पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
हुई है। यह अद्वितीय आनन्द इस जगत् का ऐसा ही उपादान है
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हुई है। यह अद्वितीय आनन्द इस जगत् का ऐसा ही उपादान है
जैसा कि मिट्टी घड़े का उपादान होती है। श्रुति ने अपने मुख से इस
जगत् की उत्पत्ति स्थिति और लय को आनन्द से ही होने वाला
माना है। 'विवर्ती' 'परिणामी' और 'आरम्भक' तीन प्रकार के
उपादान लोक में होते हैं। निरवयव पदार्थ 'परिणामी उपादान'
या 'आरम्भक उपादान' नहीं हो सकता। वह तो 'विवर्ती' उपा-
दान ही हो सकता है । अपनी पहिली अवस्था भी
न छूटे और साथ ही दूसरी भी दीखने लगे तो
इसी को 'विवर्त' कहते हैं। जैसे कि रज्जु अपना रस्सीपन
भी नहीं छोड़ती और सर्पाकार भी धारण कर बैठती है। ऐसा
विवर्त सावयव पदार्थों में ही होता हो सो बात नहीं है। वह तो
निरवयव पदार्थों में भी पाया जाता है। देखते हैं कि—आकाश
निरवयव पदार्थ है उस में तल और नीले पन की कल्पना [उस
के स्वरूप को न जानने वाले] लोग कर ही लेते हैं। इस दृष्टान्त
की विद्यमानता में यह मानने में अब हमें कुछ भी संकोच नहीं
है कि निरवयव आनन्द तत्व में यह जगत् भी विवर्त ही है। इस
जगत् के कल्पक की तलाश हो तो ऐन्द्रजालिक की शक्ति के
समान इस आनन्द की जो अपनी माया शक्ति है उसको ही कल्पना
करने वाली मान लो। शक्ति की कुछ ऐसी विचित्र अवस्था है
कि वह न तो शक्तिमान् से पृथक् ही होती है [क्योंकि वह किसी
को पृथक् दीखती नहीं] और न वह अपृथक् ही पायी जाती है।
क्योंकि यदि वह उससे अभिन्न हो तो बताओ मणिमन्त्रादि के
प्रताप से जब अग्नि से दाह होना रुक जाता है तब वह किसका
प्रतिबन्ध होता है ? यह शक्ति वैसे तो किसी को दीख नहीं
करती, कार्य को देखकर उसका तो अनुमान किया करते हैं।
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फिर जब कारण होने पर भी कार्य न होता हो तब प्रतिबन्ध को
मानना पड़ जाता है। जब आग जल रही हो और दाह न होता हो
तब समझ लो कि किसी उपाय से अग्नि की शक्ति का प्रतिबन्ध
कर दिया गया है। इस शक्ति के विषय में श्वेताश्वतर उपनिषद
के ही शब्दों में कहना पर्याप्त होगा कि—मुनि लोगों को जब
इस जगद्रचना के कारण को जानने की इच्छा हुई और अपनी
ध्यानयोग की प्रयोगशाला में वे बैठे, तब उन्हें इस स्वयंप्रकाश
तत्त्व की शक्ति दिखाई पड़ी—वह शक्ति अपने गुणों अर्थात् अपने
कार्यों किंवा शरीरों में निगूढ़ भाव से निवास कर रही थी, इसीसे
किसी को दीख नहीं पड़ती थी—ध्यान योग के दूर वीक्षण यन्त्र
[दूरबीन] को लगाकर उनकी दृष्टि उस तक पहुँच गयी । जगत्
को बनाने वाली ब्रह्म की उस परा शक्ति को उन्होंने तीन रूप में
पाया। उन्होंने उसको कहीं तो क्रियारूप में पाया, कहीं ज्ञानरूप
में देखा और कहीं इच्छा रूप में उसका दर्शन किया। कभी
कभी दो या तीनों रूपों में उसका साक्षात्कार हुआ। वसिष्ठ मुनि
ने भी कहा है कि वह परब्रह्म सर्वशक्तिमान् है, नित्य है, पूर्ण
है, अद्वितीय है, परन्तु यदि शक्ति की सहायता उसे न मिलती
तो उसके इन गुणों का उल्लास कैसे होता ? उसे कोई कैसे
जानपाता ? उसकी इस निगूढ महिमा को जना देना ही तो इस
शक्ति का परम उद्देश्य है। जब जब जिस जिस शक्ति के कारण
वह परब्रह्म विकास को प्राप्त हो जाता है तब तब तो वह शक्ति
हम पर भी प्रकट हो जाती है। हे राम, तुम देखलो कि देवता
पशु पक्षी तथा मनुष्यादि के शरीरों में उसी चिच्छक्ति का विकास
हो गया है जिससे ये मिट्टी के पुतले चेतन दीखने लगे हैं। वायु
में उसकी स्पन्द शक्ति, पत्थरों में दार्थ्यशक्ति, जलों में द्रवशक्ति,
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अग्नि में दाहशक्ति, आकाश में शून्यशक्ति का विकास हो गया
है। बहुत कहां तक कहें अण्डे में महासर्प की तरह यह जगत्
आत्मा में छिपा बैठा है। छोटे वटबीज में फल पत्र पुष्प शाखा
विटप और मूल सहित इतना बड़ा वृक्ष जैसे रहता है ऐसे ही यह
समस्त त्रिभुवन अपने ब्रह्मबीज में रहता है। भूमि में बहुत से
बीज पड़े रहते हैं परन्तु वे सब एक साथ जम कर खड़े नहीं हो
जाते। किंतु किसी देश और किसी ऋतु में किसी किसी बीज से
अंकुर निकल पड़ते हैं। हे राम ! वह आत्मा सर्वत्र विद्यमान है,
नित्य प्रकाशमान् है—वह देश या काल या वस्तु की मर्यादा में
बंधने कभी नहीं आता। परन्तु जब वही आत्मतत्व मननशक्ति
को धार लेता है तब बस उस समय उसे 'मन' कहने लगते हैं।
मन के बनते ही 'बन्ध' और 'मोक्ष' की कल्पना जाग कर खड़ी
हो जाती है। उसके बाद पर्वत, 'नगर, नदी, समुद्रादि प्रपंच जिसे
भुवन भी कहते हैं बनकर तैयार हो जाते हैं। असल में तो इस
त्रिभुवन रूपी भवन की नींव कल्पना ही है, परन्तु तौ भी क्या
करें प्राणियों के हृदय में तो यह ऐसी जम गयी है कि कुछ कहते
ही नहीं बनता। छोटे बच्चों के विनोद के लिए कोई कुत्ते बिल्ली
की झूठी कहानी उन्हें सुना दी जाय और वे उसे सच्ची मानकर
आपस में व्यवहार करने लगें—एक दूसरे को सुनाने लगें—वैसी
ही अवस्था इन प्राणियों की हो गयी है। कुत्ते बिल्ली की जो
कहानी बालकों को सुनादी जाती है वे जैसे उसे ही ठीक मान
बैठते हैं, ऐसे ही, विचार करने का' सामर्थ्य जिन में नहीं होता, उन
के मन में इस संसाररचना के सच होने के भ्रामक विचार जमकर
बैठ गए हैं। इस जगत् को बनाने वाली यह शक्ति अपने कार्य और
अपने आश्रय दोनों से ही विलक्षण होती है ! क्योंकि कार्य के धर्म
ब्रह्मानन्दन्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप ११७
मुटाश आदि और आश्रय के धर्म शब्द आदि इस शक्ति में पाये
नहीं जाते। इसीसे इस शक्ति को अचिन्त्य या अनिर्वचनीय भी कह
दिया जाता है। कार्य [घट आदि] जब तक उत्पन्न नहीं होता तब
तक यह शक्ति मिट्टी आदि में ही छिपी रहती है। कुम्हार आदि
की सहायता से यही शक्ति विकार की सूरत में आ जाती है।
जो लोग तत्व का विश्लेषण करना नहीं जानते वे मोटे और गोल
कार्य [घट] तथा शब्दस्पर्शादि रूपी मिट्टी, दोनों को मिलाकर दोनों
का ही एक नाम [घड़ा] रख लेते हैं। यदि वे विश्लेषण कर सकें
तो उन्हें 'घट' नाम की कोई वस्तु ही वहां न दीख पड़े। कुम्हार
ने जब तक क्रिया नहीं की थी उससे पहले जो भाग था वह तो
'घट' था ही नहीं। कुम्हार ने आकर जब ठोक पीटकर मोटी और
गोल सी एक वस्तु बना कर तैयार की तब कही तो 'घट' हुआ।
उस घड़े को हम मिट्टी से भिन्न नहीं कह सकते। क्योंकि मिट्टी
को हटा कर देखें तो वह घट दीख नहीं सकता। उस घड़े को
हम मिट्टी से अभिन्न भी नहीं कह सकते ? क्योंकि जब तक पिण्ड-
दशा थी तब तक तो वह दीखता ही नहीं था। यों जैसे शक्ति
अनिर्वचनीय पदार्थ है इसी तरह घट भी अनिर्वचनीय पदार्थ ही
है। शक्ति के गुण इस घट में भी पाये जाते हैं, इसी से तो इस
घट को शक्ति से उत्पन्न हुआ मानते हैं। भेद केवल इतना ही है
कि जब तक अव्यक्त अवस्था थी तब तक जिस वस्तु को हम
शक्ति कहते थे, व्यक्त अवस्था आने पर उसी का तो नाम घट पड़
गया है। केवल इसी का नहीं संसार में जिसे जिसे 'माया' कहते हैं,
सभी का यही हाल है—ऐन्द्रजालिक की माया भी प्रयोग करने
से पहले पहले प्रकट अवस्था में नहीं होती—पीछे से तो गन्धर्व-
सेना आदि नानारूपों में निकल कर व्यक्त हो जाती है और लोगों
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को चकित कर देती है। इसी सब अभिप्राय को लेकर श्रुति ने
मायामय होने के कारण विकारों को अनृत कहा है और विकारों
का आधार जो मिट्टी है उसी को सत्य माना है। उसका मतलब
है कि ये जो विकार दीख रहे हैं ये वाणी से बोले जाने वाले नाम
ही तो हैं, इन सब में सत्य पदार्थ तो मिट्टी ही है। 'व्यक्त' 'अव्यक्त'
और इनका 'आधार' ये तीन ही तो पदार्थ संसार में होते हैं। इन
तीनों में पहले दोनों जो 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' हैं वे तो काल-
भेद से पर्याय से होते रहते हैं अर्थात् कभी कार्य होता है और कभी
शक्ति होती है। इनका यह कभी कभी होना ही तो इनके मिथ्यापन
को सिद्ध कर रहा है। किन्तु इन तीनों का जो आधार है वह
वस्तु तो इन दोनों ही अवस्थाओं में रहती है—वह [ मिट्टी ]
कार्यावस्था में भी रहती है और शक्ति काल [कारणावस्था] में भी
रहती है। यों सदा रहने वाली होने के कारण वही सत्य वस्तु
है। जो निस्तत्व होकर भी भासने लगे उसे हम 'व्यक्त' कहते
हैं। उसके उत्पत्ति और नाश दोनों ही होते हैं। वह जब उत्पन्न
होता है तब मनुष्य उनके कुछ नाम रख लेते हैं। क्योंकि वह
व्यक्त पदार्थ जब नष्ट भी हो जाता है तब भी यह नाम तो मनुष्यों
की वाणी पर चढ़ा रह जाता है। इस कारण कहते हैं कि उस नाम
से निरूपणीय [जाना जाने वाला] जो कोई व्यक्त पदार्थ है वह
नामात्मक ही है। यदि वह व्यक्त पदार्थ नामात्मक न होता तो
अब उसका व्यवहार नाम से क्यों कर होता । व्यक्त पदार्थ का वह
रूप भी सत्य नहीं है। क्योंकि वह तो निस्तत्व है,विनाशी है,और
वाणी से बोला हुआ एक शब्द ही शब्द तो है। यदि यह आकार
[रूप] असत्य न होता तो जैसे मिट्टी आदि निस्तत्व नहीं है,
विनाशी नहीं है, या केवल नाममात्र ही नहीं है, ऐसे ही ये भी
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होते । मिट्टी नाम की जो चीज है वह व्यक्तकाल में या.उससे
पहले, या उसके बाद, सदा एकरूप ही रहती है, सदा सत्य
और अविनाशी होती है, इससे उसे ही 'सत्य' कहते हैं । सत्य
पदार्थ का बोध जब किसी को हो जाता है तब घटादि अनृत
पदार्थों की निवृत्ति हो ही जाती है—अर्थात् उन्हें सत्य समझना
छूट जाता है। ज्ञान से जैसी निवृत्ति हम आध्यात्मिकलोग चाहते हैं
वह तो यही है कि—उन पदार्थों की सत्यता का विचार मन में से जाता
रहे। वे प्रतीत होने [भी] बन्द हो जांय, ऐसी आशा बोध से हम
कर बैठेंगे तो हमें निराश ही हो जाना पड़ेगा और ज्ञान में अश्रद्धा
करनी पड़ जायगी । जो पुरुष पानी के किनारे नीचे को मुंह किये
खड़ा है उसे जल में उलटा आदमी दीखता तो है परन्तु वह वहां
होता नहीं है। किनारे पर खड़े हुए मनुष्य को ही जैसे सच्चा
समझा जाता है वैसे उसे [पानी के छायामनुष्य को] कोई सच
नहीं समझता । वह समझ लेता है कि जलरूपी उपाधि के कारण
ऐसी भ्रान्त प्रतीति हो रही है। जब तक जलरूपी उपाधि बनी
है तब तक ऐसी मिथ्या प्रतीति होती ही रहेगी । इसी प्रकार सब
का कारण जो आत्मतत्व है उस का ज्ञान जब हो जाता है तब
विवेकी पुरुष इस प्रतीयमान् जगत् को मिथ्या मान लेता है ।
उसके बाद फिर जब उसे यह जगत् भासता है तब वह इसे
इन्द्रियोपाधिक भ्रम समझ कर टालता रहता है। वह जान लेता
है कि जब तक ये इन्द्रियां बनी है तब तक ऐसी प्रतीति होती
ही रहेगी । भले ही होती रहो, वह फिर इसको सत्य मानकर कोई
भी व्यवहार नहीं करता । जितने भी सोपाधिक भ्रम होते हैं उन
सभी का यही हाल होता है। उनमें मिथ्या प्रतीति तो रहती
है परन्तु उस पर से विश्वास उठ जाता है । ऐसा शुद्ध और असंग