पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
उन्हें आनन्द मिल ही नहीं सकता। इसके विपरीत विवेकी को
५४८ पञ्चदशी
काल के लिए अपने आपको निःस्पृह ही कर लेते हैं और तभी
वे आनन्दी होते हैं। उनकी निःस्पृहता उन उन कामनाओं के
अधीन [मातहत] होती है। उन उन कामनाओं के पूरा हुए बिना
उन्हें आनन्द मिल ही नहीं सकता। इसके विपरीत विवेकी को
तो कुछ कामना ही नहीं होती। वह तो सदा ही निःस्पृह बना
रहता है, यों वह सदा ही आनन्द लूटा करता है। इसी कारण
विवेकी का दर्जा सबसे ऊँचा माना गया है। मनु ने भी कहा है
'यश्चैतान् प्राप्नुयात् सर्वान् यश्चैतान् केवलांस्त्यजेत्' प्रापणात् सर्व-
कामानां परित्यागो विशिष्यते' । जो इन सबको पा ले और जो इन
को केवल छोड़ ही भरदे, सब कामों को पाने से त्याग की
[ मानस त्याग की ] महिमा बहुत अधिक है।
सर्वकामाप्तिरेषोक्ता, यद्वा साक्षिचिदात्मना ।
स्वदेहवत् सर्वदेहेष्वपि भोगानवेक्षते ॥३५॥
ज्ञानी की सर्वकामप्राप्ति की बात यहां तक प्रतिपादित की
गयी। अब इसी बात को दूसरी रीति से कहा जाता है कि—
जैसे अपने देह में [आनन्दाकार बुद्धि का साक्षी हो कर]
आनन्दी होता है, इसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणियों के शरीरों में जो
जो भोग भोगे जा रहे हैं, उन सबका ही साक्षी होकर उन सब
के भोगों को यह अकेला ही भोगने लगता है। इस रीति से भी
ज्ञानी को 'सर्वकामाप्ति' हो जाती है।
अज्ञस्याप्येतदस्त्येव न तु वृत्तिरबोधतः ।
यो वेद सोऽश्नुते सर्वान् कामानित्यब्रवीच्छ्रुतिः ॥३६॥
यदि यह कहा जाय कि इस रीति से तो अज्ञानी को भी
'सर्वकामावाप्ति'हो ही जाती है—वह भी तो सबका साक्षी होता
ही है तो उसका उत्तर यह है कि-हां, अज्ञानी को भी 'सर्व-
कामावाप्ति' तो होती है परन्तु ज्ञान न होने के कारण उससे
उस [विचारे] की तृप्ति नहीं होती [ मैं सब बुद्धियों का साक्षी
हूँ ऐसा ज्ञान अज्ञानी को नहीं होता और वह उस तृप्ति से वंचित
रह जाता है ] यही बात तैत्तिरीय श्रुति में बहुत ही स्पष्ट शब्दों
में कही है कि— जो इस तत्व को पहचान जानता है उसी की
सब कामनायें पूरी हो जाती हैं। न जानने वाले तो केवल न
जानने से ही इस महालाभ से वञ्चित ही रह जाते हैं। यो वेद
निहितं गुहायां परमे व्योमन् सोश्नुते सर्वान् कामान् (तै० ब्र० १) ।
यद्वा सर्वात्मतां स्वस्य साम्ना गायति सर्वदा।
अहमन्नं तथान्नादश्चेति साम ह्यधीयते ॥३७॥
ज्ञानी की 'सर्वकामावाप्ति' का तीसरा भी एक प्रकार
है कि—वह ज्ञानी अपनी सर्वात्मकता [ सर्वरूपता ] को साम
के द्वारा यों गाया करता है। वह प्रत्येक वस्तु को अपना आत्मा
समझता है—वह जान जाता है कि मैं ही अन्न हूँ और मैं ही
अन्न को खाने वाला भी हूँ । सामवेद में भी कहा है कि—
अहमन्नमहमन्नमहमन्नमहमन्नादोहमन्नादोहमन्नादः। (तै० ३-१०) ऊपर
के श्लोक में साक्षिभाव से सर्वकामप्राप्ति का वर्णन है इस
श्लोक में सर्वात्मभाव से सर्वकामप्राप्ति का प्रतिपादन किया है।
दुःखाभावश्च कामाप्तिरुभे ह्येवं निरूपिते।
कृतकृत्यत्वमन्यच्च प्राप्तप्राप्यत्वमीक्षताम् ॥३८॥
यहां तक 'दुःखाभाव' और 'कामाप्ति' दोनों का निरूपण
किया जा चुका। अब आगे 'कृतकृत्यता' तथा 'प्राप्तप्राप्यता'
को भी समझ लो।