पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् २४५
तृप्तिदीपप्रकरणम् २४५
विचार किया, तब वह व्यक्ति अर्थात् प्रत्यगात्मा रूपी ब्रह्म को
देख पाया। [यों तैत्तिरीय श्रुति के पर्यालोचन से यह बात
सिद्ध होती है कि—पहले तो वाक्य से परोक्ष ज्ञान ही उत्पन्न
हुआ करता है। फिर जब उस वाक्य के साथ विचार मिल
जाता है,तब वाक्य से अपरोक्ष ज्ञान की उत्पत्ति हो जाती है]।
यद्यपि त्वमसीत्यत्र वाक्यं नोचे भृगोः पिता ।
तथाप्यन्नं प्राणमिति विचार्य स्थलमुक्तवान् ॥६४॥
इस प्रकरण में यद्यपि भृगु के पिता ने 'तू ही ब्रह्म है' ऐसा
कोई उपदेश वाक्य तो नहीं कहा है, तो भी अन्न, प्राण आदि
का विचार करने के बाद, आत्मसाक्षात्कार के उत्पादक विचार
के योग्य स्थल को तो दिखला ही दिया है।
अन्नप्राणादिकोशेषु सुविचार्य पुनः पुनः।
आनन्दव्यक्तिमीक्षित्वा ब्रह्मलक्ष्माप्ययूयुजत् ॥६५॥
अन्न प्राण आदि पांचों कोशों में बार बार सुविचार करके
आनन्द नाम के आत्मा को साक्षात् देख कर पीछे से
आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति
आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । (तै० ३-६) ब्रह्म के इस लक्षण को
भी प्रत्यगात्मा में ही लगा दिया है। [इस कारण यह न कहना
चाहिए कि—अन्नमयादि कोशों का विचार करने पर तो प्रत्य-
गात्मा का साक्षात्कार हो सकता है। ब्रह्म का साक्षात्कार उससे
कैसे होगा ? क्योंकि प्रत्यगात्मा ही तो ब्रह्म है। क्योंकि ब्रह्म के
सब लक्षण उसमें मिलते हैं। यों उससे भिन्न ब्रह्म नाम का
कोई भी पदार्थ नहीं है]।
२४६ पञ्चदशी
सत्यं ज्ञान मनन्तं चेत्येवं ब्रह्मस्वलक्षणम् ।
उक्त्वा गुहाहितत्वेन कोशेष्वेतत् प्रदर्शितम् ॥६६॥
'सत्यं ज्ञान मनन्तं ब्रह्म' (तै० २-१) इस वाक्य से ब्रह्म के
स्वरूप लक्षण को बता कर 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्'
(मुण्ड० २-१-१०) इस वाक्य के द्वारा पांचों कोशों रूपी
गुहाओं के अन्दर छिपे बैठे हुए, उसी को प्रत्यगात्मा कह दिया
है [अर्थात् सत्यादि स्वरूप वाले ब्रह्म ने ही प्रत्यग्रूप धारण कर
लिया है। ऐसा श्रुतियों का अभिप्राय है। वे प्रत्यगात्मा और
ब्रह्म में भेद नहीं समझती हैं]।
पारोक्ष्येण विबुध्येन्द्रो य आत्मेत्यादिलक्षणात् ।
अपरोक्षीकर्तुमिच्छंश्चतुर्वारं गुरुं ययौ ॥६७॥
'य आत्मा पहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकः' (छा०८-७-१)
इस वाक्य में बताये हुए लक्षण से इन्द्र ने आत्मा को पहले
परोक्षरूप से ही तो जान लिया था—फिर [तीनों शरीरों का
निराकरण करके] आत्मा को साक्षात् करने के लिये, चार बार
गुरु के पास गया था। [यह बात छान्दोग्य के आठवें अध्याय
में कही गयी है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि परोक्षज्ञान
के पश्चात् विचार करने पर ही साक्षात्कार हुआ करता है]
आत्मा वा इदमित्यादौ परोक्षं ब्रह्म लक्षितम् ।
अध्यारोपापवादाभ्यां प्रज्ञानं ब्रह्म दर्शितम् ॥६८॥
'आत्मा वा इदं' इत्यादि ऐतरेय में पहले लक्षणा द्वारा परोक्ष-
रीति से ब्रह्म का कथन किया गया। फिर अध्यारोप और
अपवाद के द्वारा प्रज्ञानरूप ब्रह्म को साक्षात् दिखाया गया।