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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३
मय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुमय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, आपो-
मय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतजोमय, काममय
अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय आदि] आकारविशेषों से युक्त
था, वही अब लय के कारण [विज्ञान आदि उपाधियों के विलीन
हो जाने के कारण] एकरूप हो जाता है। मानो बहुत से चावलों
को पीस कर उन की एक पिष्ठी बना ली गयी हो । [इसी को
उसका एकीभाव कहते हैं ]
प्रज्ञानानि पुरा बुद्धिवृत्तयोऽथ घनोऽभवत् ।
घनत्वं हिमबिन्दूना मुदग्देशे यथा तथा ॥७०॥
[उस श्रुति के प्रज्ञानघन शब्द का अर्थ यह है कि]—पुरा
अर्थात् पहले जाग्रदादि के समय घटादि को विषय करने वाली
प्रज्ञान नाम की जो बहुत सी बुद्धिवृत्तियां थीं, अब [सुषुप्ति-
काल के आजाने पर जब कि कोई भी घटादि विषय नहीं रहते
तब] उन सब वृत्तियों का एक घन हो जाता है [अब उनका
केवल एक चिद्रूप ही हो जाता है] जैसे कि उत्तर दिशा में बरफ़
की बहुत सी बूंदों का घनाकार पिण्ड हो गया हो ।
तद्घनत्वं साक्षिभावं दुःखाभावं प्रचक्षते ।
लौकिकास्तार्किका यावद्दुःखवृत्तिविलोपनाव् ॥७१॥
यह जो वेदान्तों में साक्षी कहाने वाली प्रज्ञानघनता है उसी
को तो लौकिक लोग [जिन्हें शास्त्र का संस्कार ही नहीं है] तथा
तार्किक आदि लोग, दुःखाभाव कहते हैं या समझते हैं। क्योंकि
उस समय जितनी भी दुःखवृत्तियां होती हैं उन सभी का विलय
हो जाता है [वे लोग इसी बात को न समझ कर उस प्रज्ञान-
घनता को ही दुःखाभाव समझ बैठते हैं]

४४४ पञ्चदशी
अज्ञानविम्बिता चित् स्यान्मुखमानन्दभोजने ।
भुक्तं ब्रह्मसुखं त्यक्त्वा बहिर्यात्यथ कर्मणा ॥७२॥
[उस श्रुति के चेतो मुख का अर्थ यह है कि]—सुषुप्ति-
काल के ब्रह्मानन्द को भोगने का मुख [साधन] अज्ञानवृत्ति में
प्रतिबिम्बित चैतन्य ही तो है [उस ब्रह्मानन्द को भोगता हुआ
भी वह उसे छोड़कर जो कि दुःखों के घर [इस जागरण] में
आता है उसका कारण यह है कि—यह जीव पुण्य पाप नामक
कर्मपाश में बंधा हुआ है, इस कारण उस] कर्म से प्रेरित हुआ
यह जीव, साक्षात् देखे हुए भी ब्रह्मानन्द को छोड़ कर, बाहर
निकल आता है अर्थात् जाग पड़ता है ।
कर्म जन्मान्तरेऽभूद् यत् तद्योगाद् बुध्यते पुनः ।
इति कैवल्यशाखायां कर्मजो बोध ईरितः ॥७३॥
पुनश्च जन्मान्तरकर्मयोगात् स एव जीवः स्वपिति प्रबुद्धः इस
कैवल्यशाखा में कहा गया है कि—जन्मान्तर में किये हुए कर्मों
से यह प्राणी फिर जागरण में आ जाता है । अर्थात् जागरण
अवस्था यों ही बिना कारण के नहीं आजाती किन्तु यह कर्मज है ।
कंचित्कालं प्रबुद्धस्य ब्रह्मानन्दस्य वासना ।
अनुगच्छेद् यतस्तूष्णीमास्ते निर्विषयः सुखी ॥७४॥
[सुप्ति में ब्रह्मानन्द भोगना मिलजाता है इसका चिह्न भी
सुनलो]—जब आदमी जाग जाता है तब भी थोड़ी देर तक
सुषुप्ति में जिस ब्रह्मानन्द का अनुभव उसने किया था उसी
के संस्कार चालू रहते हैं। जभी तो जागने के प्रारम्भ में बिना
ही विषय के सुखी होकर यह प्राणी चुपचाप बैठा रहता है