पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् २९३
तृप्तिदीपप्रकरणम् २९३
कर तो अकेला चिदाभास स्वतन्तरूप से रहता ही नहीं इस
कारण अकेला चिदाभास भी भोक्ता नहीं हो सकता । ]
उभयात्मक एवातो लोके भोक्ता निगद्यते ।
तादृगात्मानमारभ्य कूटस्थः शेषितः श्रुतौ ॥१९७॥
[जब कि अकेला कूटस्थ या अकेला चिदाभास भोक्ता हो
ही नहीं सकता ] इस कारण से लोक [ व्यवहार दशा ] में
उभयात्मक [ अर्थात् अधिष्ठान सहित चिदाभास ] ही भोक्ता
माना जाता है। [लोक में कहने का भाव यह है कि परमार्थ
दृष्टि कर बैठें तो उसकी उभयात्मकता ही सम्भव नहीं है] बुद्धि
रूपी उपाधि वाले इसी भोक्ता आत्मा का वर्णन करना प्रारम्भ
करके, बृहदारण्यक आदि श्रुतियों में, इसी कूटस्थ आत्मा को
जो कि बुद्धि आदि की कल्पना का अधिष्ठान भूत चिदात्मा है,
शेष रख लिया है [ अर्थात् बुद्धि आदि जितने भी अनात्मपदार्थ
हैं, उन सब का निरास करने के पश्चात् उसी को शेष कर दिया
जाता है । ]
आत्मा कतम इत्युक्ते याज्ञवल्क्यो विबोधयन् ।
विज्ञानमयमारभ्यासङ्गं तं पर्यशेषयत् ॥१९८॥
जनक ने जब याज्ञवल्क्य से आत्मा के विषय में यह पूछा
कि—आत्मतत्व कौन सा है ? तब याज्ञवल्क्य ने उसे समझाते
हुए, 'विज्ञानमय' से लेकर वर्णन करना प्रारम्भ करके, इसी
असंग कूटस्थ तत्व को शेष रख लिया था ।
कोऽयमात्मेत्येवमादौ सर्वत्रात्मविचारतः ।
उभयात्मकमारभ्य कूटस्थः शेष्यते श्रुतौ ॥१९९॥
'कोयमात्मा' इत्यादि (ऐतरेय ५-१) सभी उपनिषदों में आत्मा
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२९४ पञ्चदशी
का जो विचार किया गया है, वहां सभी जगह यह परिपाटी
रक्खी है कि—उभयात्मक आत्मा से [ वर्णन करना ] प्रारम्भ
करके पीछे से कूटस्थ को शेष रख लिया जाता है। [अन्तः-
करण उपाधि वाले आत्मा से प्रारम्भ करके, केवल प्रज्ञानरूपी
कूटस्थ को शेष रख लिया जाता है। इन सब श्रुतियों के
विचार से यही सिद्ध होता है कि जो उभयात्मक भोक्ता है वह
तो मिथ्या होता है, तथा जो पारमार्थिक असङ्ग कूटस्थ है वह
अभोक्ता ही है]।
कूटस्थसत्यतां स्वस्मिन्नध्यस्यात्मविवेकतः।
तात्त्विकीं भोक्तृतां मत्वा न कदाचिज्जिहासति ॥२००॥
भोक्ता कहाने वाला यह जब अपने अविवेक के कारण,
अपने और कूटस्थ के विवेक को भूल जाता है, तब कूटस्थ की
सत्यता का अपने में अध्यास कर लेता है और उस सत्यता
के द्वारा अपने भोक्तापन को भी सत्य ही मान बैठता है। बस
फिर तो वह कभी भी भोगों को छोड़ना नहीं चाहता। [वह
समझता है कि मुझ में भोक्तापन सदा रहता है, मुझे भोगों की
ज़रूरत सदा ही रहती है, इस भ्रान्त विचार में आकर अब
वह भोगों को छोड़ना नहीं चाहता है]।
भोक्ता स्वस्यैव भोगाय पतिजायादिमिच्छति।
एष लौकिकवृत्तान्तः श्रुत्या सम्यगनूदितः ॥२०१॥
लोक में जो भोक्ता प्रसिद्ध है, वह अपने ही भोग के लिये
पति या पत्नी आदि भोगसामग्री को चाहा करता है। इस
लौकिक वृत्तान्त का ही श्रुति ने केवल अनुवाद कर दिया है।
उसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि—इन भोगों को कूटस्थ