पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ध्यानदीपप्रकरणम् ३८९
ध्यानदीपप्रकरणम् ३८९
दोनों प्रकार के तप जिसने किये हों, उसी में सामर्थ्य और
ज्ञान दोनों पाये जा सकते हैं। जो तो अकेले अकेले तप को
करेगा! उसे तो एक ही एक फल मिल सकता है ।
सामर्थ्यहीनो निन्द्यश्चेद् यतिभि र्विधिवर्जितः ।
निन्द्यन्ते यतयोऽप्यन्यै रनिशं भोगलम्पटैः ॥१११॥
जिन ज्ञानी पुरुषों में शापादि का सामर्थ्य नहीं है और
[ ज्ञानी होने के नाते ] विधि से रहित हैं, तो ऐसे ज्ञानी को
विहित कर्मों का पालन करने वाले लोग निन्द्य समझते हैं।
इसका उत्तर यह है कि—यदि ऐसी निन्दा से डरोगे तो फिर
उन विध्यनुसारी लोगों की निन्दा भी तो विषयलम्पट लोग
सदा किया ही करते हैं [ वे तो कर्मी को पाखण्डी और पोप
नाम से पुकारते हैं। इस निन्दा से जैसे सच्चे कर्मी को कुछ
दुःख नहीं होता, इसी प्रकार कर्मी की निन्दा से सामर्थ्यहीन
ज्ञानी को दुःख नहीं हो सकता ]
भिक्षावस्त्रादि रक्षेयुर्यद्येते भोगतृप्तये ।
अहो यतित्वमेतेषां वैराग्यभरमन्थरम् ॥११२॥
यदि ये लोग भी भोग की तृप्ति के लिये भोजन वस्त्रादि
का उपार्जन करने लगें तो वह उनका यतिपन ही क्या हुआ ?
[ फिर उन्हें गृहस्थ आश्रम में ही कौनसी आफ़त थी । भाव
यह है कि यतिधर्म में दीक्षित पुरुष अपने व्यष्टि अहं के
लिये कुछ भी काम नहीं कर सकता है । उसे तो व्यष्टि अभि-
मान का पोषण करने वाली प्रत्येक बात से परहेज करना
चाहिये । नहीं तो उसका यतिधर्म नष्ट हो जाता है ]
वर्णाश्रमपरान् मूढा निन्दन्त्वित्युच्यते यदि ।
देहात्ममतयो बुद्धं निन्दन्त्वाश्रममानिनः ॥११३॥
यदि यह कहो कि मूढ [ अर्थात् विषयलम्पट और पामर ]
लोगों की निन्दा से वर्णाश्रम धर्म को पालने वाले [ कर्मी ]
की कुछ हानि नहीं होती है । फिर वे भले ही उनकी निन्दा
करते रहें, तो हम कहेंगे कि—देह को ही आत्मा मानने वाले,
आश्रमों का अभिमान करने वाले, कर्मी लोग तत्वज्ञानी की
निन्दा भी भले ही किया करें, उसकी भी उससे कुछ भी हानि
नहीं हो सकती ।
तदित्थं तत्वविज्ञाने साधनानुपमर्दनात् ।
ज्ञानिनाचरितुं शक्यं सम्यग् राज्यादि लौकिकम् ॥११४॥
[ प्रकृत बात तो यही हुई कि ] उक्त रीति से तत्वज्ञान हो
जाने के बाद लौकिक व्यवहार जिन मन आदि साधनों से
चलता है, उनका उपमर्द किंवा विनाश नहीं हो जाता, इस
लिये तत्वज्ञानी लोग लौकिक राज्य [ उस जैसे बड़े-बड़े काम
भी] भले प्रकार चला ही सकते हैं। [ज्ञानी होने का यह अभि-
प्राय कदापि नहीं है कि ज्ञानी पुरुष निकम्मा होकर क्षयरोगी
की तरह हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाय या कहीं एकान्त गुफ़ा
में ही जा पड़े। जिन लोगों का विचार यह है कि ज्ञान हो जाने
पर तो कुछ काम हो ही नहीं सकता । वे तो तत्वज्ञान को
एक प्रकार का पक्षाघात रोग मानते हैं। ज्ञान तो मन की एक
उच्चतम अवस्था है । शरीर आदि के व्यापारों पर उसका कुछ
भी प्रभाव नहीं पड़ता । ज्ञान हो जाने पर भी शरीर आदि के
व्यापार ज्यों के त्यों चलते रह सकते हैं । ज्ञान होने पर केवल