओ ? द्वैत से पहले अद्वैत था, द्वैत था, या कोई और
कोटि थी ? द्वैत और अद्वैत से भिन्न कोई तीसरी कोटि तो
प्रसिद्ध ही नहीं है । द्वैत से पहले द्वैत ही हो यह तो ठीक नहीं